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वो हत्यारे मक़बूल भट को नहीं भूले, हमने शहीद रवींद्र म्हात्रे को भुला दिया

तस्वीर में बायीं तरफ़ दिख रहे रविंद्र म्हात्रे हैं, जबकि दायीं तरफ़ टाई में आतंकवादी मक़बूल भट है।

नीचे तस्वीर में जो पुल दिख रहा है वो महाराष्ट्र के पुणे शहर में है। इसे म्हात्रे ब्रिज या म्हात्रे पुल के नाम से जाना जाता है। ये पुल सारसबाग को डेक्कन एरिया से जोड़ता है। इस पुल से रोज़ हज़ारों लोग आते-जाते हैं लेकिन शायद कुछ ही लोग होंगे जिन्हें पता हो कि ये ‘म्हात्रे’ कौन हैं जिनके नाम पर ये पुल है। दरअसल पुणे शहर में बने इस पुल का नाम रविंद्र हरेश्वर म्हात्रे के नाम पर रखा गया है। वो ब्रिटेन के बर्मिंघम में भारतीय दूतावास में बतौर राजनयिक तैनात थे। 1984 में वहीं पर कश्मीरी आतंकवादियों ने बेहद बर्बर तरीक़े से उनकी हत्या कर दी थी। उस समय म्हात्रे की उम्र 48 साल थी। आतंकवादियों ने उनका अपहरण कर लिया और भारत सरकार से मोलभाव शुरू किया कि अगर जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट यानी JKLF के आतंकवादी मकबूल भट को रिहा कर दिया जाए तो वो म्हात्रे को छोड़ देंगे। म्हात्रे की हत्या की ये पूरी कहानी हम आपको आगे बताएंगे, पहले जानिए कि मकबूल भट कौन था।

आज भी जिहादियों का हीरो है मक़बूल भट

जेएनयू में जब अफ़ज़ल गुरु और याकूब मेमन के समर्थन में नारे लगाए गए थे, तो वहाँ एक तीसरा नाम भी लिया जा रहा था। वो नाम था मक़बूल भट का। कश्मीरी आतंकवादी ही नहीं, जिहादी सोच वाले कई दूसरे लोग भी मक़बूल भट को अपना हीरो मानते हैं। 1971 में लाहौर जा रहे इंडियन एयरलाइंस के विमान हाईजैक कांड में मक़बूल भट का नाम सामने आया था। उसने विमान में सवार 30 यात्रियों के बदले में भारत की जेलों में बंद 30 यात्रियों को छोड़ने की शर्त रखी। चूँकि ज़्यादातर यात्री मुसलमान थे इसलिए मक़बूल ने उन्हें उतारकर विमान को बम से उड़ा दिया और यात्रियों को दूसरी फ़्लाइट से वापस भिजवा दिया। इस घटना के बाद भारत ने अपने आसमान से पाकिस्तानी विमानों के उड़ान भरने पर पाबंदी लगा दी। 1976 में भारतीय सुरक्षाबलों ने उसे पीओके के रास्ते भारतीय कश्मीर में चोरी-छिपे घुसने की कोशिश करते पकड़ लिया। मक़बूल भट को पहले से ही कश्मीर में पुलिस इंस्पेक्टर अमरचंद की हत्या के केस में सज़ा ए मौत मिली हुई थी। फाँसी की तैयारियाँ अभी चल ही रही थीं कि मक़बूल को छुड़ाने के लिए आतंकवादियों ने नई साज़िश चल दी।

मक़बूल को छुड़ाने के लिए म्हात्रे की हत्या

कश्मीरी आतंकवादियों ने मक़बूल को फाँसी से बचाने के लिए बर्मिंघम में भारतीय राजनयिक रविंद्र म्हात्रे को अगवा कर लिया। जिस समय उनका अपहरण हुआ वो एक बेकरी से अपनी बेटी के जन्मदिन का केक ख़रीदकर बाहर आ रहे थे। उस समय उनकी बेटी की उम्र मात्र 14 साल हुआ करती थी। उन दिनों इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। उन्होंने मक़बूल भट को छोड़ने की आतंकवादियों की शर्त मानने से इनकार कर दिया। इसके तीन दिन बाद 6 फ़रवरी को रवींद्र म्हात्रे का शव बर्मिंघम में सड़क के किनारे पड़ा हुआ पाया गया। शव को देखकर लगता था कि उन्हें काफ़ी टॉर्चर किया गया था। रविंद्र म्हात्रे की हत्या के छह दिन बाद मक़बूल भट को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फाँसी पर लटका दिया गया। इस घटना के कुछ महीने बाद इंदिरा गांधी मुंबई के विक्रोली में म्हात्रे के बुजुर्ग माता-पिता से मिलने पहुँचीं थीं और उनसे मिलकर माफ़ी माँगी थी कि वो उनके बेटे को बचा नहीं पाईं, क्योंकि उनके हाथ बंधे हुए थे।

पुणे का म्हात्रे पुल Photo Tweeted by @Devarshi_2010

रवींद्र म्हात्रे की हत्या से उनका परिवार बिल्कुल टूट गया। उनके नाम पर पुणे में एक पुल का नाम रख दिया गया और देश ने उन्हें भुला दिया। लेकिन उनकी हत्या के लिए ज़िम्मेदार आतंकवादी मक़बूल भट को उसकी विचारधारा के जिहादियों ने आज तक नहीं भुलाया है।

(न्यूज़लूज़ टीम)

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