Home » Loose Top » शिक्षा को ‘वामपंथी ज़हर’ से मुक्त करने का काम शुरू
Loose Top

शिक्षा को ‘वामपंथी ज़हर’ से मुक्त करने का काम शुरू

अंग्रेजों की बनाई शिक्षा नीति को बदलने का काम शुरू हो गया है। नरेंद्र मोदी सरकार ने मशहूर अंतरिक्ष वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन की अगुवाई में नौ सदस्यों की एक कमेटी बनाई है, जो नई शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करेगी। आजादी के बाद से देश में यूं तो अलग-अलग स्तरों पर कई बार शिक्षा नीति तय करने की कोशिश हुई, लेकिन हर बार इसका नियंत्रण कांग्रेसी और वामपंथी विचारधारावाले लोगों के पास रहा। मोदी सरकार से ये उम्मीद हमेशा से की जाती रही है कि वो नई पीढ़ी को पढ़ाए जा रहे ‘वामपंथी जहर’ से मुक्ति दिलाएगी। इससे पहले 2015 में सरकार ने पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम की अगुवाई में एक कमेटी बनाई थी। लेकिन उसकी रिपोर्ट को सरकार ने यह कहते हुए नकार दिया कि उसमें कुछ खास सुधार नहीं सुझाए गए हैं।

भारतीय मूल्यों वाली शिक्षा व्यवस्था

नई शिक्षा नीति पर अब जो कमेटी बनाई बनाई गई है उसके चेयरमैन और बाकी सदस्यों को देखकर यही लगता है कि सरकार चाहती है कि नई शिक्षा प्रणाली आधुनिक और वैज्ञानिक सोच वाली हो, साथ ही इसका आधार भारतीय मूल्य हों। वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन के अलावा 9 सदस्यों वाली इस कमेटी में मध्य प्रदेश की बाबा साहेब आंबेडकर सोशल साइंस यूनिवर्सिटी के वीसी रामशंकर कुरील, पूर्व आईएएस केजे अल्फोंसे कनमथनम, कर्नाटक स्टेट इनोवेशन काउंसिल के पूर्व मेंबर सेक्रेटरी एमके श्रीधर, लैंग्वेज कम्युनिकेशन के एक्सपर्ट टीवी कट्टीमनी, गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में फारसी के प्रोफेसर मजहर आसिफ, यूपी के पूर्व शिक्षा निदेशक कृष्णमोहन त्रिपाठी, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की मैथमैटिशियन मंजुल भार्गव और मुंबई की एसएनडीटी यूनिवर्सिटी की पूर्व वीसी वसुधा कामत शामिल हैं। ये सभी शिक्षा के अलग-अलग क्षेत्रों की महारथ रखते हैं। ये कमेटी तत्काल काम शुरू कर देगी और इस बारे में पिछले सभी सुझावों और टीएसआर सुब्रमण्यम कमेटी के इनपुट्स पर भी गौर करेगी।

शिक्षा नीति में कस्तूरीरंगन की छाप!

वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन इसरो के वो पहले प्रमुख थे जिन्होंने हिंदू धर्म में अपनी आस्था को कभी छिपाया नहीं। वो किसी भी सैटेलाइट लॉन्च से पहले उसका प्रतिरूप (रेप्लिका) बनवाकर तिरुमला में भगवान वेंकटेश्वर के मंदिर में जाकर अर्पित किया करते थे। उनके साथ इसरो के तमाम बड़े वैज्ञानिक और प्रोजेक्ट से जुड़े लोग भी मंदिर जाया करते थे। तब से शुरू ये परंपरा आज भी इसरो में कायम है। इसे आस्था की ताकत कहें या संयोग, लेकिन इसी के बाद से इसरो की सफलता का प्रतिशत लगातार बढ़ता गया और आज उसकी गिनती दुनिया की सबसे कुशल अंतरिक्ष संस्थाओं में होने लगी है। आज भी जब इसरो के किसी अभियान से पहले वैज्ञानिक भगवान वेंकटेश्वर का आशीर्वाद लेने जाते हैं तो उन्हें तमाम हिंदू विरोधियों की टीका-टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है।

एक अपील: न्यूज़लूज़ के जरिए हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इस वेबसाइट पर होने वाला खर्च बहुत ज्यादा है और हमारी आमदनी काफी कम। हम अपने काम को जारी रख सकें इसके लिए हमें आर्थिक मदद की जरूरत है। ये हमारे लिए ऑक्सीजन का काम करेगी। डोनेट करने के लिए क्लिक करें:

कृपया लेख कॉपी-पेस्ट न करें। कई लोग पोस्ट कॉपी करके फेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर देते हैं, जिससे वेबसाइट की आमदनी काफी कम हो गई है। राष्ट्रवाद की विचारधारा पर आधारित यह वेबसाइट बंद हो जाएगी तो क्या आपको खुशी होगी? कृपया खबरों का लिंक शेयर करें।

comments

Polls

क्या नरेंद्र मोदी सरकार इसी कार्यकाल में जनसंख्या कानून लाएगी?

View Results

Loading ... Loading ...
Don`t copy text!