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फिबोनाकी नंबर या मात्रामेरू? भारत की खोज थी ‘भगवान की छाप’

प्रतीकात्मक चित्र

आकाश गंगाएं हों, या सौर मंडल के ग्रहों की दूरियां। धरती पर समंदर की लहरें हों या खूबसूरत दिखने वाला कोई फूल। इन सब में एक ऐसी बात है जो उन्हें भगवान की रचना साबित करती है। भगवान की रचना यानी ऐसी चीज जिसे भगवान ने बनाया हो। इस बात को समझने के लिए आपको नीचे का चार्ट देखना होगा। 1… 2… 3…. 5… 8… 13… 21… 34… ये अंकों का वो क्रम है, जिसमें हर अंक अपने पहले के दो अंकों का जोड़ है। जैसे कि 21 अपने पहले के अंक 8 और 13 को जोड़ने से बना है। इसे ही फिबोनाकी नंबर (fibonacci sequence or Number) कहते हैं। इस क्रम में अगल-बगल के दो अंकों का अनुपात देखें तो वो 1.618 के करीब आएगा। रोमन गणित में इसे फाई कहा जाता है जिसकी वैल्यू 1.618 होती है। इस अनुपात में बढ़ते क्रम को गोल्डन रेशियो (Golden ratio) या डिवाइन प्रोपोर्शन (divine proportion) का नाम भी दिया जाता है। अंकों का ये क्रम अनंत तक भी चला जाए तो यह अनुपात अपनी जगह पर बना रहता है। अब तक माना जाता रहा है कि फाई और गोल्डेन रेशियो रोमन सभ्यता की खोज थी, लेकिन पहली बार पश्चिमी दुनिया ने भी माना है कि भारतीय लोगों को इसका ज्ञान बहुत पहले से था। (नीचे देखें ट्वीट)

क्या है गोल्डन रेशियो?

गोल्डन या फाई रेशियो का ज्ञान भारतीय लोगों रोमन सभ्यता से भी पहले था। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में हुए गणितज्ञ पिंगल (Pingala) ने छंदसूत्र नाम की एक पुस्तक लिखी है, जिसमें अंकों के इस अनुपात का जिक्र किया है। उन्होंने इन संख्याओं को मात्रामेरु (MatraMeru) नाम दिया है। पिंगल ने यह भी बताया है कि प्रकृति की ज़्यादातर चीजें इसी अनुपात में बनी हुई हैं। इंसान की बनाई जो भी चीजें खूबसूरत मानी जाती हैं उनमें भी यह अनुपात देखने को मिलता है। फाई अनुपात की छाप दुनिया की हर उस चीज में दिखाई देती है जिसे हम खूबसूरत मानते हैं। कई लोग इसे भगवान का फिंगरप्रिंट कहते हैं। यानी ये अनुपात ईश्वर के हाथों की वो छाप है जो उसके बनाए पूरी सृष्टि में दिखाई देती है। ये हैरानी की बात है कि प्रकृति में जो कुछ भी खूबसूरत है वो इसी अनुपात के आसपास है। पश्चिमी दुनिया को पहली बार इसका पता तब चला जब 12वीं शताब्दी में इटली के गणितज्ञ लेनार्डो फिबोनाकी (Leonardo Fibonacci) ने इसका जिक्र किया।

प्रकृति का ईश्वरीय अनुपात

सूरजमुखी या किसी खूबसूरत फूल की पंखुड़ियां भी फाइ के अनुपात में ही अंदर से बाहर की तरफ बढ़ती हैं। अनन्नास फल पर बने कोन में भी ठीक यही अनुपात देखने को मिलता है। समुद्र की जो लहरें हमें इतनी खूबसूरत लगती हैं, उनका रेखाचित्र बनाएं तो उनमें भी फाई या भारतीय नाम मात्रामेरु अनुपात दिखाई देता है। यह अनुपात लगभग हर उस चीज में दिखाई देती है जिसे हम कुदरत, प्रकृति या नेचर कहते हैं। खास तौर पर वो चीजें जो हमें दिखने में बहुत खूबसूरत लगती हैं। जैसे कि पानी में मिलने वाले शंख और घोंघे। या फिर मनुष्य का पूरा शरीर, जिन लोगों के शरीर के अंगों में फाई यानी दैवीय अनुपात अधिक होता है वो परफेक्ट खूबसूरती के उतने ही करीब होते हैं। यह अनुपात इंसान के शरीर से लेकर उन विशाल आकाशगंगाओं तक में दिखाई देता है, जिनके आकार का अनुमान लगाना भी मुश्किल है।

मोनालीसा की पेंटिंग का रहस्य

मोनालीसा जैसी विश्व प्रसिद्ध पेंटिंग्स में भी यह दैवीय अनुपात पाया जाता है। शायद यही कारण है कि ये पेंटिंग इतनी मशहूर हुई। इसका मतलब हुआ कि अगर कोई चीज इस अनुपात का ध्यान रखकर बनाई जाती है तो वो परफेक्शन के ज्यादा करीब होती है। यही नहीं, ताजमहल समेत दुनिया की कई खूबसूरत कही जाने वाली इमारतों में भी गोल्डन रेशियो या मात्रामेरू की छाप देखी जा सकती है। प्राचीन भारतीय शास्त्रीय संगीत की धुनों में भी फिबोनाकी नंबर की झलक देखने को मिलती है।

जाहिर है कि ये महज इत्तेफाक नहीं हो सकता कि ब्रह्मांड में भगवान की बनाई हर चीज एक निश्चित अनुपात में है। कुछ लोग इस अनुपात को ही भगवान का फिंगरप्रिंट कहते हैं। इस तथ्य को इस बात के सबूत के तौर पर भी बताया जाता है कि अगर ये कुदरत और हमारा जीवन है तो यह बिना किसी भगवान के संभव नहीं हो सकता।

गोल्डन रेशियो को बेहतर समझने के लिए ये वीडियो देख सकते हैं। वीडियो की भाषा अंग्रेज़ी है, लेकिन तस्वीरों से आपको कहानी समझ में आ जाएगी।

(न्यूज़लूज़ टीम)

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