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जानिए दिल्ली में जीत के बीजेपी के भरोसे के पीछे क्या गणित है

लगभग सभी चैनलों के एग्जिट पोल ने यह माहौल बना दिया है कि 11 फ़रवरी को आने वाले चुनावी नतीजों में बीजेपी की बुरी हार होने वाली है। इन सभी की आमराय है कि आम आदमी पार्टी की सत्ता में ज़ोरदार तरीक़े से वापसी होने जा रही है। लेकिन बीजेपी के नेता अभी भी एग्जिट पोल के नतीजों पर भरोसा करने को तैयार नहीं दिख रहे। वैसे तो यह देखा जाता है कि पूरे नतीजे आने तक कोई नेता हार नहीं मानता। लेकिन बीजेपी के नेता निजी बातचीत में भी खुलकर बोल रहे हैं कि उनकी जीत पक्की है। कई ने बाक़ायदा सोशल मीडिया पर लिखकर 40 से 50 तक सीटें आने का पूर्वानुमान जताया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आख़िर इस आत्मविश्वास का कारण क्या है? इस बारे में हम आगे बता करेंगे लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि जिस आम आदमी पार्टी की निश्चित जीत की बात कही जा रही है उसके नेता अभी से EVM का रोना रो रहे हैं। जबकि यह सभी जानते हैं कि EVM में धांधली के आरोप बहानेबाजी से ज्यादा कुछ नहीं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी सत्ता में है, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में गड़बड़ी कितना नामुमकिन है यह उसके नेताओं को भी अच्छी तरह से पता है। यह भी पढ़ें: सट्टा बाजार के मुताबिक केजरीवाल की कु्र्सी गई

आख़िरी घंटों की वोटिंग से जगा भरोसा

दरअसल बीजेपी मानकर चल रही है कि आखिरी में पड़े 31.5% वोट ने उसकी जीत तय कर दी है। यही कारण है कि सारे एग्जिट पोल फेवर में आने के बावजूद अरविंद केजरीवाल को हार का डर सता रहा है और वो व उनका ईकोसिस्टम अभी से बीजेपी पर EVM हैकिंग का आरोप लगाने लगा है। चुनावी इतिहास में यह पहली बार है कि जिसके फेवर में एग्जिट पोल है, वह डरा हुआ है। आप जानते हैं क्यों? आइए इस बात को समझते हैं:

1. सभी एग्जिट पोल में आंकड़े दोपहर 2.30 से 3 बजे तक के हैं, जब केवल 30.18 प्रतिशत वोटिंग हुई थी।
2. कई पोलिंग बूथ पर रात के 8 बजे तक वोटिंग हुई और वोट प्रतिशत 61.71 फ़ीसदी तक पहुँच गया।
3. मतलब यह कि एग्जिट पोल वालों ने 31.5% मतदान की थाह लेने में असफल रहे। ये वो मतदाता हैं जो 4 से 6 बजे के बीच पोलिंग स्टेशन पहुंचा था।
4. यह देखा गया कि मुस्लिम इलाक़ों में 3 बजे तक वोटिंग का काम लगभग पूरा हो गया था।
5. देर से आने वाले ज़्यादातर वोटर वो होते हैं जिन्हें कार्यकर्ता जबरन पोलिंग बूथ तक लेकर जाते हैं। इस काम में बीजेपी सबसे माहिर मानी जाती है।
6. मुस्लिम इलाकों में ज़्यादा वोटिंग हुई, लेकिन उनका असर 12 से 15 विधानसभा सीटों तक ही है।
7. कई लोगों ने लिखा है कि बूथों पर AAP के टेबल खाली पड़े थे और बीजेपी वाले लोगों को घरों से निकाल-निकाल कर वोट करवा रहे थे।
8. 30.18 फ़ीसदी वोटिंग के आंकड़े पर जब एग्जिट पोल बीजेपी को 9 से 23 सीट दे रहे हैं, तो फिर आखिरी के 31.5% वोट में यदि 20% भी भाजपा को मिला तो फिर उसकी सीट कितनी हो जाएगी?
9. केजरीवाल और उनका ईकोसिस्टम कांग्रेस के वोट पर खेल रहा है, जबकि वह भूल रहा है कि आखिरी में पड़ा करीब 31% वोट में शायद ही कांग्रेस को कुछ मिला होगा।
10. केजरीवाल, संजय सिंह, मनीष सिसोदिया, प्रशांत किशोर और इनके पूरे ईकोसिस्टम ने आखिरी में पड़े इसी 31.5% मतदान के डर से EVM राग छेड़ दिया है। ये इशारा है कि उन्हें हार का डर सता रहा है, जिसके लिए वह ईवीएम पर ठीकरा फोड़ने की तैयारी शुरू हो गई है। ताकि 11 फरवरी को नया कोहराम मचाया जा सके। यह भी पढ़ें: शाहीन बाग़ में बुर्के में पकड़ी गई लड़की कांग्रेसी निकली

