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नेहरू को ‘मौलाना नेहरू’ क्यों बोलते थे सरदार पटेल!

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के परिवार और धर्म को लेकर अक्सर लोग सवाल उठाते हैं। कई लोग दावा करते हैं कि दरअसल उनके परिवारवाले मुसलमान थे और पहचान छिपाकर खुद को कश्मीरी पंडित बताने लगे थे। लेकिन क्या आपको पता है कि देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल जवाहरलाल नेहरू को ‘मौलाना’ कहकर पुकारते थे। जहां तक नेहरू परिवार के धर्म की बात है उसे लेकर कुछ पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता, लेकिन पटेल का नेहरू को मौलाना कहना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इस बात का जिक्र जवाहरलाल नेहरू के पर्सनल सेक्रेटरी रहे एमओ मथाई ने अपनी किताब Reminiscences of the Nehru Age में किया है। 1978 में आई इस किताब में मथाई ने लिखा है कि “सरदार पटेल सांप्रदायिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं थे। वो मौलाना आजाद को पसंद नहीं करते थे। रफी अहमद किदवई से भी उनकी एक तरह की दुश्मनी थी। जिन दिनों देश का बंटवारा हो रहा था और बड़ी संख्या में लोग शरणार्थी बनकर आ रहे थे, तब पटेल अक्सर नेहरू को मौलाना नेहरू कहकर पुकारा करते थे।” यह भी पढ़ें: चाचा नेहरू की सनक की 5 अनसुनी कहानियां

क्या है मथाई की किताब में?

अपनी किताब के पेज नंबर 243 पर सरदार पटेल के चैप्टर में मथाई ने इस बारे में लिखा है। ऐसी एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया है कि एक बार कांग्रेस के सांसदों के साथ बातचीत में पटेल ने कहा कि देश में एक ही राष्ट्रवादी मुसलमान है। लोगों ने सोचा कि शायद वो रफी अहमद किदवई का नाम लेंगे, लेकिन पटेल ने हंसते हुए जवाब दिया- जवाहरलाल नेहरू। हालांकि इस घटना का संदर्भ यह है कि पटेल दरअसल सांप्रदायिक व्यक्ति थे, जबकि नेहरू जी सेकुलर थे। लेकिन बातों-बातों में मथाई ने एक ऐसी घटना छेड़ दी है, जिसका जिक्र इतिहास की किताबों में कहीं भी नहीं मिलता। जाहिर है नेहरू को मौलाना कहने के पीछे उनकी नीतियों से पटेल की नाराजगी झलकती है। यह वो समय था जब जवाहरलाल नेहरू खुलेआम मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियों पर अमल शुरू कर चुके थे। जबकि पाकिस्तान से लुटे-पिटे आने वाले लाखों हिंदू और सिख शरणार्थियों की तरफ उनका बिल्कुल भी ध्यान नहीं था। यही समय था जब पटेल ने आरएसएस के सदस्यों के लिए कांग्रेस के दरवाजे खोले थे और कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में यह प्रस्ताव पास कराया था कि आरएसएस के स्वयंसेवक कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। लेकिन बाद में इसे नेहरू ने रद्द करवा दिया था। इस घटना का भी जिक्र इसी किताब में किया गया है। यह भी पढ़ें: जब नेहरू के कारण वर्ल्ड कप फुटबॉल में नहीं जा सका था भारत

कौन हैं एम ओ मथाई?

मथाई 1946 में जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव बने थे। लेकिन 1959 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था, क्योंकि वामपंथी पार्टियों का आरोप था कि वो अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के लिए जासूसी करते हैं। बाद में कांग्रेस के नेता नटवर सिंह ने भी अपनी किताब One Life is Not Enough में लिखा है कि मथाई वाकई सीआईए के लिए जासूसी करते थे। वो नेहरू के दफ्तर के एक-एक जरूरी दस्तावेज और कागजात अमेरिकी एजेंटों तक पहुंचाया करते थे। उनकी किताब  ‘रेमिनिसन्स ऑफ नेहरू एज’ 1978 में तब छप पाई थी जब इमर्जेंसी के बाद इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गईं और जनता पार्टी की सरकार बनी। हालांकि उनकी इस किताब का एक चैप्टर ‘शी’ हटा दिया गया। कहते हैं कि इस चैप्टर में मथाई ने इंदिरा गांधी से अपने कथित नज़दीकी रिश्तों के बारे में बताया है। प्रकाशक ने जो किताब छापी उसमें से इस चैप्टर को हटा दिया, लेकिन बाद में वो हिस्सा अलग-अलग तरीकों से सार्वजनिक हो गया। यह भी पढ़ें: नेहरू की गलती से आज चीन में है कैलाश मानसरोवर

नीचे आप किताब का वो पन्ना देख सकते हैं जिसमें एमओ मथाई ने जिक्र किया है कि नेहरू को पटेल मौलाना कहा करते थे।

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