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जानिए वो काला कानून, जिसके कारण दिल्ली बनती है गैस चेंबर!

हर साल सर्दी शुरू होने के साथ दिल्ली में प्रदूषण बढ़ना शुरू होता है और उसके साथ ही पंजाब और हरियाणा के किसानों को कोसने का काम भी शुरू हो जाता है। कहा जाता है कि वो जो धान की पराली जला रहे हैं उसी के कारण दिल्ली में लोगों का सांस लेना मुश्किल हो गया है। लेकिन क्या वाकई ये बात सही है? यहां हम आपको बता दें कि खेतों में पराली आज से नहीं, बल्कि करीब 25-30 साल से जलाई जा रही है। यह तब से है जबसे पंजाब और हरियाणा के किसानों ने धान की खेती बड़े पैमाने पर शुरू की। वैसे भी पंजाब और हरियाणा के किसान काफी पहले से खेती के लिए ट्रैक्टरों का इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें मवेशियों के लिए पराली निकालने की जरूरत नहीं होती। ऐसे में वो उसे जलाना ही पसंद करते हैं। लेकिन दिल्ली में धुएं की ये समस्या पिछले कुछ साल से ही देखने को मिल रही है। हर साल सितंबर के आखिर और अक्टूबर के शुरू में पंजाब और हरियाणा के किसान पराली जलाते हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (ICSSR) की एक स्टडी 1991 में पब्लिश हुई थी। उसमें बताया गया था कि कैसे उन दिनों पंजाब के गांवों में जाना मुश्किल हो जाता है क्योंकि हर जगह खेत जलाए जा रहे होते हैं और उनसे मोटा धुआं हर तरफ फैला रहता है। तब और अब में फर्क यह है कि तब यह धुआं दिल्ली की तरफ आकर लोगों का दम नहीं घोंटता था।

7-8 साल से ही शुरू हुई समस्या

दरअसल पिछले कुछ साल में किसानों ने पराली जलाने का काम कुछ देरी से यानी अक्टूबर के आखिर में कर दिया है। दिल्ली में धुआं भरने के पीछे असली कारण भी यही देरी है। क्योंकि इस समय तक हवा का रुख बदलकर उत्तर से दक्षिण की तरफ हो चुका होता है। जबकि मॉनसून के आखिर यानी सितंबर तक पछुआं हवा यानी पश्चिम से पूरब की तरफ की हवा बह रही होती हैं। मैप में देखें तो पंजाब और हरियाणा दोनों ही राज्य दिल्ली से ऊपर की तरफ यानी उत्तर में हैं। अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो किसानों ने गेहूं बोने के लिए अपने खेतों की सफाई और धान की पराली जलाने में देरी शुरू कर दी? दरअसल इसके पीछे पंजाब और हरियाणा सरकार की एक नीति जिम्मेदार है। पंजाब सरकार ने 2009 में प्रिजर्वेशन ऑफ सबसॉयल एक्ट (Punjab Preservation of Subsoil Water Act) पास किया था। इस कानून के मुताबिक किसान अप्रैल में धान नहीं बो सकते। उनको इसके लिए जून के मध्य तक इंतजार करना जरूरी होता है। पंजाब की देखादेखी हरियाणा ने भी ऐसा ही कानून पास कर दिया और वहां पर भी किसानों को धान बोने के लिए जबरन जून तक का इंतजार कराया जाने लगा। बुआई रोपाई से लेकर कटाई तक धान का कुल 120 दिन का चक्र होता है। बुआई में 30 से 45 दिन की देरी का मतलब हुआ कि धान की फसल तैयार ही अक्टूबर में होगी। उस समय तक हवाओं का रुख बदल चुका होता है। तब तक किसानों के पास इतना समय नहीं होता कि वो पराली को गड्ढा खोदकर जमीन में दबाएं, क्योंकि गेहूं की बुआई में देरी हो रही होती है। ऐसे में जब वो पराली जलाते हैं तो उसका धुआं हवाओं के साथ सीधे दिल्ली और आसपास के इलाकों में पहुंचना शुरू हो जाता है। 2009 में बने इस कानून पर पूरी तरह अमल 2012 तक शुरू हुआ था और यही वो समय है जब दिल्ली में दिवाली के आसपास समस्या बढ़नी शुरू हुई थी। इस दौरान फेस्टिवल सीजन होने के कारण दिल्ली में गाड़ियों और इंडस्ट्रीज के कारण पहले ही प्रदूषण होता है जो फसली धुएं के साथ मिलकर कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा अलाव और बोनफायर भी दिल्ली के प्रदूषण में बड़ा योगदान देते हैं।

