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‘गज़वा-ए-हिंद’ के बारे में जानना आपके लिए जरूरी है

अक्सर हम अखबारों और चैनलों में ग़ज़वा-ए-हिंद के बारे में सुनते हैं। आमतौर पर समझा जाता है कि ये कोई रणनीति है जिससे हिंदुस्तान को इस्लामी मुल्क बनाने की कोशिश की जा रही है। यह बात काफी हद तक सही है, लेकिन असली ग़ज़वा-ए-हिंद इससे कहीं बढ़कर है। भारत में रहने वाले सभी गैर-मुस्लिम लोगों को इसके बारे में पता होना चाहिए, ताकि वो समझ सकें कि उनके आसपास के मुसलमान जो कुछ बर्ताव करते हैं उसके पीछे असली नीयत क्या है। काफिरों को जीतने के लिए किए जाने वाले युद्ध को ‘ग़ज़वा’ कहते हैं और जो इसमें जीतता है उसे ‘ग़ाजी’ कहा जाता है। कुरान में साफ-साफ लिखा है कि जो इस्लाम को नहीं मानता वो काफिर है। यानी हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई सभी काफिर की श्रेणी में आते हैं। ‘ग़ाजी’ की उपाधि उसी के नाम के आगे लगती है जो बड़े पैमाने पर गैर-मुसलमानों की हत्या के अभियान पर निकला होता है। 1400 साल पहले अरब में जब इस्लाम पैदा हुआ था, उन दिनों भारत दुनिया का सबसे सभ्य और विकसित इलाका था। आज जहां पाकिस्तान और अफगानिस्तान हैं वो भी हिंदुस्तान का हिस्सा हुआ करते थे। अरब के इस्लामी लुटेरों की नजर सबसे पहले भारतीय राज्यों पर पड़ी और उन्होंने इस तरफ हमले शुरू कर दिए। तब इसे ही ग़ज़वा-ए-हिंद कहा गया। 1947 में भारत के बंटवारे को भी ग़ज़वा-ए-हिंद का ही हिस्सा माना गया था। आज भी तमाम कट्टरपंथी खुलकर बोलते हैं कि ग़ज़वा-ए-हिंद तब तक अधूरा है, जब तक पूरा भारत इस्लाम न कबूल ले। इस्लामी कानून के मुताबिक ग़ज़वा-ए-हिंद के 7 तरीके होते हैं:

1. अल-तकिया

यह वो चरण है जब किसी जगह पर मुसलमान कम संख्या में होते हैं। कुरान के मुताबिक इस स्थिति में मुसलमानों के लिए काफिरों से झूठ बोलना और उन्हें धोखा देना जायज माना जाता है। इस दौरान धीरे-धीरे संगठित होने और काफिरों तक अपने अंदरूनी मामलों की जानकारी न पहुंचने देने को कहा गया है। इस अवस्था में मुसलमान बहुत प्यार से रहते हैं। किसी चीज की कोई मांग नहीं करते। कानून का पालन करते हैं और गैर-मुस्लिमों के त्यौहारों में शरीक होते हैं। वो यह ध्यान रखते हैं कि उनके त्यौहारों और परंपराओं से दूसरे धर्म के लोगों को दिक्कत न हो। अल-तकिया का सबसे खतरनाक तरीका नाम बदलकर रहने का है। कई मुसलमान हिंदुओं या हिंदुओं जैसे नाम रखते हैं। जिससे उनके लिए पहचान बदलकर हिंदुओं में घुल-मिल जाने में सहूलियत होती है। आज भी अपने देश में हिंदू जैसे नामों वाले ऐसे ढेरों लोग मिलेंगे, जिनका असली मज़हब क्या है यह एक रहस्य है। यह भी पढ़ें: तालिबान से भी खतरनाक है सूफी इस्लाम

