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ज़ोरावर सिंह, वो योद्धा जिसने कैलाश मानसरोवर को भारत में मिलाया था

अक्सर कहा जाता है कि भारतीयों ने कभी अपनी सीमा के बाहर किसी दूसरे देश पर हमला नहीं किया। लेकिन आज हम आपको बताएँगे एक ऐसे भारतीय के बारे में जिसने न सिर्फ़ भारतीय सीमा के बाहर जाकर दूसरे देश के इलाक़े को जीता, बल्कि वहाँ के लोगों के दिलों को भी जीतने में कामयाबी पाई। हम बात कर रहे हैं जनरल ज़ोरावर सिंह की, जिनकी कहानी आज भी बहुत सारे लोग नहीं जानते। हमें पढ़ाई जाने वाली इतिहास की किताबों में मुग़ल आक्रमणकारियों का इतना महिमामंडन है कि उसमें बाक़ी बहादुर राजाओं की वीरता के किस्से लगभग ग़ायब ही कर दिए गए। जनरल ज़ोरावर सिंह जम्मू कश्मीर के राजा गुलाब सिंह के सेनापति थे। 1786 में जन्मे ज़ोरावर सिंह ने 57 साल की उम्र में 1841 में वीरगति पाई थी। उनकी आख़िरी लड़ाई तिब्बत के इलाक़े में पड़ने वाले कैलाश मानसरोवर की थी, जिसे उनकी सेनाओं ने जम्मू कश्मीर का हिस्सा बना लिया था। कैलाश मानसरोवर ही नहीं… जनरल ज़ोरावर सिंह ने लद्दाख, बल्टिस्तान, स्कार्दू जैसे इलाकों को जीता था। लद्दाख अगर आज भारत में हैं उसका पूरा श्रेय जनरल ज़ोरावर सिंह को ही जाता है। यही कारण है कि उन्हें भारत का नेपोलियन कहा जाता है। (नीचे देखें वीडियो)

जनरल ज़ोरावर का ऋणी है भारत

यह बात आज कम लोग जानते हैं कि क़रीब 200 साल पहले उन्होंने यह बात समझ ली थी कि उत्तर में पहाड़ों पर क़ब्ज़ा ज़रूरी है, ताकि उसके पार से होने वाले ख़तरों से देश को बचाया जा सके। ये वो समय था जब ज़्यादातर राजा मैदानी इलाक़ों में सैनिक अभियान चलाया करते थे जनरल ज़ोरावर सिंह ने धारा के विपरीत यानी दुर्गम पहाड़ी इलाक़ों को देश में मिलाने का काम शुरू किया। उन्होंने लद्दाख के अलावा गिलगिट, बल्टिस्तान और स्कार्दू पर जीत हासिल की। इस तरह से उन्होंने 70 लाख 30 हज़ार स्क्वायर मीटर से भी ज़्यादा इलाक़ा जम्मू रियासत में जोड़ा। 19 हज़ार फुट ऊँचे ग्लेशियरों को पार करके वो मात्र छह दिन में लेह तक पहुँच गए थे। ज़ोरावर सिंह ने वो इलाक़े भी जीते जो आज पाकिस्तानी क़ब्ज़े वाले कश्मीर में हैं। अगर इन इलाक़ों पर आज भारत का दावा है तो इसका श्रेय भी जनरल ज़ोरावर सिंह को जाता है।

लेह में जनरल ज़ोरावर सिंह का क़िला

कैलाश मानसरोवर को भी मिलाया

जनरल ज़ोरावर सिंह इकलौते भारतीय थे जिन्होंने भगवान शिव के स्थान कैलाश मानसरोवर को भारतीय इलाक़े में मिला लिया था। मई 1841 में वो 5 हज़ार सैनिकों के साथ तिब्बत पर विजय के लिए निकले थे। यहाँ पर युद्ध में उनकी जीत हुई और कैलाश मानसरोवर और राक्षस ताल के पूरा इलाक़े पर क़ब्ज़ा हो गया। उस इलाक़े में वो आक्रमणकारी थे, लेकिन उन्होंने कभी आम लोगों का खून नहीं बहाया। वो प्रजा के सुख-दुख का ध्यान रखते थे। नतीजा ये हुआ कि जनरल ज़ोरावर सिंह को वहाँ के लोग भगवान की तरह पूजने लगे। वो उसी इलाक़े में रहने भी लगे। दिसंबर 1841 को तिब्बती राजा की सेना ने उन पर दोबारा हमला किया। दिसंबर में यहाँ में कड़ाके की सर्दी पड़ रही होती है और पूरा इलाक़ा बर्फ़ से ढका होता है। युद्ध में उनकी सेना हारने लगी। 12 दिसंबर 1841 को जनरल ज़ोरावर सिंह को गोली लग गई। दुश्मनों ने उन्हें घेर लिया, इसके बावजूद वो आख़िरी सांस तक लड़ते रहे। इस युद्ध में ज़ोरावर सिंह की वीरता से प्रभावित होकर तिब्बती राजा ने उसी जगह पर उनकी समाधि बनवाई। इस समाधि पर तिब्बत के लोग आज भी उनकी पूजा करते हैं।

