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क्या देवगौड़ा और गुजराल से भी खराब पीएम हैं मोदी?

दीपक शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं
दीपक शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं
ढाई साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनधन एकाउंट से लेकर नोटबंदी तक कोई 70 बड़े फैसले लिए हैं। हो सकता है इनमें अधिकतर फैसले गलत हों लेकिन कम से कम एक-दो फैसले तो देशहित में ज़रूर लिए होंगे। लेकिन मोदी का विरोध करने वाले कुछ बड़े पत्रकारों ने अपनी कलम या वाणी से किसी एक भी फैसले की इन ढाई साल में कभी प्रशंसा नही की। उन्होंने हर निर्णय में खोट ढूंढी और हर कदम को गलत साबित करने की कोशिश की।

तो क्या नरेंद्र मोदी, देवेगौड़ा और गुजराल से भी बदतर प्रधानमंत्री हैं? या कुछ पत्रकार ‘मोदियाबिंद’ से ग्रसित हैं और उन्हें हर जगह अंधेरगर्दी ही दिखती है। देश के राजनीतिक पाले में मोदी भक्त और मोदी विरोधी बंट सकते हैं। लेकिन ऐसा ही पाला अगर आज समाचार जगत में खिंच गया है तो ये देश की पत्रकारिता का दुर्भाग्य है।

मैं नियमित रूप से न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट और बीबीसी की वेबसाइट्स फॉलो करता हूँ। यह कह सकता हू कि ये वेबसाइट्स नरेंद्र मोदी की आलोचक जरूर हैं पर अक्सर उनकी तमाम योजनाओं को भारत के लिए अच्छा भी बताती हैं। वो चाहे कालेधन पर SIT हो या फिर गैस पर सब्सिडी की स्वेच्छा से वापसी। अमेरिकी अखबारों ने स्वच्छ भारत और जनधन एकाउंट जैसी योजनाओं को भी 65 प्रतिशत अविकसित और लोअर मिडिल क्लास वाले देश के लिए अच्छा माना है।

लेकिन मोदी के प्रति जो घोर विरोध कुछ सेलिब्रिटी पत्रकारों में दिखता है उससे देश की मीडिया की तटस्थता प्रभावित हुई है। पत्रकार किसी विपक्ष के नेता की तरह अगर प्रधानमंत्री के लिए ‘पैथोलॉजिकल हैट्रेड’ (नफरत की बीमारी) पालता है तो वो पत्रकार सरकार की नीतियों की सही रिपोर्टिंग कैसे कर पाएगा। पत्रकार का भक्त होना भी गलत है, पर पैथोलॉजिकल हैट्रेड से ग्रसित होना भी उतना ही गलत है। यानी सुधीर चौधरी और रवीश कुमार टाइप के पत्रकार, यानी ये दोनों प्रजातियां… पत्रकारिता के पैमाने पर खरी नहीं उतरतीं। दोनों टाइप की पत्रकारिता नैतिक, वैचारिक और सामाजिक स्तर पर असंतुलित हैं।

तथ्यों के आधार पर गलत को गलत ज़रूर कहिए। बिलकुल कहिए। मोदी जहां गलत हैं वहां उनकी गलती को बार-बार दिखाइए… उनकी नीतियों की बार-बार आलोचना कीजिए… लेकिन इतना ध्यान रखिए कि 100 में शायद 1 फैसला मोदी का सही हो। और वो भी अगर आप गलत साबित करेंगे तो फिर पब्लिक तो…

(वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक पेज से साभार)

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