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क्या काशी हिंदू विश्वविद्यालय का भी इस्लामीकरण शुरू हो चुका है?

मोहर्रम के मौके पर बीएचयू के सिंहद्वार से गुजरता भारी-भरकम ताजिया।

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में संस्कृत धर्म विज्ञान पढ़ाने के लिए एक मुसलमान टीचर की भर्ती पर बवाल मचा हुआ है। विश्वविद्यालय के छात्र इसका विरोध कर रहे हैं, क्योंकि यह विभाग संस्कृत भाषा का नहीं, बल्कि हिंदू धर्म शास्त्र से जुड़े विषय के बारे में है। इस विवाद ने इस चिंता को दोबारा से जन्म दे दिया है कि क्या महामना मदन मोहन मालवीय के बनाए इस हिंदू विश्वविद्यालय का इस्लामीकरण हो रहा है? पिछले कुछ महीनों के अंदर यूनिवर्सिटी में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जो इस बात की तरफ इशारा करती हैं। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी अपनी स्थापना के समय से ही इस्लामी ताकतों की आंखों की किरकिरी बनी रही है। इसी कारण कई बार विश्वविद्यालय के नाम में से ‘हिंदू’ शब्द को हटाने की भी कोशिश हो चुकी है। अब एक बार फिर से धीरे-धीरे विश्वविद्यालय कैंपस के माहौल को बदलने की कोशिश शुरू हो चुकी है। इस कड़ी में सबसे बड़ा मामला धर्म विज्ञान संकाय में मुस्लिम टीचर की नियुक्ति का है। जिसका विरोध यूनिवर्सिटी के छात्र कर रहे हैं। यह भी पढ़ें: बीएचयू के खिलाफ मीडिया के फैलाए कुछ झूठ

मुस्लिम टीचर की भर्ती का विरोध क्यों?

कहा रहा है कि बीएचयू के छात्र मुसलमान टीचर का विरोध कर रहे हैं, जबकि यह सही नहीं है। दरअसल बीएचयू में संस्कृत विभाग अलग है। यह मामला संस्कृत विभाग का नहीं, बल्कि “संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय” का है। यह अलग फैकल्टी है, जहां पढ़ाई का तरीका बाकी विश्वविद्यालय से बिल्कुल अलग है। यहां पर क्लासरूम में डेस्क, बेंच नहीं बल्कि दरी और कालीन बिछाई जाती है। पूरी पढ़ाई गुरुकुल प्रणाली से होती है। यहां के छात्र चोटी और जनेऊ धारण करते हैं। यह जगह बीएचयू के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय ने खासतौर पर इसलिए बनवाई थी ताकि धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाले ज्ञानी शिक्षकों को तैयार किया जा सके। मालवीय जी की इच्छा के अनुसार ही इस भवन में एक बोर्ड लगा हुआ है जिस पर लिखा है कि यहां हिंदू और दूसरे सनातन धर्मों जैसे सिख, बौद्ध और जैन के अलावा किसी का प्रवेश वर्जित है। सवाल यह है कि हिंदू धर्म के प्रचार की शिक्षा एक मुसलमान कैसे दे सकता है? अगर वो इसके लिए तैयार है तो बेहतर होता कि वो घर वापसी करके हिंदू धर्म स्वीकार कर ले? जैसे किसी मदरसे में हिंदू मौलवी या चर्च में हिंदू पादरी की कल्पना नहीं की जा सकती वैसे ही धर्म विज्ञान के इस विभाग में मुस्लिम शिक्षक कैसे हो सकता है? जब आप इस समस्या की जड़ में जाएंगे तो पता चलेगा कि इसके पीछे विश्वविद्यालय के वाइसचांसलर राकेश भटनागर की भूमिका संदिग्ध है। छात्रों का आरोप है कि “यूनिवर्सिटी में टीचरों की भर्ती में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है। कुलपति ने पैसे लेकर भर्तियां की हैं। जिसने भी पैसा दिया उसे नौकरी पर रख लिया गया।” छात्रों का कहना है कि यह शुरुआत है अगर अभी विरोध नहीं किया गया तो आगे चलकर कोई मुसलमान इस डिपार्टमेंट का हेड भी बनाया जा सकता है। यह भी पढ़ें: बीएचयू के नाम पर सियासत और एक छात्र का दर्द

