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आदियोगी भगवान शिव की स्थापना से क्यों है हड़कंप

महाशिवरात्रि के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज तमिलनाडु में कोयंबटूर के ईशा योग केंद्र में भगवान शिव की प्रतिमा का अनावरण करेंगे। 112 फीट ऊंची ये प्रतिमा शिव का आदियोगी रूप है। इसे पत्थर की जगह स्टील के टुकड़े जोड़-जोड़कर देसी टेक्नोलॉजी से बनाया गया है। ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने इसका डिजाइन तैयार किया है। लेकिन हिंदू धर्म के इस आयोजन से तमिलनाडु की ईसाई मिशनरियां परेशान हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री को कोयंबटूर आने और भगवान शिव की प्रतिमा के विरोध की तैयारी की जा रही है।

क्या है आदियोगी प्रोजेक्ट?

  • भगवान शिव की ये प्रतिमा सिर्फ धड़ से ऊपर का हिस्सा है।
  • साथ ही में शिव के वाहन नंदी की प्रतिमा भी बनेगी।
  • मूर्ति में स्टील के टुकड़ों के अलावा तिल के बीज, हल्दी, भस्म और रेत-मिट्टी जैसी चीजों का प्रयोग किया गया है।
  • इस तरीके से पुराने जमाने में हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाई जाती थीं।
  • महाशिवरात्रि के दिन कोयंबटूर में महायोग यज्ञ शुरू होगा। जिसकी शुरुआत मोदी करेंगे।
  • प्रतिमा 112 फीट की है। क्योंकि भगवान शिव का आदियोगी रूप मनुष्यों के लिए 112 संभावनाओं के द्वार खोलता है।
  • दुनिया भर में 5 करोड़ लोग उद्घाटन समारोह के बनेंगे साक्षी।
  • ध्यान और योग का ये कार्यक्रम शाम 6 बजे से शुरू होकर सुबह 6 बजे तक चलेगा।
  • शिव के आदियोगी रूप की ये प्रतिमा वेलियनगिरि की पहाड़ियों पर स्थित है।
  • कोयंबटूर के बाद वाराणसी, दिल्ली और मुंबई में भी शिव की ऐसी ही प्रतिमाएं बनाई जानी हैं।

ईसाई मिशनरियां हैं विरोध में

भगवान शिव के इस विराट स्वरूप की प्रतिमा स्थापित होने से तमिलनाडु में धर्मांतरण करा रही ईसाई मिशनरियां बेहद परेशान हैं। इस प्रोजेक्ट का विरोध करने के लिए उन्होंने पर्यावरण को नुकसान की थ्योरी दी है। जबकि प्रतिमा को बनाने में किसी कॉकरीट या सीमेंट का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। ईसाई मिशनरियों के पैसे पर पलने वाले कथित पर्यावरणविदों ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर अपील की है कि वो कोयंबटूर न आएं। तमिलनाडु के सीएम ईके पलनीस्वामी से भी अपील की गई है कि वो भगवान शिव की प्रतिमा बनाने पर फौरन रोक लगा दें। 2013 में इस प्रतिमा के निर्माण का काम शुरू हुआ था। उसके बाद इसके विरोध में कोर्ट में कई याचिकाएं डलवाई गई थीं। ऐसी ही एक याचिका अभी मद्रास हाई कोर्ट में लंबित है।

पर्यावरण को कोई खतरा नहीं

ईसाई मिशनरियों ने हिंदू धर्म के इस आयोजन को विवाद में डालने की पूरी कोशिश की है, जबकि सच्चाई ये है कि जिस पहाड़ी जमीन पर प्रतिमा की स्थापना हुई है वो ईश योग केंद्र की ही है। कोयंबटूर की वेलियनगिरि पहाड़ियों का संबंध हमेशा से भगवान शिव की परंपरा के साथ रहा है। जहां पर प्रतिमा स्थापित हुई है वो प्राइवेट जमीन है और वहां पर ऐसे निर्माण के लिए सरकारी अनुमति मिली हुई है। पर्यावरण मंत्रालय पहले ही इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे चुका है। प्रतिमा की स्थापना के कारण जितने हिस्से में पेड़ हटाने पड़े हैं, उन सभी को आसपास ही दूसरी जगहों पर लगाया गया है। इसके अलावा हजारों फलदार पेड़ पूरे इलाके में लगाए जा चुके हैं।

विरोध की ये है असली कहानी

दरअसल ईशा योग केंद्र के काफी करीब करुण्यानगर इलाका पड़ता है। यहां पर ईसाई मिशनरियों की करुण्या यूनिवर्सिटी चलती है। ये यूनिवर्सिटी तमिलनाडु के इस पूरे इलाके में ईसाई धर्मांतरण का केंद्र है। उन्हें दिक्कत ये है कि ईसा योग केंद्र की गतिविधियां बढ़ने से लोग स्वाभाविक रूप से हिंदू धर्म के लिए आकर्षित होंगे। इससे उसे लोगों का धर्मांतरण करने में मुश्किल होगी। करुण्या यूनिवर्सिटी बनाने के वक्त यहां बरसों पुराने हजारों पेड़ काटे गए थे। यूनिवर्सिटी के नाम पर इस पहाड़ी इलाके में कंकरीट के पक्के निर्माण कराए गए हैं। जबकि यही मिशनरी इस इलाके में हिंदू तीर्थ विकसित करने पर पर्यावरण का मुद्दा उठा रही है। हैरानी की बात है कि मीडिया का एक बड़ा तबका इस कोशिश में उनकी मदद भी कर रहा है।

महाशिवरात्रि के मौके पर कोयंबटूर में होने वाले आयोजन में दुनिया भर से आए हजारों लोग उपस्थित होंगे।
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