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जाट तो जाहिल, गंवार हैं… औरतों को घर में रखते हैं!

Chaudhary Mandeep Singh Dalalजाट जाहिल हैं… गँवार हैं….लुटेरे हैं… पुरुष प्रधान हैं… बात-बेबात बंदूक उठा लेते हैं… लड़कियों को घर की चारदीवारी में कैद रखते हैं… बेटियों की पढ़ाई छुड़वा देते हैं… दारूबाज हैं… बदमाश हैं… और हरियाणा में आंदोलन के बाद अब तो बलात्कारी भी हैं।

पॉपुलर कल्चर में इस मार्शल कौम को जितना पानी पी-पीकर बदनाम किया जाता है उतना शायद ही किसी को किया गया हो… फिर चाहे फिल्म NH 10 का डायलॉग हो कि “गुड़गांव का आखिरी मॉल जहाँ खत्म होता है वहां संविधान भी खत्म हो जाता है” … या फिर आइडिया का वो विज्ञापन जिसमे एक लड़की “कॉलेज घर आ जावैगा तो चाल्लैगा” बोलते हुए जाटों को मेल डॉमिनेंट चित्रित कर वाहवाही बटोरी जा रही थी।

हरियाणा में एक कहावत है- “मुँह म्ह गुह देणा” मतलब बिना प्रमाण आरोप गढ़ने वालों को करारा जवाब देना। तो भाई हरियाणे की बेटी, बहिन साक्षी मालिक ने महिला कुश्ती में देश का पहला मेडल जीत उन सारे मीडिया, टीवी, फिल्मकारों के मुँह में गुह दिया है जो जाटों को अव्वल दर्जे का पुरुष प्रधान और लुटेरा चित्रित करते आये हैं। लड़कियों की आज़ादी का मतलब क्या होता है ये साक्षी मालिक से सीखने की जरूरत है। दिल्ली की कूल डूडनियाँ जो रात को पब से शराब और सिगरेट से तर हो आज़ादी की परिकल्पना कर हरियाणा में नारी अधिकार पर ज्ञान पेलती हैं वो कहाँ हैं? आज खेल में, शिक्षा में? कहाँ हैं? मुझे तो नज़र नहीं आतीं। उनको तो और भी ज्यादा आज़ादी है। फिर भी कहीं नज़र नहीं आतीं।

तुम्हारी “सो कॉल्ड सोफिस्टिकेटेड अंग्रेजीदां” क्लास एक वर्ल्ड क्लास फीमेल रेसलर नहीं पैदा कर सकी… तुम्हारी सारी सोशियोलॉजी फेल हो गई। तुमने सिर्फ नाखून साफ़ कर फूंक मारती कूल डूडनियाँ पैदा की हैं जो ड्रेस के साथ बॉयफ्रेंड बदलने को आज़ादी की साँस मानती हैं। अधकचरी अंग्रेजी बोल खुद फॉरवर्ड समझने वाली नकचढ़ियां।

दूसरी तरफ अनपढ़ अक्खड़ जाट ने अपनी बेटियों को मिट्टी में पसीने की जगह खून बहाना सिखाया है। घर से निकलने की आज़ादी दी है। अखाड़े में पुरुष पहलवानों से जोर-आजमाइश की आज़ादी दी है। कोई बुरी नज़र से देखे तो आँखें फोड़ने की आज़ादी दी है। हंसने की आज़ादी दी है। बोलने की आज़ादी दी है। उड़ने की आज़ादी दी है। लड़ने की आज़ादी दी है। जाटों ने शेरनियां पैदा की हैं… आज़ाद शेरनियां…।

ये सिर्फ खेल में ही नहीं है। पढ़ाई-लिखाई में भी जाटों की बेटियां नाम रौशन कर रही हैं। मेरे पास केमिस्ट्री में IIT-GATE और NET-JRF के लिए कोई सवा सौ बच्चे पढ़ते हैं जिनमे 90 प्रतिशत लड़कियां ही हैं। जिनके पिता किसान हैं। जो खुद अनपढ़ हैं या सिर्फ 10वीं, 12वीं बस। लेकिन बेटों की बजाय बेटियों पर जान न्यौछावर किये जाते हैं। उनको ढंग से पता भी नहीं M.Sc, B.Sc का मगर फिर भी बेटियों को वैज्ञानिक और प्रोफेसर बनाने का सपना पाले बैठे हैं। ये गांव-देहात की बेटियां बेशक छोटे कपड़े पहन महंगा फ़ोन ले इतराती नहीं चलती, मगर सूट-सलवार या फिर शालीन जीन्स-टॉप में सधे कदमों से चलती इन वीरांगनाओं को क्वांटम फिजिक्स भी पता है और वर्ल्ड हिस्ट्री भी।

ये बेटियां ही देश का भविष्य हैं। नई पौध हैं वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, लेखकों और खिलाड़ियों की। इनको है पूरी आज़ादी, जिसका ये मान भी रखती हैं और शान भी बढ़ाती हैं।

जय माँ भारती

(यह पोस्ट चौधरी मंदीप सिंह दलाल के फेसबुक पेज से साभार ली गई है। न्यूज़लूज़ किसी भी तरह के जातीय स्वाभिमान के समर्थन में नहीं है, लेकिन एक समुदाय के तौर पर सभी जाटों को जिस तरह से मीडिया ने पिछले दिनों में बदनाम करने की कोशिश की है, उसे देखते हुए यह लेख जवाब की तरह है।)

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