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देश को ‘गुलाम वंश’ से आजादी तो अब मिली है!

 

लेखक पुष्कर अवस्थी ने यह पोस्ट अपने फेसबुक पेज पर लिखी है।
लेखक पुष्कर अवस्थी ने यह पोस्ट अपने फेसबुक पेज पर लिखी है।

राष्ट्रवादियों का एक बड़ा वर्ग पिछले कुछ समय की घटनाओं से न सिर्फ उद्वेलित है बल्कि हताशा के चक्रव्यूह में फंसा महसूस कर रहा है। अब क्योंकि मेरे और आपमें देखने का दृष्टिकोण अलग है इसलिए मैं इसे आपकी एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया मानता है। आप 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्र मानते हैं, इसलिए पिछले 68 साल की विवशता और छटपटाहट आपको व्यग्र कर दे रही है वहीं मैं 16 मई 2014 को स्वतंत्र हुआ मानता हूँ। यह बीते 2 वर्ष मुझे वह दिखा रहे हैं, जिसे पहले जानते कुछ ही लोग थे लेकिन अब पूरा भारत भी देख रहा है और दुनिया भी देख रही है।
दरअसल 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों ने दिल्ली की गद्दी भारतीयों को नहीं दी थी बल्कि अपने सर्वश्रेष्ठ गुलामों को दी थी। जिस गुलाम प्रजाति के संरक्षण और परवरिश के लिए, अंग्रेजों ने कांग्रेस नाम की नर्सरी विकसित की थी उसी में से अंग्रेजों के जान, माल और राष्ट्रमण्डल के रसूख को सुरक्षित रखने के लिए कट्टिबद्ध कश्मीरी गुलाम को अपनी गद्दी सौपी थी।
आप मेरी बात को अतिशयोक्ति मत समझियेगा। भारत में गुलामों को सत्ता पहले भी दी गयी है।
मोहम्मद ग़ौरी ने पृथ्वीराज चौहान का हराकर दिल्ली को जीती थी। जब वह वापस अफगानिस्तान जाने लगा तब उसने दिल्ली की गद्दी की देखभाल के लिए अपने गुलाम को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया था। इस वंश का पहला शासक कुतुबुद्दीन ऐबक था और इस वंश ने दिल्ली की सत्ता पर 1206 से 1290 तक पूरे 84 वर्ष तक राज किया था।
इस वंश का शासक या संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक ग़ुलाम था इसलिए इसे राजवंश की बजाय सिर्फ़ गुलाम वंश कहा जाता है।
अब इस नेहरू-गांधी गुलाम वंश को अलविदा करने में पूरे 67 साल लगे हैं और इन सालों में हम वह गुलाम थे जिनके पैरों में बेड़ियां तो नही थी लेकिन आँख, कान और सोचने की क्षमता पर और आजाद होने के एहसास पर बेड़िया जरूर पड़ी थीं। हमारी बेड़ियां हटे अभी 2 साल ही तो हुए हैं और हम इस चकाचौंध से हतप्रभ हैं कि यह हो क्या रहा है?
यह कुछ नही हो रहा है, यह सिर्फ जो होता आया है और जिससे हम आँख चुराते रहते थे उसकी यह आत्मस्वीकृति है। मुझे लगता है कि हमने अपने शैशव काल में ही काफी दूरी तय कर ली है और आगे भी जो देखना और होना है वह व्यर्थ नही होगा।

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