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ख़ुदा की नेमत! रिफ्यूजी कैंप में 2 साल में पैदा हो गए 91,000 बच्चे

Courtesy: Dhaka Tribune

दुनिया भर में रोहिंग्या घुसपैठियों की समस्या नासूर बनती जा रही है। ताज़ा मामला बांग्लादेश का है, जहां पर कई इलाक़ों में रोहिंग्या आबादी लोकल लोगों पर भारी पड़ने लगी है। ढाका में रोहिंग्या शरणार्थियों के कैंप चलाने वाली यूएन की संस्था के आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले दो साल में बांग्लादेश के अलग-अलग इलाकों में बनाए गए रोहिंग्या कैंपों में 91 हज़ार से ज़्यादा बच्चे पैदा हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयोग (UNHCR) की तरफ से हाल ही में जारी आंकड़ों के मुताबिक 2017 से 2019 तक 91 हजार से अधिक बच्चे पैदा हो चुके हैं। अधिकारियों का कहना है कि गर्भनिरोधक उपायों के बारे में बार-बार बताने और मुफ्त में बांटने के बावजूद रोहिंग्या शरणार्थी इन्हें इस्तेमाल करने को तैयार नहीं होते। हालत इतने बिगड़ चुके हैं कि नसबंदी जैसी कोशिशों पर ये लोग उग्र हो जाते हैं और पिछले कुछ महीनों में कई हेल्थ वर्कर्स पर जानलेवा हमले भी कर चुके हैं। यह भी पढ़ें: शरणार्थी बनकर आए थे, अब शरीयत चाहते हैं

आबादी विस्फोट के पीछे कट्टरपंथी

ढाका ट्रिब्यून अख़बार ने एक रिपोर्ट छापी है जिसमें 25 साल के सुलेमान की कहानी बताई गई है। पिछले साल उसकी शादी हुई और अभी वो 3 महीने की बच्ची का बाप है। पेशे से टीचर सुलेमान की बीवी दोबारा प्रेगनेंट हो चुकी है। उसका कहना है कि “बच्चे तो अल्लाह की नेमत हैं और हम चाहते हैं कि ये नेमत हम पर ज़्यादा से ज़्यादा बरसे। ताकि हम अपने दुखों को भूल सकें।” अख़बार के मुताबिक़ आबादी बढ़ाने की इस मानसिकता के पीछे रोहिंग्या मुसलमानों की कुछ संस्थाएँ हैं जो लोगों से कहती हैं कि आबादी बढ़ाते रहो, तभी ज़्यादा फ़ायदा है। ऐसा लगता है कि इसके पीछे कोई बड़ी मज़हबी कारण काम कर रहा है। क्योंकि महिलाएँ भी इस कदर ब्रेनवॉश्ड हैं कि बच्चे पैदा करने को जन्नत में अपनी जगह पक्की करने से जोड़कर देखती हैं। शरणार्थी कैंपों में खाना-पीना आराम से मिल जाता है इसलिए उन्हें भी बच्चे पैदा करना बेहतर लगता है क्योंकि खाने की कोई चिंता नहीं रहती। प्रेगनेंट महिलाओं को पोषक आहार के लिए अलग से पैसे भी मिलते हैं। जिसके कारण बच्चे पैदा करने की होड़ देखने को मिलती है।

नासूर बन चुके हैं रोहिंग्या शरणार्थी

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयोग (UNHCR) के अनुसार बांग्लादेश में इस समय करीब 13 से 15 लाख रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे हैं। 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने भाषण में कहा था कि बांग्लादेश में इस समय 11 लाख रोहिंग्या रह रहे हैं और उनकी आबादी तेजी के साथ बढ़ रही है। बच्चे पैदा करने का औसत बांग्लादेश के राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। इन कैंपों में 15 साल से लेकर 45 साल तक की गर्भवती महिलाएं दिख जाती हैं। चूंकि इलाज की ठीक-ठाक सुविधाएं मिल जाती हैं इसलिए जन्म के समय होने वाली मृत्यु का औसत भी काफी कम है। यह स्थिति तब है जब खुद बांग्लादेश के लोगों को अच्छे इलाज की सुविधाएं नहीं मिल पातीं। फिलहाल बांग्लादेश सरकार लगातार कोशिश में है कि किसी तरह उन्हें वापस म्यांमार भेजा जाए, लेकिन स्थिति यह है कि ये रोहिंग्या वापस जाने के बजाय भारत और भूटान जैसे गैर-मुस्लिम देशों में घुसने की ज्यादा फिराक में रहते हैं।

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