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कभी बीमारू था आज सबसे ज़्यादा एक्सप्रेसवे वाला प्रदेश बना यूपी

अपने पिछड़ेपन और ग़रीबी के कारण जाना जाने वाला उत्तर प्रदेश अब देश में सबसे ज़्यादा एक्सप्रेसवे वाला राज्य बन गया है। चित्रकूट से इटावा के बीच 297 किलोमीटर लंबे बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के शिलान्यास के बाद यूपी अब रफ़्तार की इस दौड़ में देश के तमाम विकसित राज्यों से आगे निकल गया है। यह एक्सप्रेसवे यूपी के सबसे पिछड़े माने जाने वाले बुंदेलखंड इलाके को दिल्ली से जोड़ देगा। इससे इस पूरे इलाके में आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी, जिसका असर यहां के लोगों की जिंदगी पर होगा। दरअसल इस समय यूपी में एक साथ कुल 7 एक्सप्रेसवे बनाने का काम चल रहा है। इनमें देश का सबसे लंबा गंगा एक्सप्रेसवे भी शामिल है। इसके अलावा चार नए एक्सप्रेसवे के लिए सर्वे का काम भी चल रहा है। इन सारी योजनाओं पर अमल के बाद पूरे उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे का जाल बिछ जाएगा और राज्य के सभी इलाकों से एक्सप्रेसवे के जरिए एक जगह से दूसरी जगह जाया जा सकेगा। एक्सप्रेसवे का यह काम नेशनल हाइवे की उन परियोजनाओं से अलग है जिन पर काम पहले से चल रहा है।

राजनीति से आगे बढ़े एक्सप्रेसवे

यूपी में मायावती सरकार के समय ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे और आगरा तक यमुना एक्सप्रेसवे बनाने का काम हुआ था। इसके बाद 2012 में जब अखिलेश यादव सरकार आई तो उन्होंने आगरा से लखनऊ तक एक नया एक्सप्रेसवे बनवाया। लेकिन वास्तव में ये दोनों एक्सप्रेसवे राजनीतिक फ़ायदे के मक़सद से बनवाए गए थे। मायावती का गाँव ग्रेटर नोएडा के बादलपुर में है, माना जाता है कि अपने गाँव को जोड़ने के लिए उन्होंने ये सड़क बनवाई थी। मायावती ने कुछ दूसरी एक्सप्रेसवे परियोजनाओं का एलान ज़रूर किया लेकिन उन पर काम कभी शुरू नहीं कराया। अखिलेश सरकार ने आगरा से लखनऊ एक्सप्रेसवे को इसलिए बनवाया ताकि उनके शहर इटावा को फ़ायदा हो। इसके कारण इन सारे इलाक़ों में प्रॉपर्टी के भाव कईगुना बढ़ गए जिसका राजनीतिक फ़ायदा भी इन पार्टियों के नेताओं को हुआ। लेकिन योगी सरकार आने के बाद से बाक़ायदा नीति बनाकर एक्सप्रेसवे का काम शुरू किया गया है। जिसका मक़सद किसी नेता के गाँव को दिल्ली से जोड़ना नहीं, बल्कि आम जनता की सहूलियत और प्रदेश का आर्थिक विकास है।

पूर्वांचल, बुंदेलखंड तक एक्सप्रेसवे

ये दोनों यूपी के सबसे पिछड़े इलाक़े हैं, लिहाज़ा उन्हें विकास की ज़रूरत सबसे पहले थी। लेकिन अब तक ये दोनों इलाक़े यूपी की सरकारों की तरफ़ से नज़रअंदाज़ किए जाते रहे हैं। योगी सरकार आने के बाद स्थिति बिल्कुल उलट चुकी है। लखनऊ से ग़ाज़ीपुर के बीच बन रहे 341 किलोमीटर लंबे पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर काम तेज़ी से चल रहा है। ये यूपी के सबसे पिछड़े ग़ाज़ीपुर, मऊ, आज़मगढ़, फ़ैज़ाबाद, सुल्तानपुर, अंबेडकरनगर और अमेठी ज़िलों को लखनऊ से जोड़ेगा। इसके लिए ज़मीन अधिग्रहण का काम लगभग पूरा हो चुका है। इसी साल के अंत तक इस एक्सप्रेसवे की मुख्य सड़क तैयार करने का टार्गेट दिया गया है। इसी तरह भुखमरी और सूखे के लिए बदनाम बुंदेलखंड इलाक़े से गुजरने वाला एक्सप्रेसवे बाँदा, हमीरपुर, जालौन जैसे ज़िलों को इटावा होते हुए दिल्ली से जोड़ेगा। इसके भी 2021 के अंत तक शुरू हो जाने का लक्ष्य रखा गया है। मेरठ से प्रयागराज तक गंगा एक्सप्रेसवे का भी बड़ा हिस्सा पूर्वी उत्तर प्रदेश में पड़ता है।

2022 से पहले बिछ जाएगा जाल

यूपी सरकार ने इस समय एक्सप्रेसवे और सड़कों का जाल बिछाने पर पूरी ताक़त झोंक रखी है। 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इनमें से ज़्यादातर प्रोजेक्ट को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इनमें दिल्ली-मेरठ, फ़रीदाबाद-नोएडा-गाजियाबाद, लखनऊ आउटर रिंग रोड, गोरखपुर लिंक रोड भी शामिल है। इस साल के बजट में योगी सरकार ने गंगा एक्सप्रेसवे के प्रोजेक्ट के लिए 2000 करोड़ रुपये दिए हैं। इसके 2024 तक पूरा होने का अनुमान है।  अभी देश में एक्सप्रेसवे के मामले में सिर्फ़ महाराष्ट्र से मुक़ाबला है। लेकिन इन सारे प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद यूपी महाराष्ट्र पर भी बड़ी बढ़त बना लेगा।

 

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