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न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर से सामने आई गांधी की अहिंसा की सच्चाई

आजादी के इतिहास का ये वो हिस्सा है जिसका सच हमेशा देश के लोगों से छिपाया गया, हम बात कर रहे हैं नोआखाली में हुए हिंदुओं के नरसंहार की। 8 अप्रैल 1947 को अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट सामने आई है, जिससे समझा जा सकता है कि उस दौरान गांधी जी की क्या भूमिका थी। पूर्वी बंगाल यानी वर्तमान बांग्लादेश का एक जिला था नोआखाली, जहां पर हिंदुओं की आबादी मुसलमानों के मुकाबले काफी कम थी। मुश्किल से 50 साल पहले नोआखाली 100 फीसदी हिंदू आबादी वाला जिला हुआ करता था, लेकिन मुसलमानों ने आबादी बढ़ानी जारी रखी और जब वो करीब बराबरी पर आ गए तो तलवार के जोर पर बाकी बचे हिंदुओं का धर्मांतरण शुरू हो गया। जिन दिनों देश में बंटवारे की तैयारी हो रही थी, उन्हीं दिनों नोआखाली में हिंदुओं के खून की होली खेली जा रही थी। इस बर्बर घटना के बारे में 15 दिन तक तो बाकी देश को जानकारी ही नहीं मिली, जब खबर दिल्ली पहुंची तो महात्मा गांधी की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली थी। उन्होंने नोआखाली के हिंदुओं को सलाह दी कि या तो वो अपने घरबार छोड़कर भाग जाएं या फिर मरने के लिए तैयार रहें। भारतीय इतिहास और मीडिया हमेशा से इस बात का खंडन करता रहा है, लेकिन अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि वाकई महात्मा गांधी ने यह बात कही थी। नीचे आप अखबार में छपी वो खबर देख सकते हैं।

नोआखाली पर झूठा इतिहास पढ़ाया

अब तक इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता रहा है कि नोआखाली में नरसंहार नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए थे। जबकि सच यह है कि वहां एक भी मुसलमान नहीं मारा गया था। अगर ये दंगा होता तो दोनों तरफ कुछ लोगों की मौत हुई होती। गांधीजी जब नोआखाली पहुंचे तो वहां के बाकी बचे हिंदुओं ने उनसे अपील की कि जिले में सेना तैनात की जाए ताकि उनकी जिंदगी की रक्षा हो सके। इस पर गांधी जी का जवाब और भी चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि “आप लोगों को बहादुरी से काम लेना चाहिए क्योंकि दुनिया की कितनी भी बड़ी सेना कायरों की रक्षा नहीं कर सकती। उलटे सेना की उपस्थिति भय और अविश्वास को और गहरा बना देती है।” 10 अक्टूबर 1946 से लेकर मार्च 1947 तक नोआखाली में 10 हजार से ज्यादा हिंदुओं को मौत के घाट उतारा गया। इसके अलावा सैकड़ों महिलाओं को बलात्कार का शिकार बनाया गया। लेकिन गांधी जी का कहना था कि हिंदुओं को यह जगह छोड़कर चले जाना चाहिए। जबकि इतिहास की किताबों में यह झूठ पढ़ाया जाता रहा है कि गांधी जी ने नोआखाली में शांति समितियां बनाईं, जिसके कारण हिंदुओं के खिलाफ हिंसा कम हो गई थी। लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर की कटिंग ने सच सामने ला दिया है। इसमें साफ-साफ जिक्र है कि गांधी जी ने इस दौरान हिंदुओं जान बचाकर भागने या मरने की सलाह दी थी। दंगों के दौरान करीब 4 महीने तक गांधी नोआखाली में रहे, इस दौरान हिंदुओं का कत्लेआम जारी रहा। जिन लोगों ने मजबूरी में इस्लाम स्वीकार कर लिया था, गांधी ने उनकी यह कहते हुए तारीफ भी की कि उन्होंने परिस्थितियों से समझौता कर लिया। जब तक ये दंगे खत्म हुए तब तक नोआखाली के सभी हिंदुओं को मुसलमान बनाया जा चुका था। जो बच गए उनकी गर्दनें रेत दी गईं।

हिंदुओं को बहुत महंगी पड़ी अहिंसा

आजादी के पहले और बाद में भी गांधी लगातार यह जोर देते रहे कि मुसलमान भले ही हिंसा कर रहे हों, लेकिन हिंदुओं को हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं बल्कि प्यार से देना चाहिए। इसी चक्कर में बहुत सारे बेगुनाहों को अपनी जान गंवानी पड़ी। दिल्ली के ज्यादातर इलाकों में हिंदुओं ने तो गांधी की अपील पर हथियार डाल दिए थे, लेकिन पुरानी दिल्ली के इलाकों में मुसलमान लगातार मोर्चा ले रहे थे और हर दिन कुछ लोगों को मौत के घाट उतार दिया करते थे। ऊपर से पाकिस्तान से आने वाली रेलगाड़ियों में लदकर रोज सैकड़ों की संख्या में हिंदुओं और सिखों की लाशें भारत पहुंच रही थीं। इसी दौरान गांधी फिर से उपवास पर बैठ गए क्योंकि उन्हें लगा कि हिंदू और सिख अब दिल्ली में मुसलमानों से बदला ले सकते हैं। इसी का नतीजा था कि उपवास में उन्होंने पाकिस्तान से अपील की थी कि अगर उसने हिंदुओं का नरसंहार नहीं रोका तो भारत में 10 गांधी मिलकर भी मुसलमानों को नहीं बचा पाएंगे। यानी गांधी कि चिंता भारत के मुसलमान थे। क्योंकि जब तक हिंदू मारे जा रहे थे वो इतना परेशान कभी नहीं हुए। दरअसल उन दिनों पाकिस्तान बंटवारे के साथ साथ 55 करोड़ रुपये मुआवजा भी मांग रहा था। जिसके लिए ब्लैकमेल की नीयत से उसने अपने यहां हिंदुओं की हत्याओं की छूट दे रखी थी। गांधी के उपवास का एक बड़ा मकसद था कि वो इस बहाने 55 करोड़ रुपये देने के लिए सरकार पर दबाव बना सकें। इसी से पैदा गुस्से का नतीजा हुआ कि 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या कर दी गई।

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