भूमिगत जल के नाम पर बना कानून

आंकड़ों पर नजर डालें तो दिवाली का धुआं प्रदूषण के लिए सबसे कम जिम्मेदार होता है। कारण ये कि ये सिर्फ एक या दो रात तक सीमित होता है। 2009 से पहले तक दिवाली की रात होने वाला प्रदूषण अगली दोपहर तक छंट चुका होता था। यहां सवाल यह भी आता है कि 2009 में फसल बुआई से जुड़ा कानून क्यों बनाया गया था? क्यों किसानों को मजबूर किया गया कि वो धान की खेती में देरी करें? दरअसल धान की बुआई में बहुत पानी की जरूरत होती है। पंजाब और हरियाणा में किसानों ने बड़े-बडे़ ट्यूबवेल लगा रखे हैं जिनसे वो धान के खेतों में पानी भर दिया करते थे। इसके कारण इन दोनों ही राज्यों में ग्राउंडवाटर को भारी नुकसान पहुंच रहा था। अप्रैल-मई में जिस समय किसान धान की क्यारियां तैयार करते उस समय काफी गर्मी होती है। जिससे सिंचाई का बहुत सारा पानी सूख जाता है। इसे देखते हुए यह फैसला लिया गया कि धान की बुआई देरी से हो। लेकिन यह फैसला भी बिना सोचे-समझे लिया गया था। हो सकता है कि किसी एक सीजन में बारिश कम होने के कारण ग्राउंड वाटर नीचे चला गया हो, लेकिन यह कहना गलत है कि इससे जमीन में पानी का लेवल स्थायी रूप से नीचे चला जाएगा। हर साल जून-जुलाई में जब मॉनसून की बारिश शुरू होती है तो कम से कम ग्रामीण इलाकों में भूमिगत जल दोबारा पुराने स्तर पर आ जाता है। हरियाणा और पंजाब से ही लगे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान देरी से बोने का कोई नियम नहीं है और वहां पर किसान जल्दी बुआई करते हैं। उन इलाकों में ग्राउंड वाटर के नीचे जाने का कोई सबूत नहीं मिला है। इस बारे में इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (International Water Management Institute IWMI) ने एक अध्ययन भी किया था। जिसके मुताबिक पश्चिमी यूपी के जिलों में ग्राउंड वाटर का स्तर मॉनसून के आखिर तक सामान्य स्तर पर पहुंच चुका होता है। उल्टा खेतों में खड़ी फसल होने से वहां पानी रुकता है जिससे जमीन में आसानी से पानी पहुंचता है।

अमेरिकी कंपनियों के जाल में भारत

तो सवाल ये कि पंजाब और हरियाणा की सरकारों ने आखिरकार ऐसा नियम क्यों बनाया, जिससे फसल में देरी हो रही है और दिल्ली का दम घुट रहा है? असल में इस सवाल के जवाब में एक ऐसी साजिश छिपी हुई है जिसे समझना हर भारतीय के लिए जरूरी है। अमेरिका ने ऐसी बहुत सारी एजेंसी बना रखी हैं जो समय-समय पर अलग-अलग मुद्दों पर रिपोर्ट पेश करती रहती हैं। इन रिपोर्ट्स के पीछे उनका अपना स्वार्थ छिपा होता है। ये एजेंसीज दरअसल जानबूझकर ऐसी रिपोर्ट्स पेश करती हैं जिनसे अमेरिकी कंपनियों को बिजनेस मिलता हो। ऐसी ही एक अमेरिकी एजेंसी है जिसका नाम USAID है। भारत में इसका दफ्तर अमेरिकी दूतावास में है। माना जाता है कि ये एजेंसी दरअसल अमेरिकी एग्रीकल्चर कंपनी मोंसेंटो (Monsanto) के लिए काम करती है। USAID ने पंजाब और हरियाणा में अपने तथाकथित अध्ययनों के आधार पर रिपोर्ट देनी शुरू की कि वहां पर ग्राउंड वाटर तेजी से नीचे जा रहा है। उन्होंने इसे ऐसी समस्या के तौर पर दिखाया मानो कोई आफत आ गई हो। मीडिया को प्रभावित करके उन्होंने इस बारे में लेख छपवाए। इतना ही नहीं भारतीय पत्रकारों की एक टीम को उन्होंने अमेरिका की यात्रा तक करवाई। लौटकर उन्होंने लेख छापा कि पंजाब और हरियाणा में भूजल खत्म होने की कगार पर है और राज्य के किसान तबाह होने वाले हैं।

