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सुप्रीम कोर्ट में हुई बीएचयू के कॉमरेडों की फजीहत

यूपी चुनाव से ठीक पहले नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए सक्रिय हुए बीएचयू के वामपंथी छात्रों को सुप्रीम कोर्ट में शर्मिंदगी उठानी पड़ी है। कैंपस में हंगामा और गुंडागर्दी के आरोप में वामपंथी संगठनों से जुड़े 8 छात्रों को सस्पेंड कर दिया गया था। विश्वविद्यालय प्रशासन के फैसले के खिलाफ छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। गुरुवार को इस केस की सुनवाई में पहुंचे छात्रों से जज ने उनके ही विषय से जुड़े सवाल पूछने शुरू कर दिए सवालों की बौछार देख सभी छात्र बुरी तरह चकरा गए। जस्टिस दीपक मिश्रा ने उनसे पूछा कि कौन सा विषय पढ़ते हो। जो राजनीति शास्त्र के छात्र थे उनसे उन्होंने सवाल पूछा कि ‘राज्य’ के क्या-क्या अवयव होते हैं? सवाल सुनते ही उनकी हवाइयां उड़ने लगीं। इसी तरह दर्शनशास्त्र यानी फिलॉस्फी के छात्र से द्वैतवाद, अद्वैतवाद और शून्यवाद से जुड़े सवाल पूछ दिए। पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा नेतागीरी करने आए ये छात्र अपने ही विषयों से जुड़े सवालों के जवाब नहीं दे पाए। यही नहीं, बल्कि पेशी के दौरान उनकी जमकर फजीहत भी हुई। ये वही छात्र हैं, जिन्हें कुछ महीने पहले राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त जैसे पत्रकारों ने हीरो बना दिया था। इनके जरिए बीएचयू की छवि को बदनाम करने की साजिश की गई थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों को फौरी तौर पर राहत देते हुए उन्हें इम्तिहान में बैठने की इजाज़त दे दी।

जज ने किए सवाल-जवाब

जस्टिस दीपक मिश्रा ने वकीलों के बजाय सीधे सवाल पूछने शुरू कर दिए। उन्होंने कहा कि “सच-सच बताओ कि किस वजह से तुम लोगों को सस्पेंड किया गया है।” बीएचयू के वामपंथी छात्र संगठनों के इन छात्रों का कहना है कि वो 24 घंटे लाइब्रेरी खोलने की मांग को लेकर धरना कर रहे थे, लेकिन प्रशासन ने उन्हें सस्पेंड कर दिया। जबकि यूनिवर्सिटी के ही दूसरे छात्र बताते हैं कि असल डिमांड कुछ और ही थी, जिसके लिए ये छात्र विश्वविद्यालय प्रशासन को ब्लैकमेल कर रहे थे। जब प्रशासन ने झुकने से इनकार कर दिया तो छात्र उग्र हो गए और उन्होंने कैंपस में हिंसा फैलाने की कोशिश की। यही वो असली कारण था, जिसे जज छात्रों के मुंह से सुनना चाहते थे। छात्रों के लिए राहत बस इतनी रही कि तीन सदस्यों वाली पीठ ने उन्हें परीक्षा में बैठने की छूट दे दी। इनके लिए 31 जुलाई तक परीक्षा कराई जाएगी और पेपरों के बीच में 3-3 दिन का अंतर रखा जाएगा। साथ ही उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमों पर फिलहाल रोक लगा दी गई है। एक निलंबित छात्र की फेलोशिप भी कोर्ट ने बहाल करने का आदेश दिया। तीनों जजों ने खुलकर जताया कि वो एक मौका और देना चाहते हैं, लेकिन इसके बदले उन्हें अपना आचरण सुधारना होगा।

पहनावे पर भी पड़ी फटकार

सुनवाई के दौरान कोर्ट में आए आठों छात्र जींस और रंग-बिरंगी पैंट पहने हुए थे। जज ने उन्हें अगली सुनवाई में सफेद शर्ट और बालों में अच्छे से कंघी करके आने को भी कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी छात्रों से कहा कि वो विश्वविद्यालय के कायदे-कानूनों को मानें और अपनी हरकतें बंद करें। छात्रों को उनकी मौजूदा राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहने को भी कहा गया है। जिन छात्रों को गुंडागर्दी के आरोप में निलंबित किया गया उनमें राजनीति विज्ञान के शोध छात्र विकास सिंह, कला संकाय में बीए सेकेंड इयर का छात्र प्रियेश पांडेय, अनुपम कुमार, सामाजिक विज्ञान संकाय में बीए का छात्र दीपक सिंह, गौरव पुरोहित, आकाश पांडेय, शांतनु सिंह गौर, कला संकाय में सेकेंड इयर का छात्र रोशन पांडेय और डीएवी पीजी कॉलेज का बीए का छात्र अविनाश पांडेय शामिल है। यूनिवर्सिटी के ही छात्रों का कहना है कि ये सभी वामपंथी संगठनों से जुड़े हुए हैं और आए दिन कैंपस में ऐसी हरकतें करते रहते हैं जिससे पढ़ाई-लिखाई का माहौल खराब हो।

बीएचयू के खिलाफ साज़िश

दरअसल वामपंथी और जिहादी संगठनों की आंखों में बीएचयू बीते कुछ वक्त से खटक रहा है। यूनिवर्सिटी के अच्छे एकेडमिक माहौल को खराब करने के लिए तरह-तरह की कोशिश की जा रही हैं। इसी के तहत छात्रों के गुट ने बिहार के जेडीयू सांसद अली अनवर अंसारी के जरिए संसद में आरोप लगवाया कि बीएचयू में लड़कियों के साथ भेदभाव हो रहा है। इसके कुछ दिन बाद पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कैंपस में आकर कुछ गिने-चुने स्टूडेंट्स से बातचीत करके दिखाया कि वास्तव में बीएचयू में लड़कियों को भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा है। उन्होंने एक कदम आगे बढ़ते हुए ‘शेम ऑन बीएचयू’ नाम से सोशल मीडिया कैंपेन भी चलाया। इसके बाद बरखा दत्त समेत कई और कांग्रेस-वामपंथी पत्रकारों ने यहां आकर झूठी खबरें देश भर में फैलाने की कोशिश की। अब सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद उम्मीद है कि इन सभी को अपना जवाब मिल गया होगा।

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