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सविता भाभी से सुन्नी इस्लाम तक… जेएनयू में रिसर्च के टॉप-10 टॉपिक

जेएनयू में विरोध प्रदर्शनों की यह तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई है। लोगों ने मज़ाक उड़ाया कि हिंदी में शोध कर रही छात्रा ने जो तख्ती हाथ में ली है उस पर हिंदी की वर्तनी में कई गलतियां हैं।

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी कहने को तो देश के सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक है, लेकिन वहां पर कैसी पढ़ाई होती है यह अब किसी से छिपा नहीं है। देशद्रोही, नक्सली और इस्लामी कट्टरपंथ के अलावा यहां पर बहुत कुछ ऐसा भी पढ़ाया जा रहा है जिसे सुनकर आपको हंसी आएगी। जेएनयू में ऐसे-ऐसे विषयों पर रिसर्च का काम चल रहा है, जिसे सुनकर हंसी आएगी। सवाल यह है कि जनता के टैक्स के पैसे से चल रही इस यूनिवर्सिटी को सालाना करोड़ों का बजट क्या इसीलिए दिया जाता है? आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जेएनयू को सालाना करीब 300 करोड़ रुपये का बजट मिलता है। जिसमें से 96 फीसदी पैसा जेएनयू के खर्चों पर चला जाता है। जब भी कोई यह बात कहता है तो एक खास विचारधारा वाले लोग दलील देते हैं कि वहां पर अच्छी शिक्षा दी जाती है और बेहतरीन रिसर्च होती है, इसलिए 300 करोड़ की रकम ज्यादा नहीं है। जेएनयू में जो सबसे ज्यादा खर्च होता है वो रिसर्च स्कॉलरों पर है, जिन्हें 28 हजार रुपये हर महीने स्कॉलरशिप की तरह मिलते हैं। इन छात्रों को बेहद सस्ते में हॉस्टल का कमरा और सस्ता खाना मिलता है। इसके बदले में वो जो शोध कर रहे हैं उनके टॉप-10 नमूने आप नीचे देख सकते हैं।

1. सविता भाभी पर रिसर्च

जेएनयू देश की इकलौती यूनिवर्सिटी है जिसने पोर्न कॉमिक्स सविता भाभी पर भी रिसर्च किया है। हालांकि यह तकनीकी रूप से पीएचडी नहीं था, लेकिन इसमें भी बाकायदा रिसर्च पेपर जमा किया गया था और ये पूरा काम सरकारी स्कॉलरशिप पर हुआ था। इसका टॉपिक था- ‘रीथिंकिंग गुजराती आइडेंटिटी थ्रू द इमेज ऑफ सविता भाभी’। इस शोध में सविता भाभी का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया गया था। ये रिसर्च जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी की छात्रा अनन्या बोहिदर ने की थी। 2014 में जमा की गई इस रिसर्च में यह साबित करने की कोशिश की थी कि सविता भाभी और मौजूदा दौर के कई टीवी सीरियल, कॉमेडी शो में महिलाओं को जिस तरह से दिखाया जाता है वो गुजराती पहचान का हिस्सा है। एक शादीशुदा गुजराती महिला की इच्छाओं और गुजराती संस्कृति के नाम हुई इस रिसर्च के नतीजे बेसिर-पैर के थे। यह साबित करने की कोशिश की गई थी कि गुजरात की हर महिला सविता भाभी की तरह होती है जो शादी से अलग दूसरे मर्दों से शारीरिक रिश्ते बनाती रहती है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट: क्या सविता भाभी गुजराती हैं, जेएनयू में जारी है रिसर्च

2. मुगलों के सेक्स रिश्तों पर शोध

मुगलकालीन भारत में लोगों की सेक्स और जेंडर संबंधित आदतें कैसी थीं, इस विषय पर भी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध हो चुकी है। इसमें मुगल राजाओं की सेक्स लाइफ के बारे में बात की गई थी। बताया गया था कि किस मुगल बादशाह की कितनी रानियां थीं और उनके हरम में कितनी दूसरी महिलाएं रहा करती थीं। साथ ही समलैंगिकता से जुड़ी उनकी बातों पर भी विस्तार से रोशनी डाली गई है। हैरानी इस बात की है कि यह पूरी रिसर्च मुगलों के महिमामंडन के तौर पर लिखी गई है। मानो हरम में सैकड़ों महिलाओं को गुलाम बनाकर रखना या फिर दुश्मन राजा को हराकर उनकी महिलाओं को गुलाम बनाकर ले आना ये सब बहुत अच्छी बात है। सवाल यह भी उठता है कि यह रिसर्च करने वाले छात्र को हर महीने हजारों रुपये क्यों दिए गए, क्या यह सारी जानकारी वाकई देश के लिए इतनी जरूरी है?

