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जब मंदिर निर्माण का समय करीब है स्वरूपानंद कहां गायब हैं?

अयोध्या में राम मंदिर पर सुनवाई आखिरी दौर में है। 17 नवंबर तक इस मामले का फैसला आने की उम्मीद है, क्योंकि सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई इसके अगले ही दिन रिटायर हो रहे हैं। फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय में रोजाना सुनवाई चल रही है। जिसमें दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें रख रहे हैं। लेकिन इस पूरे दौरान कांग्रेसी शंकराचार्य के तौर पर कुख्यात स्वरूपानंद सरस्वती और उनके चेले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद गायब हैं। यही दोनों थे जो पिछले साल लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राम मंदिर निर्माण की तारीखें तय कर रहे थे और पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी को ललकार रहे थे। तभी यह बात सामने आई थी कि ये दोनों तथाकथित हिंदू धर्मगुरु कांग्रेस के इशारे पर हंगामा कर रहे हैं। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण केंद्र सरकार के पास मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करने का कोई उपाय नहीं था। स्वरूपानंद सरस्वती कहने को हिंदू धर्म के शंकराचार्य हैं, लेकिन कई लोग कहते हैं कि उनके तार वेटिकन से जुड़े हुए हैं। उन्हें बाकायदा एक ईसाई पादरी से अपनी हीलिंग कराते भी देखा जा चुका है। यह भी पढ़ें: ये हैं कांग्रेस के करीबी भगवाधारी

चुनाव के समय कर रहे थे नाटक

आपको याद होगा कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले स्वरूपानंद के समर्थक बाबाओं के एक संगठन ने ऐलान किया था कि वो 21 फरवरी को राम मंदिर के लिए भूमिपूजन शुरू कर देंगे। लेकिन जब 21 फरवरी का दिन आया तो इन बाबाओं का अता-पता नहीं था। बाद में खबर आई थी कि उन्होंने 21 फरवरी के दिन अय़ोध्या से दूर काशी में सांकेतिक रूप से भूमि पूजन कर दिया था। जबकि राम मंदिर का शिलान्यास पहले ही हो चुका है। 9 नवंबर 1989 को विश्व हिंदू परिषद ने राम जन्मभूमि पर मंदिर का शिलान्यास विधिपूर्वक संपन्न कराया था। तब केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी, चूंकि लोकसभा चुनाव होने वाले थे इसलिए राजीव गांधी सरकार शिलान्यास का विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाई थी। स्वरूपानंद कांग्रेस के करीबी माने जाते हैं, ऐसे में सवाल उठता है कि अपनी पसंदीदा सरकार के कार्यकाल में कराए मंदिर के शिलान्यास पर क्या उन्हें भरोसा नहीं है? यह भी पढ़ें: आज से नहीं, 1966 से कांग्रेस पर है गोहत्या का पाप

संदिग्ध रहा है शंकराचार्य का चरित्र

स्वरूपानंद सरस्वती के बारे में हमेशा से यह माना जाता रहा है कि वो कांग्रेस पार्टी के वफादार हैं। हिंदू धर्म के सर्वोच्च पद पर बैठा यह शख्स हमेशा उन ताकतों के साथ दिखाई देता रहा, जो हिंदू विरोधी रही हैं। राम मंदिर मुद्दे पर ये हमेशा से विश्व हिंदू परिषद और दूसरे हिंदू संगठनों का विरोध करते रहे। जबकि यह बात किसी से छिपी नहीं है कि कांग्रेस पार्टी राम मंदिर बनाने में शुरू से ही अड़ंगा लगाती रही है। राजीव गांधी के वक्त ताला खुलवाया और शिलान्यास जरूर कराया गया था लेकिन वो भी राजनीतिक मजबूरियों के चलते। सोनिया गांधी के मजबूत होने के बाद स्वरूपानंद उनके भी करीबी हो गए। जबकि देश में ईसाई धर्मांतरण में सोनिया गांधी की भूमिका ज्यादातर लोग जानते हैं। स्वरूपानंद सरस्वती समय-समय पर ऐसी कोशिशें भी करते रहे हैं जिससे हिंदू धर्म को तोड़ा जा सके। इसी कोशिश के तहत उन्होंने कुछ साल पहले साईं बाबा के खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी थी। बाद में यह साफ हो गया था कि उनका इरादा साईं भक्तों और बाकी हिंदुओं के बीच दीवार खड़ी करने का था। इसी तरह स्वरूपानंद ने काशी विश्वनाथ मंदिर के उद्धार के काम में भी यह कहकर अड़ंगा लगाने की कोशिश की थी कि नरेंद्र मोदी पुराने मंदिर तुड़वा रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर: क्या वाकई काशी में प्राचीन मंदिर तुड़वा रहे हैं मोदी?

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