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राजीव गांधी थे सबसे सांप्रदायिक प्रधानमंत्री!

मानसिक और वैचारिक तौर पर दिवालिया हो चुके जिन लोगों को 1984 के दंगों में 3 दिन के भीतर 3,000 लोगों का मार दिया जाना भीड़ के उन्माद की सामान्य घटना नज़र आती है, उन्हीं लोगों ने, गुजरात दंगे तो छोड़िए, उन्मादी भीड़ द्वारा दादरी में सिर्फ़ एक व्यक्ति की हत्या को देश में असहिष्णुता का महा-विस्फोट करार दिया था।
दरअसल सेक्युलरिज़्म की चिप्पी माथे पर चिपकाए ये वे सांप्रदायिक लोग हैं, जो इंसानी जानों की कीमत उनके संप्रदाय और ध्रुवीकृत होकर उनके वोट करने की प्रवृत्ति के आधार पर लगाते हैं। इसीलिए इन शातिर लोगों को 1984 में मारे गए लोगों की जान 2002 में मारे गए लोगों की जान से सस्ती लगती है, जबकि सचाई यह है कि 1984 का दंगा सिर्फ़ 2002 के दंगे से ही नहीं, आज़ाद भारत के किसी भी दूसरे दंगे से अधिक बड़ा और वीभत्स था। इसका ठीक से आकलन नहीं हो पाने की कई वजहें रहीं। मसलन,

  1. यह दंगा एक ऐसे संप्रदाय के ख़िलाफ़ था, जिसका देश की आबादी में हिस्सा मात्र पौने दो प्रतिशत है और दुनिया में उसका अस्तित्व इसी अल्प भारतीय आबादी पर टिका है।
  2. यह दंगा एक ऐसे संप्रदाय के ख़िलाफ़ था, जिसकी पंजाब जैसे छोटे राज्य से बाहर राजनीति को प्रभावित करने की हैसियत नहीं थी।
  3. यह दंगा एक ऐसे संप्रदाय के ख़िलाफ़ था, जिसके वोट के बिना भी इस देश में हत्यारी प्रवृत्ति के लोग ठाट से राज कर सकते हैं।
  4. जब यह दंगा हुआ, तब भारत में मीडिया इतना पावरफुल नहीं था कि वह राजनीति और समाज की सोच को पल-पल प्रभावित कर सके। दृश्य-श्रव्य मीडिया का अस्तित्व न के बराबर था। प्रिंट मीडिया का प्रसार भी इतना नहीं था। साक्षरता और संपन्नता कम होने से उनकी रीडरशिप भी कम थी। सोशल मीडिया तो था ही नहीं। देश की बड़ी आबादी के लिए सिर्फ़ सरकारी रेडियो था, जिसके ज़रिए सूचनाएं सेंसर होकर पहुंचती थीं।
  5. जब यह दंगा हुआ, तब विपक्ष काफी कमज़ोर था और कांग्रेस की जड़ें इतनी गहरी थीं कि उसके लोग पब्लिक को जो समझा देते थे, उसे ही पुराण, कुरान और बाइबिल समझ लिया जाता था।
  6. जब यह दंगा हुआ, तब देश में बुद्धिजीवियों के एक बड़े समूह की आत्मा कांग्रेस के पास बंधक थी। बचे-खुचे बुद्धिजीवियों के दिमाग से भी शायद ज़ुल्मी इमरजेंसी का ख़ौफ़ उतरा न था।
  7. इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर पर सवार होकर कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में 533 में से 404 सीटें जीत लीं। जब सरकार इतनी ताकतवर हो, तो किसकी हिम्मत थी उसके सामने तनकर खड़े होने की?

नतीजा यह हुआ कि दुनिया के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की राजधानी में एक अल्प आबादी वाले संप्रदाय के ख़िलाफ़ इतने भीषण नरसंहार के बाद उतना भी शोर नहीं हुआ, जितना हाल में हम सबने दादरी में सिर्फ़ एक व्यक्ति की हत्या के बाद सुना। खुशवंत सिंह और अमृता प्रीतम जैसे कतिपय सिख लेखकों को छोड़कर हिन्दू और मुस्लिम बिरादरी के ज्यादातर “धर्मनिरपेक्ष”, “प्रगतिशील” और “क्रांतिकारी” लेखक उन दिनों “सहिष्णुता” का अभ्यास कर रहे थे।

राजीव गांधी की सरकार ने निर्लज्जता की सारी हदें पार करते हुए दंगों की निष्पक्ष जांच कराना तो दूर, दंगाई समझे जाने वाले नेताओं को लगातार पुरस्कृत किया। हरकिशन लाल भगत राजीव के पूरे कार्यकाल में संसदीय कार्यमंत्री बने रहे। बीच में उन्हें सूचना प्रसारण मंत्रालय की भी ज़िम्मेदारी दी गई। इस दौरान भगत साहब ने दूरदर्शन को “राजीव का भगत” और “राजीव-दर्शन” बना डालने में अहम भूमिका निभाई।

इसी तरह, दंगाइयों के संरक्षक समझे जाने वाले दूसरे प्रमुख नेता जगदीश टाइटलर को भी दंगे के बाद के तीनों कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों – राजीव गांधी, पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने अपनी कैबिनेट में महत्वपूर्ण जगहें दीं। यानी दंगे के 20 साल बाद तक वे कांग्रेस आलकमान और प्रधानमंत्रियों के दुलारे बने रहे।

तीसरे आरोपी नेता सज्जन कुमार ने भी दंगों के 25 साल बाद तक मलाई चाटी। 1991 और 2004 में वे दोबारा और तिबारा सांसद बने एवं कई महत्वपूर्ण संसदीय समितियों के सदस्य रहे।

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