बीएचयू कैंपस में ताजिया निकाला गया

विश्वविद्यालय के 100 साल के इतिहास में इस साल परिसर के अंदर मोहर्रम का ताजिया भी घुमाया गया। इसकी यूनिवर्सिटी प्रशासन ने बाकायदा मंजूरी दी थी। बीएचयू के मुख्य द्वार पर साफ-साफ लिखा है कि यह आम रास्ता नहीं है। फिर भी मोहर्रम के मौके पर मातमी जलूस बाकायदा मुख्य द्वार से अंदर घुसा और बड़ी संख्या में मुसलमानों ने कैंपस की सड़कों पर मातम मनाया। जब लोगों ने सोशल मीडिया के जरिए विरोध दर्ज कराया तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने सफाई देनी शुरू कर दी कि यह पहली बार नहीं हो रहा है, बल्कि पिछले कई साल से इसी रास्ते से ताजिये का जलूस निकलता रहा है। हमने यूनिवर्सिटी के कई पुराने छात्रों से पूछा तो किसी ने भी ऐसे किसी ताजिये के गुजरने की बात की पुष्टि नहीं की। बताया जा रहा है कि कुछ समय पहले कैंपस से होते हुए एक छोटा ताजिया निकाला जाता था। धीरे-धीरे इसे परंपरा बताकर स्थायी बना दिया गया और इस साल विश्वविद्यालय प्रशासन की शह पर एक बड़ा ताजिया बहुत बड़े जुलूस की शक्ल में निकला। बीएचयू कैंपस में ऐसे धार्मिक जलूसों की इजाज़त नहीं दी जाती है, तो फिर ताजिये की ये परंपरा कैसे बन गई? जाहिर है इस मामले में भी मौजूदा कुलपति की भूमिका सवालों के दायरे में है। यह भी पढ़ें: बनारस की वो लड़की जिसका जिक्र पीएम मोदी ने किया

संघ का झंडा उतारकर फेंका गया

बनारस के पास मिर्जापुर में बीएचयू के साउथ कैंपस में हुई यह घटना भी बीएचयू के प्रशासन पर कसते वामपंथी शिकंजे की तरफ इशारा करती है। यहां पर स्टेडियम में आरएसएस से जुड़े कुछ छात्र सुबह के समय शाखा लगाया करते थे। स्टेडियम इसी तरह की खेलकूद की गतिविधियों के लिए बना है। लेकिन यहां की चीफ प्रॉक्टर (अनुशासन अधिकारी) किरण दामले को इस पर ऐतराज था और उन्होंने झंडे को उखाड़कर फेंक दिया। इससे नाराज छात्रों ने कैंपस में ही धरना शुरू कर दिया। बाद में संघ के स्थानीय पदाधिकारियों ने समझा-बुझाकर धरने को खत्म कराया। छात्रों के दबाव में पुलिस को इस मामले में एफआईआर लिखनी पड़ी। लेकिन चीफ प्रॉक्टर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। छात्रों का आरोप है कि इस मामले में भी वाइस चांसलर राकेश भटनागर का ही हाथ है। उन्होंने सभी प्रमुख प्रशासनिक पदों पर वामपंथी या कांग्रेसी विचारधारा के लोगों को तैनात किया है। संघ का झंडा फेंकने की घटना इसी का नतीजा है।

राकेश भटनागर जेएनयू में प्रोफेसर रहे हैं। उन्हें जानने वाले बताते हैं कि उनका हिंदुत्व या आरएसएस की विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। इसके बावजूद मोदी सरकार में पिछले मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय का वीसी बना दिया। जबकि इससे पहले वो उत्तराखंड के एक विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर बुरी तरह विवादों में रहे थे। लेकिन बीएचयू में उनके कार्यकाल में जो कुछ हो रहा है वो विश्वविद्यालय की पहचान के लिए आगे चलकर बेहद घातक साबित हो सकता है।

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