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‘हत्यारे’ नाथूराम गोडसे से प्रेम क्यों करते हैं कई भारतीय, जानिए तथ्य

नाथूराम गोडसे के जघन्य पाप का कोई समर्थन नहीं कर सकता और न किसी को करना चाहिए, लेकिन वो कौन सी मानसिकता है कि साध्वी प्रज्ञा गोडसे को ‘देशभक्त’ कह देती हैं। आखिर ये मानसिकता है क्या? क्या ये मानसिकता आज पैदा हुई है? क्या इस षड़यंत्र के पीछे आरएसएस और बीजेपी का हाथ है? क्या हमसे दो पीढ़ी पुराने लोग यानी जो 1947-48 में समझदार हो चुके थे, क्या वो हमसे अलग सोचते थे? क्या उस दौर के लोग गोडसे से नफरत करते थे? क्या आज हमारी पीढ़ी के लोग गोडसे को देशभक्त मानते हैं? ये सारे सवाल आज मैं इसलिए उठा रहा हूं कि क्योंकि राष्ट्रवाद पर अटूट भरोसा रखने वाले मुझ जैसे लाखों-करोड़ों लोगों को ट्रोल करने के लिए ‘बौद्धिक आतंकवादियों’ का एक गिरोह सक्रिय हो चुका है। लेकिन इन अज्ञानियों से उलझने से पहले हमें नाथूराम गोडसे का समर्थन करने वाली मानसिकता का अध्ययन करना होगा। क्योंकि हर अच्छी और बुरी मानसिकता के दो पहलू होते हैं। मुझे लगता है कि किसी मुद्दे की तह तक जाने के लिए सबसे पहले उस दौर को समझना बहुत ज़रूरी है। क्योंकि देशकाल, स्थिति, परिस्थिति का अध्यन करे बिना आप किसी निष्पक्ष नतीजे पर नहीं पहुंच सकते। यही वजह है कि गांधी और गोडसे के संदर्भ में मैंने ऊपर एक सवाल उठाया है कि “क्या हमसे दो पीढ़ी पुराने लोग यानी जो 1947-48 में समझदार हो चुके थे, क्या वो हमसे अलग सोचते थे?” यह भी पढ़ें: जब अंबेडकर ने खोली थी सावरकर से साजिश की पोल

गोडसे को सज़ा सुनाने वाले जज की बात

शुरुआत करते हैं उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों में से एक जस्टिस जीडी खोसला से। जस्टिस खोसला वही हैं जिन्होंने नाथूराम गोडसे को शिमला हाईकोर्ट मे फांसी की सज़ा सुनाई थी। अब पढ़िए जस्टिस खोसला ने अपनी किताब “The Murder of the Mahatma” के पेज नंबर 47 पर क्या लिखा है। “गोडसे की दलील सुनने के बाद कोर्ट में मौजूद लोग स्तब्ध और विचलित थे। एक गहरा सन्नाटा था, जब उसने बोलना बंद किया। महिलाओं की आँखों में आँसू थे और पुरुष भी सुबकते हुए रुमाल ढूँढ रहे थे। मुझे कोई संदेह नहीं है कि यदि उस दिन अदालत में उपस्थित लोगों की ज्यूरी बनाई जाती और गोडसे पर फैसला देने कहा जाता तो अदालत, भारी बहुमत से गोडसे को बाइज्जत बरी करने का फैसला दे देती।” हालांकि इसी किताब में जस्टिस खोसला ने गोडसे के बयान को हॉलीवुड का मैलोड्रामा भी कहा था। चलिए अब बात करते हैं उस दौर के सबसे बड़े पत्रकार कुलदीप नैयर की। जिन्होंने अपने एक लेख में लिखा था कि शिमला हाईकोर्ट की पहली सुनवाई के दौरान जब वहां मौजूद सभ्रांत (एलिट) महिलाओं ने गोडसे को बिना स्वेटर के ठिठुरते देखा तो उन्होंने उसी दिन से गोडसे के लिए स्वेटर बुनना शुरु कर दिए और बकायदा तोहफे के तौर पर उस तक पहुंचाया भी। यह भी पढ़ें: आजाद भारत का पहला नरसंहार, जब कांग्रेस ने मरवाए थे 5000 ब्राह्मण

ये है गोडसे के लिए सहानुभूति का कारण

सोचिए जब गोडसे बयान दे रहा था तो अदालत में मौजूद महिलाएं रो रहीं थीं और पुरुष सुबक रहे थे। वो जब ठंड से ठिठुर रहा था तो औरतें उसके लिए स्वेटर बुन रहीं थीं। अब समझिए उस दौर का शिमला क्या था। शिमला में भारत का एलिट क्लास रहता था। टॉप आईसीएस, जज और बड़े कारोबारियों के परिवार वहां रहते थे। साध्वी प्रज्ञा तो चंबल के भिंड की रहने वाली हैं। लेकिन वो क्या वजह थी कि 1948 में शिमला में रहने वाले एलिट और हाई क्लास लोग गोडसे के लिए आंसू बहा रहे थे? हमें इसी मानसिकता को समझने की ज़रूरत है। हम 2020 के दौर में गोडसे का समर्थन करने वालों पर संघ का टैग लगा देते हैं, तो फिर 1947-48 के वो कौन लोग थे जो गोडसे के लिए सहानुभूति रखते थे? अगर आप उस दौर का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि पाकिस्तान से आए रिफ्यूजी से लेकर शिमला के एलिट क्लास का एक बड़ा तबका गोडसे के समर्थन में खड़ा था, आखिर क्यों? क्या इसके पीछे आरएसएस की साज़िश थी? क्या तब बीजेपी का जन्म भी हुआ था? क्या गोडसे को फांसी की सज़ा सुनाने वाले जस्टिस खोसला “संघी” थे? वो महिलाएं जो गोडसे के लिए अदालत में रो रहीं थी, क्या वो “संघी” थीं? जो औरतें गोडसे के लिए स्वेटर बुन रहीं थी, क्या वो भी “संघी” थीं?

गोडसे का सही इतिहास बताना जरूरी है

अब आते हैं मुद्दे पर। हमें उन कारणों को सुलझाने की ज़रूरत है जिसकी वजह से आज भी कुछ लोग गोडसे का महिमामंडन करने लगते हैं। नहीं तो कल वो भरी अदालत में गोडसे के लिए आंसू बहाने वाली संभ्रांत घरों की महिलाएं थीं और आज साध्वी प्रज्ञा हैं और कल कोई और होगा। लिहाज़ा उस दौर का सच्चा इतिहास सामने लाया जाए। बापू का सम्मान भी कायम रहेगा और इस देश की एकता भी। मैं 2003 से गांधी हत्याकांड पर काम कर रहा हूं और 2013 में मैंने गोडसे पर एक किताब लिखने का काम शुरु भी कर दिया था, लेकिन चार चैप्टर लिखने के बाद मैंने इसे रोक दिया। लेकिन मुझे अब लगता है कि सच सामने आना चाहिए। इसीलिए सोच रहा हूं कि अपनी गोडसे की अधूरी किताब पर काम फिर से शुरू कर दिया जाए। लेकिन मुझे पता है कि मेरी किताब पढ़कर न तो साध्वी प्रज्ञा जैसे लोग खुश होंगे और ना ही सेकुलर गैंग।

पत्रकार प्रखर श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल से साभार

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