धान हटाकर मक्का लाने की कोशिश

USAID एजेंसी ने इस तथाकथित समस्या का हल भी बताया और कहा कि किसानों को धान के बजाय मक्के की खेती करनी चाहिए। मोंसेंटो कंपनी मक्के के जेनेटिकली मोडिफाइड बीज बेचती है। यह वो समय था जब भारत में खाद्यान्न का कोई संकट नहीं था और चावल और गेहूं की अच्छी उपज हो रही थी। तभी USAID ने यह खबर मीडिया के जरिए उड़ाई कि दुनिया में खाद्यान्न का संकट पैदा होने वाला है। इसलिए जरूरी है कि जेनेटिकली मोडिफाइड फसलों (जीएम फूड) का सहारा लिया जाए। यहां पंजाब सरकार और मोंसेंटो में साठगांठ ने रंग दिखाना शुरू कर दिया। राज्य सरकार ने कहना शुरू कर दिया कि चावल का उत्पादन जरूरत से ज्यादा हो रहा है और वो गोदामों में पड़ा-पड़ा सड़ रहा है। इसके बजाय फसल में विविधता (Food diversity) लाई जाए तो दुनिया भर में खाद्यान्न संकट को खत्म किया जा सकता है। 2012 में तब के पंजाब के सीएम प्रकाश सिंह बादल ने मोंसेंटो को एक रिसर्च सेंटर बनाने की इजाज़त दे दी और कहा कि वो राज्य के किसानों के लिए मक्के के उन्नत बीज तैयार करें। पंजाब सरकार ने लक्ष्य रखा कि चावल की खेती एरिया कम करके 45 फीसदी तक किया जाएगा और उसकी जगह मक्के की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। मोंसेंटो ने सिर्फ राज्य के नेताओं ही नहीं, बल्कि कृषि विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों को भी अपने पक्ष में बोलने के लिए तैयार कर रखा था। उन्होंने भी पंजाब सरकार की इन कोशिशों की तारीफ करना शुरू कर दिया। 2009 में जब पंजाब सरकार ने ग्राउंड वाटर बचाने के नाम पर कानून बनाया तो उसकी बहुत तारीफ हुई। इस समय तक इसके लिए चावल की खेती को खलनायक ठहराया जा चुका था। पंजाब के तमाम बड़े-बड़े वैज्ञानिक एक स्वर में बोल रहे थे कि अगर पंजाब में कृषि को बर्बाद होने बचाना है तो ग्राउंड वाटर को बचाना जरूरी है। इस पूरी स्थिति को किसानों पर मंडरा रहे बहुत बड़े संकट की तरह दिखाया गया। दुनिया भर में मोंसेंटो के किस्सों के हिसाब से देखें तो समझना मुश्किल नहीं है कि इस पूरे प्रचार में नेताओं और मीडिया से लेकर कृषि वैज्ञानिकों तक को कैसे अपने पक्ष में किया गया होगा।

मक्का बो कर भी कोई फायदा नहीं

मोंसेंटो ने मक्के का एक बीज लॉन्च किया जो उनके मुताबिक घटते ग्राउंड वाटर की समस्या का हल था। इस मक्के में भारी मात्रा में रसायनिक खाद और कीटनाशकों यानी पेस्टीसाइड की भी जरूरत होती थी। जाहिर है इससे ग्राउंड वाटर में ज़हर घुलना शुरू हो गया। कीटनाशकों और उर्वरक का असर यह हुआ कि इससे मिट्टी के अंदर प्राकृतिक नमी खत्म होने लगी। इसका नतीजा हुआ कि किसानों को पहले से ज्यादा पानी की जरूरत होने लगी। जिसका एकमात्र जरिया ट्यूबवेल से निकाला जाने वाला ग्राउंड वाटर है। यानी ग्राउंड वाटर का दोहन कुछ खास कम नहीं हुआ। मोंसेटो अब भी किसानों को इस बात के लिए समझा रहा है कि वो धान के बजाय उसके मक्के की खेती करें। क्योंकि इसमें उसे पानी की जरूरत कम पड़ेगी। लेकिन इसमें जो खाद और कीटनाशक दवाएं इस्तेमाल होंगी वो निश्चित रूप से जमीन के अंदर पानी को दूषित ही करेंगी। मोंसेंटो के जेनेटिक मोडिफाइड बीजों से कई दूसरी समस्याएं पैदा होती हैं। जैसे कि इनके कारण फसल के आसपास होने वाले छोटे-मोटे कीड़-मकोड़े और मक्खियों को खत्म हो जाते हैं। जबकि यही कीड़े प्याज और कई दूसरी सब्जियों की पैदावार के लिए परागण का काम करते हैं। इसी कारण यूरोप के कई देश मोंसेंटो के मक्के पर पाबंदी लगा चुके हैं। सबसे खास बात यह पाई गई है कि मोंसेंटो का जीएम मक्का इंसानों के खाने के लिए ठीक नहीं है। इसका ज्यादातर इस्तेमाल मुर्गियों के दाने के लिए होता है।

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