3. काफ़िरों को डराना

ग़ज़वा-ए-हिंद का ये दूसरा चरण है, जब मुस्लिम आबादी थोड़ी बढ़ने लगती है। इस दौरान काफिरों पर धोखे से हमले करने, उनकी हत्या करने और झुंड बनाकर एक ही इलाके में रहने को कहा गया है। यह माहौल पैदा करना होता है ताकि दूसरे धर्म के लोग उनके इलाकों में गुजरने से भी ख़ौफ़ खाएं। इस तरह के छिटपुट हमलों से क़ाफ़िरों के मन में डर पैदा होता है और वो झगड़े-फसाद से दूर ही रहने की कोशिश करते हैं। कहा गया है कि इस दौरान क़ाफिरों के समाज के बड़े लोगों को निशाना बनाओ। खासकर उन लोगों को सामाजिक और धार्मिक रूप से उन्हें दिशा दिखाने का काम करते हैं। अगर हम देखें तो भारत के कई इलाकों में यही स्थिति चल रही है। जब भी कोई मुसलमान भीड़ बनकर हिंदुओं के घरों या मंदिरों पर हमले करता है तो उसके दिमाग में इस अवस्था का पूरा एहसास रहता है। इसकी जानकारी मस्जिदों में दी जाती है। यह भी पढ़ें: मैंने इस्लाम क्यों छोड़ा

3. हथियार इकट्ठे करना

ग़ज़वा-ए-हिंद की ये सबसे महत्वपूर्ण स्टेज है इसमें हर परिवार को चाकू, तलवार, भाले और पिस्तौल अपने घरों में रखना होता है। यह जिहाद की असली शुरुआत होती है, जब काफ़िर को तड़पा-तड़पा कर मारने का हुक्म है। ये मौत ऐसी होनी चाहिए कि दूसरे काफिर भी देखें और डरके मारे इस्लाम कबूल कर लें। भारत के कई इलाकों में यह स्थिति काफी पहले से ही शुरू हो चुकी है। यह भी पढ़ें: इतनी बड़ी संख्या में इस्लाम क्यों छोड़ रहे हैं लोग

4. छोटे-मोटे दंगे शुरू करना

ग़ज़वा-ए-हिंद की इस अवस्था में छोटे-मोटे झगड़ों से शुरुआत की जाती है। इससे अंदाजा लगता है कि काफिरों की तरफ से जवाबी हमला या प्रतिरोध कैसा होगा। गोधरा में चलती ट्रेन में आग लगाने का मामला इसी अवस्था का था। जांच में यह बात सामने आ चुकी है कि गोधरा की लोकल मस्जिद में भीड़ को यह कहते हुए उकसाया गया था कि ग़ज़वा-ए-हिंद का वक़्त आ चुका है और अब हमें क़ाफिरों की ताकत का अंदाजा लगाना है। यह भी पढ़ें: मुसलमानों को अब गांधी क्यों याद आने लगे हैं

5. मस्जिदों का जाल फैलाना

ग़ज़वा-ए-हिंद का एक महत्वपूर्ण चरण मस्जिदों का नेटवर्क बनाना है। धर्म के नाम पर होने वाले इस काम का असली मकसद जिहाद से पहले मुसलमानों को संगठित करना और उन्हें नियमित रूप से आगे की रणनीति की जानकारी देना कहा गया है। मस्जिदों को एक तरह से शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनाया जाता है। जिसमें नमाजियों को एक ही समय पर बड़ी संख्या में बुलाकर भीड़ पैदा की जाती है और फिर रास्ते और बाजार बंद करवाकर नमाज पढ़ी जाती है।

6. सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाना

इसके तहत उन इलाकों में बसना होता है जहां रहकर सुरक्षा तंत्र पर नजर रखी जा सके। कुछ साल पहले गुरुग्राम में एक मस्जिद सुर्खियों में आई थी। ये मस्जिद गुरुग्राम के हथियार डिपो के बिल्कुल बगल में अवैध रूप से बनाई गई थी। जबकि वहां पर किसी तरह के निर्माण पर पाबंदी थी। खुफिया जांच में पता चला था कि मस्जिद बनाई ही इस मकसद से गई थी कि जरूरत पड़ने पर हथियार डिपो में ऐसी आग लगाई जा सके, जिसके कारणों का कभी पता न चले।

7. बड़े पैमाने पर दंगा-फसाद

यह ग़ज़वा-ए-हिंद का अंतिम पड़ाव है जिसमें बहुत कम समय में ज्यादा से ज्यादा काफ़िर या गैर-मुस्लिम पुरुषों को मौत के घाट उतारने का आदेश है। कश्मीर, केरल और बंगाल इसके उदाहरण हैं। इन तीनों ही राज्यों में जिहादी ताकतें सिस्टम पर लगभग पूरा नियंत्रण पा चुकी हैं और जब चाहें हिंदुओं पर हमले और दंगे करवाती हैं। यह भी पढ़ें: आईने में शक्ल देखे इस्लाम… डरावनी हो चली है

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