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जानिए एअर इंडिया को बेचना देश के लिए अच्छा है या बुरा?

केंद्र सरकार ने सरकारी एयरलाइंस कंपनी एयर इंडिया को बेचने की प्रक्रिया एक बार फिर से शुरू की है। सरकार एअर इंडिया का 100 फ़ीसदी विनिवेश यानी पूरी हिस्सेदारी बेचना चाहती है। इसके लिए 17 मार्च तक खुली बोलियाँ मंगाई गई हैं। कोई भी ऐसी कंपनी जिसका नेटवर्थ ₹3500 करोड़ से अधिक हो वो बोली लगा सकती है। कुल मिलाकर उम्मीद की जा रही है कि इस साल जून, जुलाई तक सरकार एयर इंडिया से पल्ला झाड़ लेगी। कई लोग इस कदम का समर्थन कर रहे हैं, जबकि सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे कुछ लोग इसका विरोध भी कर रहे हैं। स्वामी ने तो इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाने तक का एलान कर दिया है। दूसरी तरफ़ आरएसएस ने सरकार से अपील की है कि एअर इंडिया को किसी भारतीय कंपनी को ही बेचा जाए। जानते हैं दोनों पक्षों की दलील क्या है और किस आधार पर इस कदम का विरोध या समर्थन किया जा रहा है।

एअर इंडिया को बेचना ज़रूरी क्यों?

यह बात लंबे समय से कही जाती रही है कि सरकार का काम बिज़नेस करना नहीं है। एअर इंडिया को तो सफ़ेद हाथी ही कहा जाता है। ये कंपनी आज से नहीं बल्कि कई दशक से घाटे में चल रही है। कांग्रेस सरकार के दौर में इसका घाटा 60,074 करोड़ रुपये पहुँच चुका था। जो मोदी सरकार आने के बाद से कम होते-होते 23,286 करोड़ पर आया है। हज़ारों करोड़ रुपये का ये घाटा कैसे पाटा जाता है? ज़ाहिर सी बात है जनता के टैक्स के पैसे से। यानी वो आम लोग भी जो कभी हवाई जहाज़ से सफ़र नहीं करते वो भी एअर इंडिया का बोझ उठा रहे हैं। लेकिन फिर सवाल उठता है कि कंपनी को घाटा क्यों हो रहा है? बाक़ी निजी एयरलाइंस तो मज़े से मुनाफ़ा कमा रही हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कंपनी का सरकारी सिस्टम। कर्मचारियों को मालूम है कि कंपनी घाटे में जाए या कूड़ेदान में, उनकी नौकरी नहीं जाएगी। ऊपर से सैलरी की पूरी गारंटी है। कहीं भी जाने के लिए हवाई टिकट देखिए आप पाएँगे कि प्राइवेट एयरलाइंस की टिकटें सस्ती होती हैं और उसी रूट पर एयर इंडिया की टिकट सबसे महँगी होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि एअर इंडिया में प्रति यात्री लागत सबसे ज़्यादा है। मतलब पैसा दोगुना दो और सेवाएं एकदम घटिया। अधिकांश स्टाफ नाते-रिश्तेदारी में भरा गया है। मां एयर होस्टेस, बेटी या बेटा पायलट के ढेरों उदाहरण मिल जाएँगे। एअर इंडिया के कर्मचारियों को इतने फ्री पास मिलते हैं कि प्लेन में उनका स्टाफ और परिवार वाले ज्यादा और यात्री कम होते हैं। एअर इंडिया नेताओं और अधिकारियों को भी खूब मुफ्त यात्राएँ कराता है। उसका खर्चा भी घाटे में जाता है। एअर इंडिया में जरूरत से ज्यादा कर्मचारी हैं। पिछली सरकारों के समय विदेशों में महँगी लोकेशन पर बेमतलब बड़े-बड़े ऑफिस खोले गए जिन पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते रहे। इस बहाने अफ़सर और कर्मचारी विदेशी पोस्टिंग का मज़ा उठाया करते थे। समय के साथ इन आदतों में काफ़ी कटौती हुई है, लेकिन पुराना घाटा और काम के लिए रवैया सुधारना बेहद मुश्किल है। एयर इंडिया में सुधार और पेशेवर तौर-तरीकों से चलाने की अब तक की सारी कोशिश इसी कारण फेल होती रही हैं।

एअर इंडिया बेचने का विरोध क्यों?

एअर इंडिया को बेचने का विरोध करने वालों की लॉबी भी काफ़ी बड़ी है। आरएसएस से जुड़ा भारतीय मज़दूर संघ इसका विरोध करता है। कंपनी के भारी-भरकम घाटे के लिए मोटे तौर पर कांग्रेस की पिछली सरकारों को ज़िम्मेदार माना जाता है। लेकिन ख़ुद कांग्रेस के नेता इसे बेचने का विरोध करते हैं। एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल को तो एयर इंडिया को कंगाल कर देने का श्रेय दिया जाता है। लेकिन उनकी पार्टी भी इस कदम की विरोधी है। चीन में कोरोनावायरल फैलने के बाद वहाँ फँसे भारतीयों को लाने की ज़िम्मेदारी एयर इंडिया को ही सौंपी गई थी। विरोध करने वाले पूछ रहे हैं कि अगर कंपनी बिक गई तो ऐसे देशहित के मामलों में कौन सी एयरलाइंस आगे आएगी? सरकार के पास अपनी एक एयरलाइंस होनी चाहिए जो मुश्किल समय में देश के काम आए। दूसरी बड़ी दलील यह है कि अभी एयर इंडिया कई ऐसे रूट पर भी उड़ान चलाता है, जहां ज़्यादा यात्री नहीं हैं और उन पर ऑपरेशन से नुक़सान उठाना पड़ता है। एयर इंडिया बिकने के बाद इन रूटों पर ज़ाहिर है कोई एयरलाइंस विमान उड़ाने को तैयार नहीं होगी। इससे कई छोटे हवाई अड्डों के आगे संकट पैदा हो जाएगा और उन इलाक़ों में कनेक्टिविटी की समस्या पैदा हो जाएगी। विरोध करने वालों की एक भावनात्मक दलील यह है कि एयर इंडिया जैसी कंपनी देश की पहचान हैं। वो हमारी संपत्ति हैं और उन्हें बेचा नहीं जाना चाहिए। इसके बजाय कंपनी को घाटे से उबारकर बेहतर तरीक़े से चलाने की कोशिश की जानी चाहिए।

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