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जानिए असम पर इस्लामी ‘गिद्ध दृष्टि’ का पूरा इतिहास

प्रतिनिधि चित्र

देश में इन दिनों जेएनयू के एक कट्टरपंथी छात्र के बयान पर बवाल मचा हुआ है कि असम को भारत से अलग कर दिया जाए। शरजील इमाम नाम के तथाकथित छात्र ने यह बात अलीगढ़ में एक भाषण में कही। लेकिन क्या आपको पता है कि असम को भारत से अलग करने का सपना हाल-फिलहाल का नहीं है। असम पर औरंगज़ेब के ज़माने से मुसलमानों की गिद्ध दृष्टि रही है। बाद में मोहम्मद अली जिन्ना भी असम को हड़पना चाहता था। औरंगज़ेब और जिन्ना तो सफल नहीं हुए, लेकिन बीते कुछ दशकों में धीरे-धीरे आबादी बढ़ाकर मुसलमानों ने असम को काफ़ी हद तक अपने चंगुल में ले लिया है। मुस्लिम कट्टरपंथियों के लिए असम क्यों इतना महत्वपूर्ण है और वो क्यों इसे जीतना और भारत से अलग करना चाहते हैं इस बात को समझने के लिए आपको इतिहास के कुछ पन्ने पलटने होंगे। सबसे पहले बात जिन्ना की।

जिन्ना के पहले से असम पर नज़र

आजादी से ठीक पहले साल 1943 में जिन्ना ने एक लेख में लिखा कि “अगले मुस्लिम लीग के नेता कुछ साल पहले से कोशिश करते तो पूरे असम को मुस्लिम बहुल बनाया जा सकता था, अब भी अगले कुछ साल में हम पूरे असम को मुस्लिम बहुल आबादी में बदल सकते हैं।” जिन्ना का वो लेख इकलौता नहीं है। देश के बंटवारे के पहले से असम पर जिन्ना की नज़र थी। 1905 में बंगाल के विभाजन के अगले साल यानी 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना की गई थी। उन दिनों किसी को कल्पना नहीं थी कि ये संगठन एक दिन देश के बँटवारे का कारण बनेगा। ढाका की मुस्लिम लीग ने स्थापना के फ़ौरन बाद जो अपील जारी की उसमें कहा गया कि बंगाल के मुसलमानों को असम में जाकर बसना चाहिए। मुसलमानों ने इस पर अमल शुरू भी कर दिया। 1930 का दशक आते-आते हालात ख़तरनाक हो गए। देखते ही देखते असम के कई इलाक़ों में मुसलमानों की बस्तियाँ बस चुकी थीं। यह भी पढ़ें: जानिए चिकेन नेक पर क्यों है देशविरोधी ताक़तों की नज़र

असम के मूलनिवासियों का प्रतिरोध

1937 में देशभर में चुनाव कराए गए थे। इन चुनावों में असम कांग्रेस के नेता गोपीनाथ बोरदोलोई ने राज्य में मुस्लिम बसावट को मुद्दा बनाया। असमिया हिंदू आबादी ने उन्हें खूब समर्थन दिया, जिसके दम पर असम स्टेट में कांग्रेस की सरकार बन गई। गोपीनाथ बोरदोलोई ने मुस्लिम घुसपैठियों के इलाक़ों को ख़ाली कराने का काम शुरू किया, लेकिन तभी अचानक 1939 में कांग्रेस हाईकमान ने ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विरोध में अपनी सभी प्रदेश सरकारों से इस्तीफा दिलाने का एलान कर दिया। यह बात ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में दर्ज है कि तब कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने वाले सुभाषचंद्र बोस ने सलाह दी थी कि बाक़ी सरकारें तो ठीक हैं, लेकिन असम की बोरदोलोई सरकार से इस्तीफ़ा न लिया जाए। लेकिन कांग्रेस के बाक़ी नेताओं ने उनकी बात नहीं मानी और गोपीनाथ बोरदोलोई को भी झुकते हुए इस्तीफ़ा देना पड़ा। यह भी पढ़ें: बगदादी के रास्ते पर चल पड़ा है असम

