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शिवसेना अब हिंदुत्ववादी नहीं, सेकुलर पार्टी है!

नोटबंदी के खिलाफ शिवसेना के तेवर आश्चर्यजनक तरीके से तीखे होते जा रहे हैं। आज पार्टी के मुखपत्र सामना में इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को जमकर खरी-खोटी सुनाई गई है। इसमें ज्यादातर वही बातें कही गई हैं जो कांग्रेस, तृणमूल और आम आदमी पार्टी के नेता बोलते रहे हैं। एक दिन पहले ही शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने इसकी तुलना जालियांवाला बाग हत्याकांड से कर डाली थी। इस मुद्दे पर शिवसेना अब खुलकर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों के साथ है। सवाल उठ रहा है कि क्या शिवसेना अब लगभग पूरी तरह से हिंदुत्ववादी एजेंडे से दूर जा चुकी है और अब वो देश की एक दर्जन से ज्यादा सेकुलर पार्टियों में से एक है। सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाओं में यही सवाल पूछा जा रहा है।

ममता के मार्च में शामिल होने पर गुस्सा

बाल ठाकरे की पार्टी के ममता बनर्जी और आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियों के पीछे मार्च में जाने को लेकर लोगों में भारी गुस्सा है। खास तौर पर वो लोग सबसे ज्यादा दुखी हैं, जिनके लिए बाल ठाकरे आज भी हिंदुत्व हृदय सम्राट की जगह रखते हैं। ममता के पीछे-पीछे चापलूसों की तरह चलते शिवसेना के 18 सांसदों को देखकर इन सभी लोगों के सिर शर्म से झुक गए। हालत यहां तक थी कि चंद्रकांत खैरे (ऊपर तस्वीर में तिलक लगाए हुए), अरविंद सावंत, राहुल शेवाली और आनंदराव अडसुल जैसे नेता तस्वीरों में आगे दिखाई देने के लिए आम आदमी पार्टी के भगवंत मान से धक्कामुक्की करते दिखाई दिए। कई लोग यहां तक कह रहे हैं कि इनमें से कई सांसद मोदी की लहर में जीते वरना उनकी हैसियत पंचायत चुनाव जीतने की भी नहीं है। हर कोई यही कह रहा है कि आज अगर बाल ठाकरे जिंदा होते तो ऐसा कतई नहीं होता। 17 नवंबर को ही बाल ठाकरे की पुण्यतिथि थी, ऐसे में हर कोई उन्हें याद करके अफसोस जता रहा है।

बिना बुलाए गए गए थे शिवसेना के नेता!

हैरत की बात यह है कि ममता बनर्जी के इस मार्च में शिवसेना के सांसद बिन बुलाए मेहमान थे। ममता का सारा जोर कांग्रेस, लेफ्ट, जेडीयू और समाजवादी पार्टी को अपने साथ लाने पर था। लेकिन इनमें से कोई भी उनके साथ आने को तैयार नहीं हुआ। एक वक्त ऐसा भी आया जब ममता को साथ चलने के लिए सिर्फ नेशनल कॉन्फ्रेंस और आम आदमी पार्टी का एक सांसद मिला। लेकिन तभी अचानक शिवसेना के करीब 18 सांसद पूरे तामझाम के साथ मार्च में शामिल हो गए। हैरत इस बात की है कि यह लगभग साफ है कि ममता और आम आदमी पार्टी नोटबंदी का विरोध सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उनकी काली कमाई और आतंकवादियों को भी इस कदम से नुकसान हुआ है।

 

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