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इरफान खान आप तो सस्ते में ही छूट गए!

pragya
प्रज्ञा बड़थ्वाल ध्यानी पत्रकार रह चुकी हैं, फिलहाल वो एड एजेंसी चलाती हैं
इरफान खान ने एक बयान दिया, क्या गलत कर दिया? वो क्या कहते हैं फ्रीडम ऑफ स्पीच है कि नहीं?
हम्म्म… नहीं है… है है…। याद आया! जब दिवाली पर पटाखे नहीं जलाने की अपील होती है तो फ्रीडम ऑफ स्पीच होती है। जब होली पे पानी न गिराने की अपील होती है तो फ्रीडम ऑफ स्पीच होती है। तब पर्यावरण की चिंता होती है और बोलने की आज़ादी भी होती है।
और गर्व के साथ कहती हूं कि हैं जो लोग दिवाली पे पटाखे जलाएंगे और होली पे पानी बर्बाद करेंगे मैं भी उनका विरोध करूंगी।
जो करे उसका भी धन्यवाद जो न करे उसे समझाने की और कोशिश होगी।
उत्तराखंड में बलि प्रथा बड़ी प्रचलित है, लेकिन धीरे-धीरे कम होती जा रही क्योंकि वो मेरी कुर्बानी नहीं है। किसी निर्दोष जानवर की है। मेरे परिवार ने तो आज तक कोई बलि नहीं दी। भगवान को गुड़ चढ़ाते हैं उसी का प्रसाद बांटते हैं। भगवान को खुश होना होगा तो होंगे, वरना मैं उनको भी स्वार्थी मान लूँगी।
चलिए वापस आते हैं, इरफान खान ने गलत कहा ये कहने वाले लोग चैनलों पे भी चिल्ला रहे हैं, पर उसने कुछ तो सही कहा होगा ये कहने वाले कहां हैं? कहां हैं जिन्हें देश के टुकड़े करने वाले नारे लगाने वाला कन्हैया हीरो लगता है उसकी बोलने की आज़ादी का साथ देने वाले चैनल्स शार्ली हेब्दो और इरफान के बयान पे गायब हो जाते हैं?
दादरी पे पूरे देश में मातम छा जाता है, एक पूरे धर्म के लोग अचानक से अपने आप को गुनहगार महसूस करने लगते हैं। चाहे वो चीख-चीख के कहें कि दादरी में अखलाक को मारा नहीं जाना चाहिए था।

अब क्या कहेंगे जब एक ही धर्म के लोग अपने धर्म की ही एक महिला को इसलिए पीट दें क्योंकि उसने जानवरों पर दया दिखाने को कह दिया? (नीचे वीडियो देखें)

क्यों हमें उस धर्म से उस अनुपात में आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ें नहीं सुनाई देतीं जस अनुपात में उनकी आबादी है। लेकिन इरफान खान का विरोध करने सब आ जाते हैं?
आतंक के खिलाफ उस मजहब के मोर्चे कहां हैं? शरिया के लिए तो दुनिया में हर जगह आवाज़ उठ जाती है।
बुर्खे के पक्ष में हैं, आईएस के लिए कश्मीर में झंडे हैं, इरफान का साथ देने के लिए किसी के पास हिम्मत नहीं हैं?

शिरीष कुंदर हीरो है क्योंकि वो मोदी के खिलाफ रात-दिन लिखता है। कोई एक शब्द उसकी फिल्म मेकिंग पर लिख दे तो सुनने की हिम्मत भी नहीं है। उनकी फिल्म के सपोर्ट में ट्विटर ट्रेंड शुरू हो जाता है पर वही लोग इरफान पर चुप हो जाते हैं।
बोलने की आज़ादी इस देश में है, बहुत है, पर सिर्फ खास मुद्दों पे।

इरफान, आपको आज़ादी नहीं है। आमिर ख़ान को थी क्योंकि इन्टॉलरेंस थी आज सब सही और शांत है। अच्छा हुआ आपने पढ़ने-लिखने और आबादी थोड़ी कम रखने को नहीं कहा.. बच गए। वरना तो ये आपकी जान ही ले लेते।

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कुर्बानी के विरोध पर एक मुस्लिम लड़की का ये हस्र हुआ था!

ये 2015 का मामला है जब भोपाल में जानवरों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने वाली संस्था PETA की कार्यकर्ता बेनजीर सुरैया ने भोपाल में एक प्रदर्शन करने की कोशिश की थी। तब इलाके के ‘शांतिप्रिय समुदाय’ के लोगों ने उन पर हमला बोल दिया था। बड़ी मुश्किल से पुलिस ने उनकी जान बचाई थी। उस घटना का वीडियो आप नीचे के लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं।

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