असम पर मुस्लिम लीग का क़ब्ज़ा

कांग्रेस की सरकार के इस्तीफ़े के बाद दूसरे नंबर की राजनीतिक ताक़त बन चुकी मुस्लिम लीग को मौक़ा मिल गया। उसने अपनी सरकार बना ली और मियां सादुल्ला खान नाम का कट्टरपंथी इस्लामी नेता असम का मुख्यमंत्री बन बैठा। सत्ता में आते ही उसने घोषणा की कि असम में खाली पड़ी जमीनें बंगाल से आकर बसने वाले मुस्लिमों को मुफ़्त में दी जाएंगी, ताकि वो उन पर खेती कर सकें। नतीजा हुआ कि असम में जो मुस्लिम जनसंख्या 1901 में 14 प्रतिशत थी वो 1941 तक 32 फीसदी हो गई। उन दिनों ब्रिटिश सरकार के वायसराय लॉर्ड वेवल ने अपनी डायरी में लिखा है कि “सादुल्ला खान ने दुनिया को ये दिखाया कि वो असम में अन्न उत्पादन बढ़ाने के लिए ये कर रहा है लेकिन असल में वो असम को मुस्लिम बहुल बनाना चाहता था। यह बात सभी समझ रहे थे। कांग्रेस के नेता भी।” यह भी पढ़ें: मुस्लिम लड़कियों से इतना डरते क्यों हैं मौलवी?

असम के हालात से दुखी थे गांधी

मुस्लिम आबादी 25 फ़ीसदी होते ही असम में मुसलमानों ने अलग मुस्लिम देश के तौर पर आज़ादी की माँग शुरू कर दी। 1944 तक आते-आते मामला बहुत बढ़ गया तो महात्मा गांधी बहुत नाराज़ हुए। यहां तक कि पहली बार गांधी ने हिंसा की वकालत की और असम के हालात को सुधारने के लिए अहिंसा का रास्ता तक छोड़ देने के लिए कहा। असम पर लिखी किताब ‘स्ट्रेंजर्स ऑफ द मिस्ट’ में संजॉय हज़ारिका गांधी के सचिव और डायरी लेखक प्यारेलाल नैयर के हवाले से लिखते हैं कि, बापू ने तब 1944 में पंचगनी में कहा था कि “अगर असम के लोगों को लगता है कि मुस्लिम बसावट को लेकर सरकार की वर्तमान नीति दमनकारी और राष्ट्र-विरोधी है, तो उन्हें इसके लिए अहिंसक तरीके से और अगर ज़रूरत पड़े तो हिंसक तरीके से भी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए।”

श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने असम को बचाया

देश के बंटवारे से पहले 1946 में कैबिनेट मिशन ने असम को मुस्लिम बहुल बंगाल के साथ जोड़ दिया था। मतलब यह कि बँटवारे में असम को पूर्वी बंगाल का हिस्सा माना गया। यानी बँटवारे में वो भी पाकिस्तान को दे दिया जाता। लेकिन तभी एक शख्स सीना तान कर ख़ड़ा होता है और उसका नाम था श्यामा प्रसाद मुखर्जी। श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इन कोशिशों का विरोध करते हुए कहा था कि “असम हिंदू बहुल क्षेत्र है और बंगाल का ज्यादातर भी हिंदू बहुल है और ये भारत का ही हिस्सा रहेगा।” नतीजा असम के सिलहट जिले को छोड़कर पूरा असम भारत का हिस्सा बना। यह भी पढ़ें: बीजेपी की ग्लैमरस महिला विधायक को लेकर बेशर्मी पर उतरे विरोधी

औरंगज़ेब के ज़माने से असम पर नज़र

असम पर इस्लामी क़ब्ज़े की पहली कोशिश औरंगज़ेब के समय शुरू हुई थी जब उसने इस इलाक़े पर हमला किया था। औरंगज़ेब ने देश के ज़्यादातर हिस्सों पर भले ही जीत हासिल की हो लेकिन वो कभी भी असम को नहीं जीत पाया। 1667 में असम के राजा चक्रध्वज सिंह के सेनापति लचित बडफूकन का नाम आज भी बेहद सम्मान से लिया जाता है क्योंकि उन्होंने औरंगज़ेब की शक्तिशाली सेना को अपनी सूझबूझ और वीरता से मार भगाया था। यही कारण है कि लचित बडफूकन को असम का शिवाजी भी कहा जाता है।
(न्यूज़लूज़ टीम)

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