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जानिए ‘चिकेन नेक’ पर क्यों है देशविरोधी ताक़तों की नज़र

नागरिकता कानून को लेकर चल रहे प्रदर्शन में जेएनयू के छात्र शरजील इमाम के भाषण का वीडियो वायरल हो रहा है। इस भाषण में वो बता रहा है कि कैसे मुसलमानों को असम को हिंदुस्तान से अलग करने के लिए ‘चिकेन नेक’ पर वार करना है। दरअसल ये मात्र 22 किलोमीटर चौड़ा गलियारा है जो देश के बाकी हिस्से को असम और उत्तर-पूर्व के बाकी राज्यों से जोड़ता है। इसे सिलिगुड़ी कॉरीडोर के नाम से भी जाना जाता है। आइए आपको बताते हैं कि देश के इस हिस्से पर कट्टरपंथियों और देशविरोधी ताकतों की क्यों नजर है। इस बात को समझने के लिए आपको कुछ समय पहले तब के सेनाध्यक्ष बिपिन रावत के उस बयान को याद करना होगा जिसमें उन्होंने इस बात पर चिंता जताई थी कि असम और बंगाल के इस इलाके में मुस्लिम आबादी बहुत तेजी के साथ बढ़ रही है। जनरल रावत का ये बयान बेहद अहम था क्योंकि उन्हीं दिनों मीडिया में यह खबर भी आई थी कि 22 किलोमीटर के इस कॉरीडोर में दोनों तरफ मुसलमानों की बस्तियां बस चुकी हैं और हिंदू धीरे-धीरे बाहर हो रहे हैं। सवाल उठता है कि ऐसा कैसे हुआ?

‘मुर्ग़ी की गर्दन मरोड़ने’ की तैयारी

2011 की जनगणना के बाद चिकेन नेक पर ख़तरे की घंटी बजी थी। इसमें सामने आया था कि असम में मुस्लिम आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ी है। जिनमें से ज़्यादातर वो हैं जो बांग्लादेश से आए हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम आबादी 10 साल में 1.3 फीसदी बढ़ी थी, जबकि असम में ये बढ़ोतरी 3.3 फीसदी थी। असम के 33 जिलों में 9 ज़िले मुस्लिम बहुल आबादी वाले हो चुके थे। जबकि 2001 की जनगणना में सिर्फ 6 जिले मुस्लिम बहुल आबादी वाले थे। असम में मुस्लिम आबादी 1971 में 24 फीसदी, 1991 में 28 फीसदी, 2001 में 31 फीसदी और 2011 में 34 फीसदी तक पहुंच गई। 2005 में असम में मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने एक राजनीतिक पार्टी AIUDF बनाई। मोटे तौर पर घुसपैठियों के समर्थन वाली यह पार्टी आज असम की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन चुकी है। एक तरफ असम और दूसरी तरफ बंगाल के इलाकों में जनसंख्या बदलाव की कोशिश जारी है। सिलीगुड़ी के इलाकों में भी मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है, जो खास तौर पर उन इलाकों में बस रही है जो रेल से लेकर सड़क यातायात को रोकने का काम कर सकती है। इसी बात का जिक्र शरजील इमाम ने अपने भाषण में किया था।

चीन और पाकिस्तान की भी है नज़र

दरअसल सिलीगुड़ी कॉरीडोर एक तरह से भारत का वो कमजोर इलाक़ा बन चुका है, जिस पर चीन और पाकिस्तान की भी नज़र है। इस इलाक़े की आबादी में हो रहे बदलाव के पीछे आम तौर पर पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI का हाथ माना जाता है, जिसने न सिर्फ बांग्लादेशियों की घुसपैठ करवाई, बल्कि इस पूरे इलाके में कट्टरपंथ और भारत विरोधी माहौल बनाने का काम किया। बंगाल में पहले वामपंथी और अब ममता बनर्जी की सरकार होने के कारण कभी इन कोशिशों के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया। आज भी इस इलाके में बसे घुसपैठियों को ममता बनर्जी की खुली शह मिली हुई है। कई बार यह खबर आ चुकी है कि इन इलाकों में बसे बांग्लादेशियों को बड़ी संख्या में आधार और दूसरे सरकारी कागजात बनाकर दिए गए हैं। सेना की समस्या यह है कि ये पूरी आबादी न सिर्फ उसकी मूवमेंट पर नजर रखती है, बल्कि जरूरत पड़ने पर रोकने की ताकत भी रखती है। यही कारण है कि जनरल बिपिन रावत अक्ल ढाई मोर्चों की बात किया करते थे। माना जाता है कि वो चीन और पाकिस्तान के साथ-साथ इसी मोर्चे की तरफ इशारा करते रहे हैं।

घुसपैठ घटी, लेकिन हो चुकी है देरी

बीएसएफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते 5 साल में असम में अवैध घुसपैठ 90% तक कम हुई है। ब्रह्मपुत्र नदी पार करना अब आसान नहीं रह गया है। असम और बांग्लादेश की क़रीब 500 किलोमीटर की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बेहद कड़ी निगरानी होने के बावजूद कुछ इलाक़े ऐसे हैं जहां से घुसपैठियों को रोकना आसान नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक 24 मार्च 1971 से लेकर अब तक असम में करीब 50 से 80 लाख घुसपैठिए आ चुके हैं। 1971 के युद्ध से पहले भारत की नीति थी कि कोई भी शरणार्थी आकर रह सकता है, लेकिन असम में 1980 में घुसपैठियों का मुद्दा बड़ा हो गया। असम गण परिषद ने ये मुद्दा उठाया, जिस पर 1985 में असम समझौता हुआ, लेकिन घुसपैठ में कमी के बजाय ये बढ़ता ही गया। समस्या तब बढ़ गई जब असम और बंगाल में राजनीतिक कारणों से इन घुसपैठियों को नागरिकता देकर वोटबैंक बनाया जाने लगा। असम में हुआ एनआरसी भी इस लिहाज़ से ज़्यादा कामयाब नहीं माना जाता क्योंकि ज़्यादातर बांग्लादेशी घुसपैठिए इससे बचने में सफल हो गए। केंद्र सरकार और सेना अपने तरीक़े से इस कॉरीडोर को सुरक्षित बनाने में जुटे हैं, लेकिन जोखिम बना हुआ है। सबसे चिंता की बात यह है कि यहाँ आबादी के संतुलन को बहाल करने की हर कोशिश के ख़िलाफ़ न्यायपालिका से लेकर मीडिया तक खड़े हो जाते हैं।

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