वोट प्रतिशत को लेकर भी है ग़लतफ़हमी

मीडिया ने बार-बार कहा कि इसबार पिछली बार की तुलना में मतदान बहुत कम हुआ है और इसका नुकसान भी BJP को हुआ होगा। लेकिन यह बात सही नहीं है। दरअसल दिल्ली चुनाव में जितना मतदान हुआ है, वह दिल्ली के इतिहास में सर्वाधिक है. दिल्ली में कभी किसी चुनाव में इतनी बड़ी संख्या में मतदान नहीं हुआ। आप मित्र भी मेरी बात से चौंक गए होंगे, लेकिन सच यही है। अब जानिए कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं। 2015 में दिल्ली में मतदाताओं की संख्या 1,33,09078 थी। और मतदान का प्रतिशत था 67.47 अर्थात्‌ कुल 89,79,635 वोट पड़े थे। इसबार 2020 में दिल्ली में मतदाताओं की संख्या थी
1,46,92136 और मतदान का प्रतिशत रहा है 61.67 यानी कुल 9060640 वोट डाले गए। 2015 की तुलना में इसबार पड़े मतों की संख्या 81,000 से अधिक है। दिल्ली के चुनावी इतिहास में यह अबतक की सबसे बड़ी संख्या है। अब यह भी जान लीजिए कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 40,20,931 वोट मिले थे जबकि AAP को 2850524 मत मिले थे। दोनों के बीच 1169668 मतों का अन्तर था। जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में यह अंतर 2014 की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक बढ़कर 33.43 लाख मतों का हो गया था क्योंकि बीजेपी को 4903109 और AAP को केवल 1559844 मत मिले थे। यह भी पढ़ें: क्या सत्ता बचा पाएंगे केजरीवाल, जानिए क्या कहती है कुंडली?

2015 की कमजोरी इस बार नहीं थी

2015 में बीजेपी की हार के 2 मुख्य कारण यह थे कि मोदी सरकार बने केवल 8 माह हुए थे। गरीब और लोकहित की कोई योजना प्रारम्भ या लागू होना तो दूर, तक तबतक ऐसी किसी योजना की घोषणा भी नहीं हुई थी। इसके विपरीत गरीब की थाली के ज़रूरी सामान जैसे दाल वग़ैरह के दाम आसमान में थे। डीज़ल पेट्रोल को भी सरकार सस्ता नहीं कर रही थी। इसे लेकर मोदी समर्थकों में भी नाराज़गी थी। जबकि केजरीवाल ऐसी किसी आकांक्षा पूर्ति के दायित्व की जवाबदेही से पूर्णतः मुक्त होकर लोकलुभावन वायदों की भरमार के साथ मैदान में उतरे थे। 49 दिनों की उनकी सरकार में बिजली-पानी मुफ़्त करने के अधूरे एलानों का असर देखना अभी बाक़ी था। ये असर ऐसा था कि कई बीजेपी समर्थकों ने भी केजरीवाल को ही वोट दिया।

इसबार भाजपा जब मैदान में उतरी तो उसकी झोली में प्रधानमंत्री आवास योजना, 10 करोड़ से अधिक शौचालय निर्माण एवं उज्ज्वला सौभाग्य आयुष्मान, मुद्रा योजना, 12 रुपये प्रीमियम वाले 2 लाख के बीमा, किसान सम्मान निधि सरीखी 50 से अधिक ऐसी योजनाओं के सफ़लतापूर्वक संचालन की उन उपलब्धियों से भरी हुई थी। सबसे बड़ी बात तो ये कि कच्ची कॉलोनियों को रेगुलर करके उसने वो वादा पूरा किया जिसके नाम पर शीला दीक्षित ने दिल्ली में 3-3 बार चुनावी जीत हासिल की थी। 2019 में दोबारा सत्तारूढ़ होने के बाद उनके कामों ने इतिहास रचा है, जबकि इसके विपरीत खुद केजरीवाल सरकार के दस्तावेज ही बता रहे हैं कि 5 साल में उसने अपने अपने ज़्यादातर वादे पूरे नहीं किए हैं। ऐसे में केजरीवाल को जनता प्रचंड बहुमत देगी यह बात किसी के भी गले नहीं उतर रही है।
(न्यूज़लूज़ टीम)

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