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मोदी का ‘रामबाण’ जो 2019 में भी जीत दिलाएगा!

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बहाने बीजेपी ने वो ‘रामबाण’ पा लिया है, जो 2019 में ही नहीं 2024 में भी बीजेपी को जीत दिला सकता है। बिहार में जिस जाति समीकरण के मकड़जाल के कारण बीजेपी हारी थी, उसका तोड़ पार्टी ने निकाल लिया है। ये फॉर्मूला ऐसा है जो हिंदुत्व के उसके फॉर्मूले के हिसाब से एकदम फिट है और लंबे समय तक इस समीकरण के आधार पर चुनाव जीते जा सकते हैं। ये समीकरण है- गैर-यादव ओबीसी + गैर-जाटव अनुसूचित जातियां + परंपरागत अगड़ी जाति के वोट। सोशल इंजीनियरिंग का ये वो फॉर्मूला है जिसे बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव और अब उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव में पुख्ता बनाया है। बीजेपी के एक बड़े नेता ने हमें बताया कि हिंदुत्व का ये व्यापक जातीय फॉर्मूला पीएम मोदी के ही दिमाग की उपज है। यूपी चुनाव से पहले इलाहाबाद में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पीएम मोदी ने कहा था कि हम भले ही हिंदुत्व की बात करें, लेकिन दूसरी पार्टियां आरक्षण जैसे मुद्दे उठाकर हिंदुओं को जातीय वोट बैंकों में तोड़ने में सफल हो जाती हैं। इसलिए हिंदुत्व की व्यापक सोच के तहत ही एक जातीय गणित भी बिठानी जरूरी है ताकि हिंदू समाज का लगभग हर वर्ग बीजेपी को वोट देने के लिए सहज रहे।

यूपी के पोस्टरों में छिपा है इशारा

उत्तर प्रदेश चुनाव में बीजेपी ने जो भी पोस्टर, बैनर या दूसरे विज्ञापन दिए, उनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अध्यक्ष अमित शाह के साथ प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य, केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, उमा भारती और कलराज मिश्र की तस्वीरें थीं। मोदी और अमित शाह बीजेपी के एक व्यापक जनाधार का चेहरा हैं। राज्य स्तर पर केशव प्रसाद मौर्य और उमा भारती गैर-यादव ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके चेहरे से वोटरों को बीजेपी यह भरोसा दिलाती है कि सत्ता में आने के बाद सभी ओबीसी जातियों पर ध्यान दिया जाएगा, न कि सिर्फ यादवों पर। राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र अगड़ी जातियों के चेहरे के तौर पर हैं। ये तो उत्तर प्रदेश की बात थी। बाकी सभी बड़े राज्यों में इसी पैटर्न पर व्यापक जातीय समीकरण बनाया जा सकता है।

यादवों के लिए भी बीजेपी का प्लान

उत्तर प्रदेश और बिहार में यादव वोटर बीजेपी के साथ नहीं हैं। लेकिन पार्टी के लॉन्ग टर्म प्लान में उन्हें भी साथ लाने की तैयारी है। इसका सीधा हिसाब यह है कि जैसे-जैसे मुलायम, अखिलेश और लालू जैसे नेता कमजोर होंगे, यादव वोटर हिंदुत्व की व्यापक छतरी में लौट आएगा। अगर देखें तो अभी भी यूपी और बिहार को छोड़ बाकी सभी राज्यों में यादव परंपरागत तौर पर बीजेपी के ही वोटर माने जाते हैं। बीजेपी के पास भूपेंद्र यादव, हुकुमदेव नारायण, रामकृपाल यादव और बंडारू दत्तात्रेय जैसे बड़े यादव नेता हैं। लेकिन इनमें से कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो लालू, मुलायम के जादू को कम कर सके। यूपी में बीजेपी ने बड़ी संख्या में यादव नेताओं को संगठन में जगह दिया है। कई जिलाध्यक्ष भी बनाए गए। मकसद यही है कि यादवों में ये मैसेज जाए कि बीजेपी उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहती।

अगला टारगेट 2019 लोकसभा चुनाव!

यूपी विधानसभा चुनाव अब लगभग खत्म हो चुके हैं और बीजेपी इसके नतीजों को लेकर आश्वस्त है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों को भरोसा है कि आराम से बहुमत मिल जाएगा। हालांकि ये चुनाव उस सोशल इंजीनियरिंग का टेस्ट है जिस पर चलकर बीजेपी 2019 में होने वाला अगला लोकसभा चुनाव लड़ना चाहती है। यूपी में बीजेपी ने 383 में से 150 टिकट गैर-यादव ओबीसी उम्मीदवारों को दिए हैं। बीजेपी की साथी अपना दल भी गैर-यादव ओबीसी यानी कुर्मी जाति की नुमाइंदगी करती है। इसी तरह भारतीय समाज पार्टी राजभर वोटरों में पकड़ रखती है। बीजेपी ने अपना दल को 11 और भारतीय समाज पार्टी को 9 सीटें दी हैं। पूर्वी यूपी में इन दोनों जातियों की संख्या 18 फीसदी के करीब है।

बीजेपी अब ‘ब्राह्मण-बनिया’ पार्टी नहीं

दरअसल कुल मिलाकर बीजेपी अब हिंदू जातियों का पहले से व्यापक प्रतिनिधित्व कर रही है। मोदी के आगमन के साथ ही पार्टी ने ब्राह्मण-बनिया की पार्टी की इमेज को पीछे छोड़ दिया है। अब इसके जातीय समीकरण में पहले नंबर पर गैर-यादव ओबासी हैं। साथ ही अगड़ी जातियों को भी स्वाभाविक तौर पर महत्व देने की रणनीति है। इसी के तहत यूपी में बीजेपी ने 65 टिकट राजपूतों और 64 टिकट बीजेपी को दिए। जब राज्य में बीजेपी कमजोर स्थिति में थी तो ये वोटर बीएसपी अपने साथ खींच ले गई थी। कुल मिलाकर अब 11 मार्च का इंतजार है, जब साफ हो जाएगा कि बीजेपी का ये जातीय समीकरण कितना कारगर साबित हुआ है। (आशीष)

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