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अंबेडकर की वो 7 बातें जो लोगों से छिपाई जाती हैं!

4. संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा चाहते थे

ये बात आपको हैरानी में डालने वाली लगेगी, लेकिन डॉ. अंबेडकर ने एक से ज्यादा जगहों पर कहा है कि संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। 11 सितंबर 1949 को संडे हिंदुस्तान स्टैंडर्ड के अंक में तब के कानून मंत्री बाबा साहब अंबेडकर की राय छपी है, जिसमें उन्होंने संस्कृत को भारतीय संघ की भाषा के तौर पर मान्यता देने की वकालत की है। इसके बाद ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की एग्जिक्यूटिव कमेटी की बैठक में भी उन्होंने खुलकर अपनी राय जताई थी। जब भाषाओं के आधार पर राज्यों के गठन का मुद्दा गर्म था तब डॉ. अंबेडकर इकलौते बड़े नेता थे जिन्होंने इसका खुलकर समर्थन किया था। लेकिन साथ ही उन्होंने कहा था कि इस तरह के भाषाई राज्यों के गठन में खतरे भी बहुत हैं। हालांकि उन्होंने माना कि कोई समझदार प्रशासन ऐसे खतरे को बेअसर कर सकता है। इसी कोशिश के तहत डॉ. अंबेडकर का ही सुझाव था कि हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाया जाए। साथ ही उन्होंने अंग्रेजी की जरूरत को कभी खारिज नहीं किया।

5. ईसाई मिशनरियों के सख्त खिलाफ थे

बाबा साहब ईसाई मिशनरियों के दलित प्रेम को भी शक की नजर से देखते थे। प्रोफेसर लक्ष्मी नरासू की किताब द इसेंशियल्स ऑफ बुद्धिज़्म में उन्होंने लिखा है कि सामाजिक सुधार को ईसाई मिशनरीज का समर्थन सिर्फ इसलिए है क्योंकि वो अपने धर्म को फैलाना चाहते हैं। मिशनरीज की रुचि दलितों की भलाई से ज्यादा अपने मकसद में हैं।
डॉ. अंबेडकर के कामों के संकलन के वॉल्यूम 17 में दलितों के एक और बड़े नेता बाबू जगजीवन राम की अंबेडकर के नाम एक चिट्ठी है। 9 मार्च 1937 की इस चिट्ठी में बाबू जगजीवन राम ने लिखा है- प्रिय डॉक्टर साहब, इलाहाबाद के बलदेव प्रसाद जायसवाल से सतर्क रहिएगा। बिहार में कोई भी उनके साथ नहीं है। उनका दफ्तर एक कैथोलिक चर्च में है और उनका हर कदम मिशनरीज को फायदा पहुंचाने की नीयत से होता है। इस पत्र व्यवहार से साफ है कि दोनों बड़े दलित नेता ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों को लेकर आशंकित थे और मानते थे कि उनकी रुचि धर्मांतरण में ज्यादा और सामाजिक बदलाव में कम है। यह आशंका सही भी साबित हुई क्योंकि आगे चलकर ईसाइयों में भी वही जाति प्रथा बनी रही और एक नया वर्ग ‘दलित ईसाई’ बन गया।

6. भारतीय पुजारी सेवा लाना चाहते थे

डॉ. अंबेडकर ने ही सुझाव दिया था कि सिविल सेवाओं की ही तर्ज पर भारतीय पुजारी सेवा होनी चाहिए। हिंदू धर्म से जुड़े पूजा और कर्मकांड कराने वालों का इसके जरिए चुनाव होना चाहिए और सर्विस के लिए जाति का कोई बंधन जरूरी नहीं होगा। उनका मानना था कि हर हिंदू का अधिकार होना चाहिए कि वो पुरोहित का काम कर सके। देखा जाए तो ये बहुत अच्छा सुझाव था। अगर कांग्रेस की तब की सरकार ने इस पर अमल होने दिया होता तो आज हिंदू धर्म में जन्म के आधार पर जाति का सफाया हो चुका होता। अब जाकर मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में पुरोहितों की ट्रेनिंग जैसे काम शुरू हुए हैं।

7. पिता के नाम पर पर था गर्व

भीमराव अंबेडकर के पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था। वे अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे। उन्होंने हर जगह सरकारी कागजात में अपना नाम भीमराव रामजी अंबेडकर ही लिखा है। सवाल यह कि जब उनके पिता का सरनेम सकपाल था तो उनका सरनेम आंबेडकर कैसे हुआ? भीमराव आंबेडकर का जन्म महार जाति में हुआ था जिसे लोग अछूत मानते थे। प्रतिभाशाली होने के बावजूद स्कूल में उनको भेदभाव का सामना करना पड़ा रहा था। उनको क्लास रूम के अंदर बैठने की इजाजत नहीं थी। तब स्कूल के ही एक ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा महादेव अंबेडकर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उनको अपना उपनाम दे दिया, ताकि भीमराव को जातीय भेदभाव का सामना न करना पड़े।

(स्रोत: स्वराज्य)

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