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मायावती को छोड़ मोदी के पास क्यों जा रहे हैं दलित?

लोकसभा के बाद यूपी विधानसभा चुनाव में भी बीएसपी की बुरी हार के नतीजे सामने आने लगे हैं। पार्टी में पहली बार मायावती के नेतृत्व के खिलाफ बड़ी बगावत सिर उठा रही है। कांशीराम के निधन और मायावती के पार्टी सुप्रीमो बनने के बाद से कभी मायावती के नेतृत्व को ऐसी चुनौती नहीं मिली थी। विधानसभा चुनाव में बीएसपी को सिर्फ 19 सीटें मिली हैं। पार्टी के नेताओं का एक धड़ा इस दलील को मानने को तैयार नहीं है कि ईवीएम में गड़बड़ी के कारण ये नतीजे आए हैं। सबसे बड़ा सवाल ब्राह्मण नेताओं को ज्यादा तरजीह दिए जाने को लेकर उठ रहा है। पार्टी के दो पुराने और कद्दावर नेता कमलाकांत गौतम और गंगाराम अंबेडकर ने बगावत की शुरुआत की है। इन दोनों ने बीते कुछ साल में पार्टी के अंदर किनारे लगाए गए नेताओं को साथ लाकर एक नया राजनीतिक मंच बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। इस सिलसिले में लखनऊ में एक बैठक भी हो रही है। इन नेताओं का कहना है कि कांशीराम ने दलित, पिछड़ा और मुस्लिम वर्ग को मिलाकर एक सामाजिक समीकरण बनाया था। मायावती ने इनमें से ओबीसी को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। साथ ही वो मुसलमानों को भी पूरी तरह जोड़े रहने में नाकाम हो गईं।

‘जाटव पार्टी बनी बीएसपी’

विधानसभा की हार के बाद लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद समेत लगभग सभी जिलों में बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं ने इस्तीफे दिए हैं। गौतम का कहना है कि कार्यकर्ताओं में भारी हताशा है। वो पूछ रहे हैं “ओबीसी नेताओं की अनदेखी क्यों की जा रही है और कांशीराम की विचारधारा को बर्बाद क्यों किया जा रहा है। मायावती ने कांशीराम की सारी मेहनत पर पानी फेर दिया है।” मायावती के कारण ही बीएसपी पूरी तरह से जाटव पार्टी बनकर रह गई है। ओबीसी जातियां तो छोड़ ही दें, यहां तक कि बाल्मिकी, कोरी, धोबी, खटीक जैसी दलित जातियों का भी कोई बड़ा नेता बीएसपी में नहीं बचा है। ये ज्यादातर जातियां अब बीजेपी के साथ हैं। यहां तक कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई जगह जाटवों ने भी बीजेपी के साथ जाना ज्यादा पसंद किया है। क्योंकि समाजवादी पार्टी को सत्ता से दूर रखने में उन्हें बीजेपी ज्यादा सुरक्षित और मजबूत पार्टी लग रही है। फिलहाल बागी गुट की लखनऊ में होने वाली बैठक बीएसपी में मायावती के खिलाफ पहली बगावत मानी जा सकती है। बीएसपी के पूर्व सांसद प्रमोद कुरील भी बीते कुछ वक्त से खुलकर मायावती के खिलाफ बोल रहे हैं। उनका भी यही कहना है कि मायावती ने गैर-जाटव दलितों के साथ बहुत ही बुरा सलूक किया है।

ब्राह्मण-मुस्लिम प्रेम पर सवाल

बीएसपी के ज्यादातर नेता इस बात की शिकायत कर रहे हैं कि दलितों की पार्टी होने के बावजूद मायावती दलितों पर भरोसा नहीं करतीं। उनके इर्दगिर्द ज्यादातर ब्राह्मण और मुसलमान सलाहकार के रूप में हैं। यही कारण है कि एनआरएचएम घोटाले में आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को तो पार्टी से निकाल दिया गया, लेकिन सतीशचंद्र मिश्रा के रिश्तेदार अनंत मिश्रा को छुआ तक नहीं। इसी तरह 100 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने का फैसला भी सवालों में है। इन 100 में से केवल 5 मुस्लिम उम्मीदवार ही जीते हैं। जो मुस्लिम विधायक हैं, उनकी निष्ठा भी संदिग्ध है। पहले दिन से ही ऐसी अटकलें हैं कि ये विधायक समाजवादी पार्टी के साथ जा सकते हैं। वोटिंग के नतीजों से यह साफ है कि मुसलमानों ने बीएसपी के मुकाबले समाजवादी पार्टी को ज्यादा तवज्जो दी है।

‘दलितों की नई पीढ़ी जागरुक’

कांशीराम के पूर्व सहयोगी रहे और अब बीएसपी से बाहर किए जा चुके एक नेता ने हमें बताया कि “ऐसा लग रहा है कि दलितों की नई पीढ़ी मायावती को पसंद नहीं कर रही है। मायावती की भाषण शैली और मुद्दे चुनने का उनका तरीका भी एक नेता के तौर पर उन्हें आकर्षक नहीं बनाता है। पिछली पीढ़ी कांशीराम और मायावती के साथ खुद को निष्ठावान महसूस करती है, लेकिन नई पीढ़ी के साथ ऐसा कुछ नहीं है।” उनके मुताबिक नई पीढ़ी के आगे भी रोजगार और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे हैं और इन मसलों पर वो नरेंद्र मोदी को ज्यादा बेहतर पाते हैं।” उन्होंने कहा कि “आप खुद ही गिन लीजिए कि मायावती ने कितने दलित नेताओं को बढ़ावा दिया और नरेंद्र मोदी ने। नरेंद्र मोदी ने संघ की विचारधारा से अलग लोगों को भी बीजेपी में लाकर उन्हें सम्मानजनक स्थिति में पहुंचाया है।” साथ ही यह महसूस भी किया जा रहा है कि दलितों को लेकर संघ का नजरिया पहले से ज्यादा सकारात्मक हुआ है, जिसका सीधा असर मायावती की दलित राजनीति पर देखने को मिल रहा है।

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