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बीएचयू जैसा खेल दूसरी जगह भी खेलने की तैयारी है?

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के बाद अगले कुछ दिनों में उत्तर प्रदेश के कुछ और विश्वविद्यालयों में ऐसी या इससे मिलती-जुलती घटनाएं हो सकती हैं। ऐसी आशंका जताई जा रही हैं कि यूपी में छात्र राजनीति के बहाने 2019 के चुनाव तक सियासी रोटी सेंकने का यह सिलसिला जारी रखने की तैयारी है। बीएचयू में आंदोलन के दौरान सक्रिय रहे एक बाहरी छात्र नेता ने हमें बताया कि “बनारस के बाद गोरखपुर, इलाहाबाद, कानपुर और मेरठ में आने वाले दिनों में अलग-अलग मुद्दों पर आंदोलन खड़ा करने की बातचीत चल रही है। इसके लिए प्रदेश के सभी विपक्षी दलों का एक गठबंधन सा बन गया है जिसे दिल्ली से आए वामपंथियों का समर्थन हासिल है।” न्यूज़लूज़ को मिली जानकारी के मुताबिक इस सियासी खेल के पीछे असली दिमाग एक बड़े रणनीतिकार का है, जिसे 2019 के चुनावों की जिम्मेदारी अनौपचारिक तौर पर सौंपी गई है।

बीएचयू की ‘सफलता’ से हौसला बढ़ा

यह बात सामने आ रही है कि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में छेड़खानी की जिस घटना को लेकर इतना बवाल बढ़ा उसके पीछे सोची-समझी रणनीति थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनारस दौरे पर आ रहे थे और इससे पहले विपक्षी दलों को एक मुद्दे की तलाश थी। बीएचयू में छेड़खानी की बढ़ती घटनाओं और उन्हें लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन की संवेदनहीनता के कारण लड़कियों में पहले से ही काफी गुस्सा था। नवीन महिला छात्रावास के आसपास की घटना हो या भारत कला भवन के पास हुई छेड़खानी। इन सभी में विश्वविद्यालय के अधिकारियों के रवैये ने आग में चिंगारी का काम किया। इसी का फायदा विपक्षी दलों ने उठाया। प्रधानमंत्री मोदी जब बनारस दौरे से वापस लौटे तब तक छात्राओं के धरने में राजनीतिक संगठनों के लोग घुलमिल चुके थे और उन्होंने ही हिंसा की पूरी स्क्रिप्ट तैयार की। ताकि इस मामले को सुर्खियों में लाया जा सके।

नए विश्वविद्यालयों में मुद्दों की तलाश

आने वाले दिनों में इलाहाबाद, गोरखपुर समेत कई विश्वविद्यालयों में अलग-अलग मुद्दों पर ऐसी स्थिति सामने आ सकती है। विपक्ष की रणनीति हिंसा की इन घटनाओं को छात्र असंतोष की तरह दिखाने की है। ताकि इसका फायदा 2019 के चुनाव में गैर-भाजपा दलों को मिल सके। इसी साल अप्रैल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बड़े पैमाने पर हिंसा का खेल खेला जा चुका है। उस मामले में सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी से जुड़े छात्र संगठनों की भूमिका रही थी। समाजवादी पार्टी की यूपी की छात्र राजनीति में ठीक-ठाक पकड़ भी रही है। कांग्रेस की भूमिका मुद्दों की तलाश, मीडिया मैनेजमेंट और सोशल मीडिया पर ट्रेंड कराने की है। बीएचयू के मामले में भी कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI से जुड़े ट्विटर हैंडलों से शुरुआत में ज्यादातर ट्वीट किए गए थे। इस काम में आम आदमी पार्टी का संगठन भी पूरी तरह से शामिल है।

यूपी में योगी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा माना जाता रहा है। कुछेक घटनाओं को छोड़ दें तो कुल मिलाकर महिलाएं अब खुद को पहले से ज्यादा सुरक्षित महसूस करती हैं। ऐसे में आशंका यही है कि विपक्षी पार्टियां इससे जुड़े हंगामे ही खड़ा करना चाहेंगी ताकि योगी सरकार को महिला सुरक्षा के मोर्चे पर नाकाम ठहराया जा सके। यानी यह साफ है कि राजनीति की इस चक्की में आने वाले कुछ दिन और अगर महिलाओं और लड़कियों को पिसना पड़ा तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी।

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