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अंबेडकर की वो 7 बातें जो लोगों से छिपाई जाती हैं!

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को लेकर आज कई तरह की भ्रांतियां पैदा करने की कोशिश की जा रही हैं। खास तौर पर वामपंथी बीते कई साल से अंबेडकर की विचारधारा को कमजोर करने में जी-जान से जुटे हैं और काफी हद तक उन्होंने इसमें कामयाबी भी पाई है। अंबेडकर की पसंद और नापसंद बिल्कुल शीशे की तरफ साफ है। दरअसल वो इस मामले में बेहद स्पष्टवादी थे। उन्होंने कभी छिपाया नहीं कि किसी खास विचारधारा के लिए वो क्या सोचते हैं। लेकिन आज जो लोग खुद को अंबेडकराइट यानी अंबेडकरवादी बताते हैं, वो इस बात का हमेशा ध्यान रखते हैं कि अंबेडकर की बातों का विश्लेषण करते हुए उसी नजरिए को गायब कर दिया जाए। सबसे खास बात है कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर वामपंथी विचारधारा को देश के खिलाफ मानते थे। वो सही अर्थों में एक राष्ट्रवादी थे। ये हैरानी की बात है कि बाबा साहब की इस विचारधारा का उन्हीं के कथित फॉलोअर आजकल मज़ाक उड़ाते हैं। हम आपको बताते हैं बाबा साहब की विचारधारा की उन बड़ी बातों को जिसे पूरी कोशिश के तहत छिपाया जाता है:

1. उपनिषद को लोकतंत्र का आधार माना

डॉ. अंबेडकर को हिंदुत्व के विरोधी विचारधारा की तरह दर्शाया जाता है, लेकिन खुद उन्होंने उपनिषदों का व्यापक अध्ययन किया था। एक जगह उन्होंने उपनिषद महावाक्यों को लोकतंत्र का आध्यात्मिक आधार बताया है। जात-पात तोड़क मंडल में अपने मशहूर भाषण में अंबेडकर ने कहा था कि हिंदुओं को स्वतंत्रता और बराबरी का समाज बनाने के लिए कहीं बाहर से कुछ सीखने की जरूरत नहीं है। उन्हें ये सबकुछ अपने उपनिषदों से ही मिल जाएगा। बाद में अपनी पुस्तक रिडल्स ऑफ हिंदुइज़्म (हिंदुत्व की पहेलियां) में उन्होंने इस विचार पर विस्तार से बात की है। इसमें उन्होंने तीन महावाक्यों का जिक्र किया है- सर्वम खिलविद्म ब्रह्मा (सर्वत्र ब्रह्मा ही है), अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ) और तत्वमसि (तुम वही हो)। किताब में वो लिखते हैं- हम सभी भगवान की संतान हैं, ये विचार लोकतंत्र के आधार के को कमजोर बनाता है। ऐसी बुनियाद होती है तो लोकतंत्र डगमगाता रहता है। लेकिन अगर लोगों में यह भाव हो कि हम सभी उसी परमपिता का अंश हैं और हममें उतना ही ईश्वर है जितना किसी भी दूसरे प्राणी में तो यह समस्या खत्म हो जाती है। इसके बाद लोकतंत्र एक स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाती है।

2. हिंदू सिविल कोड चाहते थे अंबेडकर

कथित प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी आज समान नागरिक कानून के सबसे बड़े विरोधी हैं। लेकिन वो नहीं चाहते कि किसी को पता चले कि अंबेडकर शुरू से ही एक देश, एक कानून के सबसे बड़े हिमायती थी। उन्होंने तो इससे भी आगे बढ़कर हिंदू सिविल कोड लाने की वकालत की थी। इसे उन्होंने समान नागरिक कानून की दिशा में पहला चरण माना था। इस हिंदू नागरिक संहिता को उन्होंने सामाजिक लोकतंत्र और लैंगिक समानता का आधार माना था। 11 जनवरी 1950 को अपने भाषण में डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि हिंदू नागरिक बिल एक प्रगतिशील व्यवस्था है। यह एक प्रयास है जिससे भारत के संविधान के तहत सभी नागरिकों को एक नागरिक कानून के दायरे में लाया जा सके। यह बिल पूरी तरह हिंदू धार्मिक पुस्तकों के आधार पर तैयार किया गया था। मानते हैं कि डॉ. अंबेडकर इस बिल के जरिए हिंदू समाज की कुरीतियों को दूर करके उसे उपनिषदों और दूसरे धर्मग्रंथों में कही बातों के आधार पर संचालित करना चाहते थे।

3. सिंधु जल समझौते के सख्त खिलाफ थे

सिंधु जल समझौता नेहरू की कमजोर कूटनीति की एक और बड़ी मिसाल है। डॉ. अंबेडकर ने खुलकर इसका विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि सिंधु के जल पर पहला अधिकार भारत के किसानों का होना चाहिए। ब्रिटिश इकोनॉमिस्ट हेनरी विंसेंट हडसन ने अपनी किताब द ग्रेट डिवाइड (1969) में लिखा है कि अंबेडकर ने इस समझौते के लिए साफ इनकार कर दिया था। जिसके बाद लार्ड माउंटबेटन को पाकिस्तान की तरफ से बीच-बचाव के लिए आना पड़ा। माउंटबेटन ने नेहरू से बात की और उन्हें इस भेदभावपूर्ण जल संधि के लिए राजी कर दिया। इसी समझौते कारण आज कश्मीर से लेकर पंजाब और गुजरात तक के बड़े इलाके में पानी की समस्या है। डॉ. अंबेडकर ने इस समस्या को पहले से भांप लिया था, लेकिन आज जब भी इस संधि की बात होती है अंबेडकर की राय को छिपा लिया जाता है। 1956 में अंबेडकर के निधन के बाद नेहरू को को छूट मिल गई और 1960 में उन्होंने इस विचित्र संधि पर दस्तखत कर दिए।

4. संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा चाहते थे

ये बात आपको हैरानी में डालने वाली लगेगी, लेकिन डॉ. अंबेडकर ने एक से ज्यादा जगहों पर कहा है कि संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। 11 सितंबर 1949 को संडे हिंदुस्तान स्टैंडर्ड के अंक में तब के कानून मंत्री बाबा साहब अंबेडकर की राय छपी है, जिसमें उन्होंने संस्कृत को भारतीय संघ की भाषा के तौर पर मान्यता देने की वकालत की है। इसके बाद ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की एग्जिक्यूटिव कमेटी की बैठक में भी उन्होंने खुलकर अपनी राय जताई थी। जब भाषाओं के आधार पर राज्यों के गठन का मुद्दा गर्म था तब डॉ. अंबेडकर इकलौते बड़े नेता थे जिन्होंने इसका खुलकर समर्थन किया था। लेकिन साथ ही उन्होंने कहा था कि इस तरह के भाषाई राज्यों के गठन में खतरे भी बहुत हैं। हालांकि उन्होंने माना कि कोई समझदार प्रशासन ऐसे खतरे को बेअसर कर सकता है। इसी कोशिश के तहत डॉ. अंबेडकर का ही सुझाव था कि हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाया जाए। साथ ही उन्होंने अंग्रेजी की जरूरत को कभी खारिज नहीं किया।

5. ईसाई मिशनरियों के सख्त खिलाफ थे

बाबा साहब ईसाई मिशनरियों के दलित प्रेम को भी शक की नजर से देखते थे। प्रोफेसर लक्ष्मी नरासू की किताब द इसेंशियल्स ऑफ बुद्धिज़्म में उन्होंने लिखा है कि सामाजिक सुधार को ईसाई मिशनरीज का समर्थन सिर्फ इसलिए है क्योंकि वो अपने धर्म को फैलाना चाहते हैं। मिशनरीज की रुचि दलितों की भलाई से ज्यादा अपने मकसद में हैं।
डॉ. अंबेडकर के कामों के संकलन के वॉल्यूम 17 में दलितों के एक और बड़े नेता बाबू जगजीवन राम की अंबेडकर के नाम एक चिट्ठी है। 9 मार्च 1937 की इस चिट्ठी में बाबू जगजीवन राम ने लिखा है- प्रिय डॉक्टर साहब, इलाहाबाद के बलदेव प्रसाद जायसवाल से सतर्क रहिएगा। बिहार में कोई भी उनके साथ नहीं है। उनका दफ्तर एक कैथोलिक चर्च में है और उनका हर कदम मिशनरीज को फायदा पहुंचाने की नीयत से होता है। इस पत्र व्यवहार से साफ है कि दोनों बड़े दलित नेता ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों को लेकर आशंकित थे और मानते थे कि उनकी रुचि धर्मांतरण में ज्यादा और सामाजिक बदलाव में कम है। यह आशंका सही भी साबित हुई क्योंकि आगे चलकर ईसाइयों में भी वही जाति प्रथा बनी रही और एक नया वर्ग ‘दलित ईसाई’ बन गया।

6. भारतीय पुजारी सेवा लाना चाहते थे

डॉ. अंबेडकर ने ही सुझाव दिया था कि सिविल सेवाओं की ही तर्ज पर भारतीय पुजारी सेवा होनी चाहिए। हिंदू धर्म से जुड़े पूजा और कर्मकांड कराने वालों का इसके जरिए चुनाव होना चाहिए और सर्विस के लिए जाति का कोई बंधन जरूरी नहीं होगा। उनका मानना था कि हर हिंदू का अधिकार होना चाहिए कि वो पुरोहित का काम कर सके। देखा जाए तो ये बहुत अच्छा सुझाव था। अगर कांग्रेस की तब की सरकार ने इस पर अमल होने दिया होता तो आज हिंदू धर्म में जन्म के आधार पर जाति का सफाया हो चुका होता। अब जाकर मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में पुरोहितों की ट्रेनिंग जैसे काम शुरू हुए हैं।

7. पिता के नाम पर पर था गर्व

भीमराव अंबेडकर के पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था। वे अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे। उन्होंने हर जगह सरकारी कागजात में अपना नाम भीमराव रामजी अंबेडकर ही लिखा है। सवाल यह कि जब उनके पिता का सरनेम सकपाल था तो उनका सरनेम आंबेडकर कैसे हुआ? भीमराव आंबेडकर का जन्म महार जाति में हुआ था जिसे लोग अछूत मानते थे। प्रतिभाशाली होने के बावजूद स्कूल में उनको भेदभाव का सामना करना पड़ा रहा था। उनको क्लास रूम के अंदर बैठने की इजाजत नहीं थी। तब स्कूल के ही एक ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा महादेव अंबेडकर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उनको अपना उपनाम दे दिया, ताकि भीमराव को जातीय भेदभाव का सामना न करना पड़े।

(स्रोत: स्वराज्य)

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