तिब्बत में कैलाश मानसरोवर के पास तोयो नाम की जगह पर ज़ोरावर सिंह की समाधि

बेकार चली गई ज़ोरावर की वीरगति

इतिहास का ये वो इकलौता समय था जब कैलाश मानसरोवर भारतीय भूभाग का हिस्सा बना था। हालाँकि ये क़ब्ज़ा कुछ महीनों तक ही रहा। कुछ लोग दावा करते हैं कि बाद के समय में भी तकनीकी रूप से ये इलाक़ा जम्मू कश्मीर स्टेट का ही हिस्सा थी क्योंकि ज़ोरावर सिंह भले ही हार गए थे, लेकिन वहाँ के लोगों ने उन्हें अपना मसीहा मान लिया था। कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्री उनकी समाधि के दर्शन करने भी जाते रहे हैं। ज़ोरावर सिंह के निधन के बाद भारतीय लोग बड़े आराम से कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्रा पर जाते रहे। उन्होंने कभी इस इलाक़े को भारतीय इलाक़े से अलग नहीं माना। हालाँकि बाद में अंग्रेजों ने इस इलाक़े में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। आज़ादी के बाद अगर भारत सरकार चाहती तो इस इलाक़े को सीमा में मिलाना बहुत मुश्किल नहीं था, क्योंकि तब ये पूरा इलाक़ा एक तरह का नो-मेंस लैंड था। तब चीन भी यहाँ नहीं था। हिंदुओं की आस्था के इस केंद्र के महत्व को जनरल ज़ोरावर सिंह ने तो समझा था, लेकिन आज़ादी के बाद जवाहरलाल नेहरू ने इसका महत्व नहीं समझा। नतीजा यह कि आज भारतीयों को चीन का वीज़ा लेकर कैलाश मानसरोवर जाना पड़ता है।

लेह के क़िले में जनरल ज़ोरावर सिंह का वॉर रूम।

लेह में है ज़ोरावर सिंह का क़िला

लद्दाख पर जीत के बाद जनरल ज़ोरावर ने वहाँ पर अपना क़िला बनाया था। यहीं से वो ज़्यादातर सैनिक अभियानों के लिए रवाना हुए। लेह के क़िले में ज़ोरावर सिंह की घुड़सवार सेना रहा करती थी। आज भी यहाँ पर अच्छी नस्ल के घोड़े तैयार करने का काम चलता है। यहाँ से लेकर तिब्बत तक उन्होंने कई छोटे गढ़ भी बनवाए ताकि जीते इलाक़ों पर क़ब्ज़ा बनाए रखा जा सके। लेकिन उनके वीरगति प्राप्त करने के बाद सारा अभियान ठप पड़ गया। ज़ोरावर सिंह न सिर्फ़ महान योद्धा बल्कि बेहद कुशल प्रशासक भी थे। वो बेहद धार्मिक व्यक्ति थे और इतने इलाक़े जीतने के बाद भी जम्मू रियासत और वहाँ के राजा गुलाब सिंह के लिए वफ़ादार बने रहे। जनरल ज़ोरावर सिंह का जन्म हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में एक डोगरा राजपूत परिवार में हुआ था। बाद में वो जम्मू पहुँचे और वहाँ पर राजा गुलाब सिंह के सेनापति बने। उनके बारे में मशहूर है कि किसी इलाक़े पर जीत के बाद जो संपत्ति या तोहफ़े मिलते थे वो उन्हें ख़ुद न रखकर राजा के पास भिजवा दिया करते थे। उन्होंने अपने पास कोई संपत्ति नहीं रखी। शायद इसी का नतीजा है कि आज भी राजा गुलाब सिंह से ज़्यादा लोग उनके सेनापति जनरल ज़ोरावर सिंह को लोग जानते हैं।

ज़ोरावर सिंह के क़िले में रखे उनके हथियार। चौथी तस्वीर क़िले की दीवार की है, जिससे दुश्मन की नज़र से बचते हुए उस पर गोली चलाई जा सकती थी।

आज उपेक्षित है ज़ोरावर सिंह की समाधि

तिब्बत में ज़ोरावर सिंह की समाधि बेहद जर्जर हालत में है। लोग वहाँ पूजा तो करते हैं लेकिन समाधि की कोई देखरेख नहीं होती। स्थानीय भाषा में उसे सिंगलाका चौतरा कहा जाता है। आसपास के गाँववालों का मानना है कि समाधि पर आने से उनकी सारी मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं।

जनरल ज़ोरावर सिंह का कवच और ढाल। ये वो सामान थे जो उन्होंने अपने आख़िरी युद्ध में भी पहने थे।

जनरल ज़ोरावर सिंह की कहानी, देखें वीडियो:

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