3. पढ़े-लिखे शहरी नौजवानों के सेक्सुअल बिहैवियर पर रिसर्च: खास तौर पर कोलकाता के पढ़े-लिखे युवाओं के यौन व्यवहार पर यह रिसर्च भी जेएनयू में हुए एक पीएचडी का हिस्सा है। यह रिसर्च करने वाली छात्रा का कोलकाता में रहने का पूरा खर्च जेएनयू प्रशासन की तरफ से उठाया गया था। जाहिर है यह पैसा हमारे और आपकी जेब से ही गया।

4. ड्रेस, फैशन और स्त्रीवाद: जेएनयू में इस विषय पर भी पीएचडी हो चुकी है। इस विषय पर रिसर्च करने वाली छात्रा ने जनता के टैक्स के पैसे पर यह पता करने की कोशिश की कि फैशन इंडस्ट्री की मॉडल जो कपड़े पहनती हैं उनका स्त्रीवाद यानी फेमिनिज्‍म से क्या रिश्ता है। जिस तरह आपको रिसर्च का टॉपिक समझ में नहीं आया होगा, वैसे ही रिसर्च के नतीजे भी समझ से परे हैं। लेकिन इसे करने वाली छात्रा अब अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाती है और देश की एक बड़ी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बनकर छात्रों को पढ़ा रही है।

5. उपभोक्तावाद और उपभोग, दिल्ली और गुड़गांव के बाजारों का एक अध्ययन: यह भी जेएनयू में हो चुके एक शोध कार्य का विषय है, जिसमें पता किया गया था कि दिल्ली और गुड़गांव के लोग बाजार में जाकर क्या सामान खरीदते हैं।

6. Leisure-time activities of college students of Delhi: A Sociological study: इस रिसर्च में यह पता किया गया था कि दिल्ली के छात्र-छात्राएं फुरसत के समय में क्या करते हैं। 1983 में हुई इस रिसर्च का औचित्य क्या है यह समझ से परे है, लेकिन इसे करने वाले को जनता के टैक्स के पैसे पर पीएचडी की डिग्री मिल गई।

7. Sexual behaviour of adolescents among the Akamba people of Machkos district, Kenya: जब भारत के लोगों के सेक्सुअल बिहेवियर से मन भर गया तो 2008 में जेएनयू के एक होनहार छात्र ने अफ्रीकी देश कीनिया के मैचकोस जिले के लोगों के यौन व्यवहार पर शोध कर डाला। पूरी रिसर्च का पैसा भारत की गरीब जनता के खाते से गया।

8. The Process of Decolonisation and Social transformation in South Africa: अफ्रीका जेएनयू के पसंदीदा विषयों में से एक है। जब पूरी दुनिया यूरोप और अमेरिका जैसे आधुनिक समाजों की तरफ देख रही है, जेएनयू में सबसे ज्यादा रिसर्च अफ्रीका के बारे में होती है। यह रिसर्च टॉपिक जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार का था। इसमें यह पता किया गया कि अफ्रीका में आजादी के बाद सामाजिक परिवर्तन कैसे हुआ? यह पूरी रिसर्च दिल्ली में बैठे-बैठे हुई, इस दौरान कन्हैया कुमार देशद्रोही नारे लगाने और देश की सेना को गालियां देने जैसे जरूरी कामों में ज्यादा व्यस्त रहा।

9. The reproduction of Islamic education: A study of two Madrasas of Mubarakpur, Uttar Pradesh: रिसर्च का टॉपिक पढ़कर आप सोचेंगे कि इस पर काम किसी मदरसे में हुआ होगा। लेकिन यह मदरसा कोई और नहीं बल्कि जेएनयू था। 2013 में अरशद आलम नाम के एक तथाकथित स्कॉलर यूपी के मुबारकपुर कस्बे के 2 मदरसों में इस्लामी शिक्षा पर यह पीएचडी हासिल की थी। अरशद आलम इसी पीएचडी के दम पर अब जेएनयू के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर है।

10. A comparative study between Indian and Japanese prostitution: ऐसा भी नहीं है कि जेएनयू में सिर्फ अफ्रीका और इस्लाम पर ही काम हो रहा है। 2008 में किसी ने जापान और भारत में देह व्यापार की समानताओं और अंतर पर एक व्यापक अध्ययन भी किया था। यह भी अपने आपमें शोध का विषय है कि इस विषय पर शोध कैसे हुई होगी।

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