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तुम्हारा रोजा, व्रत जैसा हो सकता है, बेहतर नहीं

Pallavi Upadhyay Mishra
पल्लवी उपाध्याय मिश्रा
मैं सप्ताह में दो दिन, सोमवार और शुक्रवार को फलाहार वाला उपवास करती हूँ। कल एक मुस्लिम सहकर्मी ने कहा कि “आप हिंदुओं का उपवास तो बड़ा आसान है, उपवास में आप पानी भी पीते हो और फल भी खाते हो, हमारा रोजा तो बड़ा मुश्किल होता है। हम ना पानी पीते हैं ना ही कुछ खाते हैं।”
मैंने कहा “अच्छा तो आप भी सप्ताह में दो दिन ऐसा उपवास रखा कीजिये ना। दो दिन सप्ताह में नमक छोड़ियेगा तो इससे आपका ब्लड प्रेशर भी कंट्रोल में रहेगा।”
उसने कहा “ना बाबा ना मैं तो एक दिन भी चिकन मटन के बिना नहीं रह सकती। हम तो रोजा में भी चिकेन मटन ही खाते हैं।”
मैंने पूछा “आप लोग रोजा में भी दो बार खाते हो ना?”
उसने कहा “हाँ, एक बार सहरी और दूसरी बार इफ्तार”
मैंने कहा “फिर यह कैसा उपवास? ” फिर मैंने उसे तीज, जितिया और छठ पूजा के बारे में बताया। छठ पूजा के बारे में सुनकर उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई दो दिन भूखा-प्यासा कैसे रह सकता है।
मैंने यह नोटिस किया है कि कोई मुस्लिम मिलते ही सामने वाले को समझाने लगता है कि उसका धर्म आपके धर्म से कैसे बेहतर है और पूरी दुनिया को उन्होंने यह समझा रखा है कि उनके रोजे कितने कठिन होते हैं। क्या आपने यह नोटिस किया है?

 

(पल्लवी अपने परिवार के साथ लंदन में रहती हैं। वो पत्रकार तो नहीं हैं लेकिन तमाम मुद्दों पर बेहद सुलझी हुई राय रखती हैं।)

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