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मणिपुर में बीजेपी की सरकार से क्यों चिंता में है चर्च?

मणिपुर में बीजेपी की सरकार बनने से ईसाई मिशनरियों में भारी हड़कंप मचा हुआ है। अब तक राज्य में कांग्रेस की छत्रछाया में चल रही ईसाई मिशनरियों को अब डर सता रहा है कि बीजेपी की सरकार बनने से उनके लिए मुश्किल पैदा हो सकती है। मणिपुर नॉर्थ-ईस्ट के उन राज्यों में से है जहां पर ईसाई मिशनरियां सबसे तेजी से धर्मांतरण करवा रही हैं। इसी के कारण राज्य में ईसाइयों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। मणिपुर में बीजेपी ने पहली बार इतने दमखम के साथ चुनौती दी थी। बीजेपी को हराने के लिए ईसाई मिशनरियों और राज्य में चल रहे तमाम चर्च ने पूरी ताकत झोंक दी थी। यहां तक कि चर्च की तरफ से कांग्रेस को वोट देने की अपील भी जारी की गई थी। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जमीनी तैयारियों के कारण वो अपने मंसूबों में सफल नहीं हो सके।

ईसाई मिशनरियों ने डाला था अड़ंगा

मणिपुर में बीजेपी को नगा क्रिश्चियन पार्टी NPF के चार विधायकों ने भी सपोर्ट किया है। खबर है कि ईसाई मिशनरियों ने आखिरी वक्त तक भरपूर कोशिश की थी कि किसी भी तरह NPF के नेताओं को मना लिया जाए कि वो बीजेपी की सरकार को सपोर्ट न करें। लेकिन असम सरकार के मंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा आखिरकार उन्हें अपनी तरफ मोड़ने में कामयाब हो गए। मणिपुर में पहाड़ों पर रहने वाले कैथोलिक ईसाई हैं, जबकि घाटी के इलाकों में ज्यादातर वैष्णव हिंदू हैं। इन्हें मेतेई समुदाय के नाम से जाना जाता है। राज्य सरकार, पुलिस और नौकरशाही में घाटी के हिंदू ही हावी हैं। ईसाई मिशनरियों के प्रायोजित ब्लॉकेड के कारण आए दिन यहां पर मेतेई समुदाय के लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

चर्च के कारण खतरे में है पहचान

आरएसएस की अरुणाचल प्रदेश शाखा के सचिव निडो सकतर का कहना है कि “मणिपुर में जिस तरह से ईसाई धर्मांतरण चल रहा है उससे पूरे राज्य के मूल निवासियों की संस्कृति खतरे में है। ईसाई मिशनरियां करोड़ों रुपये खर्च करके लोगों को ईसाई बनाने में जुटी हुई हैं। लेकिन थोड़ी देरी से ही सही यहां के मूल निवासियों में इस बात को लेकर जागरुकता आई है। संघ लोगों को बस इस बात के लिए जागरुक बना रहा है कि धर्मांतरण के चलते राज्य को किस तरह का नुकसान उठाना पड़ा है।” मणिपुर में ज्यादातर मामलों में धर्मांतरण के पीछे नौकरी या पैसों का लालच होता है। इसके अलावा डरा-धमाकर धर्म परिवर्तन कराने के मामले में सामने आते रहे हैं। यहां पर रहने वाला आदिवासी समुदाय हमेशा से ईसाई मिशनरियों के निशाने पर रहा है। अब तक कांग्रेस पार्टी की सरकारों ने उन्हें खुली छूट दे रखी थी।

हिंदू कम हो रहे हैं, ईसाई बढ़ रहे हैं

मणिपुर में 1961 में ईसाई आबादी 19 फीसदी हुआ करती थी, जो 2011 में बढ़कर 41 फीसदी हो चुकी है। 28 लाख की आबादी वाला मणिपुर बीते 3 दशक में ईसाई मिशनरियों का अड्डा बन चुका है। 1961 में मणिपुर में हिंदू आबादी का अनुपात 62 फीसदी के करीब था। अब हिंदुओं की संख्या घटते-घटते 41 फीसदी के करीब हो चुकी है। यानी मणिपुर में इस समय हिंदू और ईसाई आबादी लगभग बराबर हो चुकी है। ईसाई मिशनरियों की सक्रियता को देखते हुए माना जाता है कि 2021 में होने वाली अगली जनगणना तक मणिपुर में ईसाई आबादी 50 फीसदी से अधिक हो चुकी होगी।

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