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ये भी हिंदुस्तान के हिंदू थे, हम 14 साल में ही भूल गए!

आज कश्मीर के नदीमर्ग में 24 हिंदुओं की बर्बर हत्या की 14वीं सालगिरह है। आज ही के दिन 11 पुरुषों, 11 महिलाओं और दो मासूम बच्चों को उनके घरों से निकालकर इस्लामी आतंकवादियों ने गोलियों से भून डाला था। इस हत्याकांड के आरोपी मुसलमान पुल नदीमर्ग के आसपास के रहने वाले ही थे। लेकिन आज तक एक भी आरोपी पकड़ा नहीं गया, सज़ा दिलाने की बात तो भूल ही जाइए। बताते हैं कि इस पूरे हत्याकांड की साजिश यासीन मलिक ने रची थी। उसी ने इलाके के मुसलमान लड़कों को जुटाकर हत्याकांड के लिए उकसाया था। कहा गया कि आतंकवादियों ने गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए ये हत्याकांड किया, जबकि असलियत यह थी कि काफी वक्त से इसकी तैयारी चल रही थी। सबसे दुख की बात ये है कि इस देश में इस्लामी आतंकवाद को आजादी की लड़ाई बताने वाला मीडिया नदीमर्ग में बेकसूरों पर हुए इस अत्याचार को भूल गया।

इस्लामी आतंकवाद का बर्बर चेहरा

नदीमर्ग गांव में 52 कश्मीरी हिंदू पंडित रहा करते थे। ये सभी कुल चार परिवारों के सदस्य थे। गांव के बाकी सभी लोग 1990 में हुए पलायन में पहले ही घरबार छोड़कर जा चुके थे। जो हिंदू गांव में बाकी बचे थे वो आसपास के मुसलमानों की आंखों में खटक रहे थे। 23 मार्च की रात को लगभग 12 बजे कई मुसलमान सेना की वर्दी में जनीपोरा पुलिस चौकी पहुंचे। इस चौकी पर आम तौर पर नौ पुलिसकर्मी हुआ करते थे, लेकिन घटना की रात वहां केवल 6 पुलिसवाले ही थे। आतंकवादियों ने यह कहकर कि वो सैनिक हैं और आतंकवादियों की तलाश में आए हैं, न सिर्फ उन पुलिसवालों को साथ ले लिया बल्कि उनके हथियार भी छीन लिए। उन्हें लेकर वे नदीमर्ग गांव पहुंचे। तलाशी लेने के नाम पर लोगों को बाहर निकाला गया और उन्हें कतार में खड़ा करके गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। 24 लोगों ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया। अन्य 20 घायलों को मरा समझकर आतंकवादी वहां से चले गए। इस मामले में पुलिस की भूमिका शुरुआत से ही शक के दायरे में रही।

नदीमर्ग हत्याकांड से दहल गए हिंदू

नदीमर्ग की घटना के बाद कश्मीर घाटी से हिंदू पलायन नए सिरे से शुरू हो गया। इसके बाद हजारों की तादाद में घाटी में बचे-खुचे लोग भी जम्मू या दूसरी सुरक्षित जगहों पर जाने लगे। स्थानीय कश्मीरी पंडितों का आरोप है कि राज्य सरकार और पुलिस अच्छी तरह जानती है कि इस हत्याकांड में किन लोगों का हाथ था। घटना में घायल हुए लोग भी हमलावरों को पहचानने का दावा करते हैं। इसके बावजूद आजतक दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। यहां तक कि दोषी पुलिसवालों पर भी कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई। अब इस घटना के 14 साल हो चुके हैं, लेकिन नदीमर्ग के लोगों को आज भी इंसाफ का इंतजार है।

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