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रवीश कुमार से भी जूते उतरवा कर मिलीं मायावती

विवादित पत्रकार रवीश कुमार मंगलवार को महागठबंधन की रैलियों के मंच पर दिखाई दिए। इसे लेकर सोशल मीडिया में तरह-तरह की बातें हो रही हैं। क्योंकि आम तौर पर पत्रकार किसी राजनीतिक दल के मंच पर कभी नहीं जाते। यह काम फोटोग्राफर का होता है क्योंकि उसे वहां से तस्वीरें लेनी होती हैं। बताया जा रहा है कि राजनीतिक नेताओं और जनता के बीच मोदी विरोध की अलख जगाने में जुटे रवीश कुमार के लिए तब अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई जब मायावती से मुलाकात से ठीक पहले उन्हें जूते उतारने को बोल दिया गया। रवीश कुमार अपने कुछ सहयोगियों के साथ उनसे बातचीत के लिए पहुंचे थे। रवीश कुमार के साथ मौजूद एक स्थानीय पत्रकार ने इस बात की पुष्टि की कि मायावती के स्टाफ ने रवीश कुमार को पहले ही बता दिया था कि बहनजी से मुलाकात के पहले वो जूते बाहर ही उतार दें। हालांकि रवीश कुमार इस आदेश को लेकर काफी सहज दिखे और उन्होंने इस फरमान पर कोई विरोध भी नहीं जताया। रवीश कुमार ने जो तस्वीरें फेसबुक पर शेयर की हैं उनमें यह ध्यान रखा है कि किसी भी तस्वीर में उनके पैर न दिखें और लोगों को पता न चल जाए कि जूते उतरवा दिए गए थे।

रिपोर्टिंग के नाम पर चुनाव प्रचार

रवीश कुमार बीएसपी सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव की संत कबीरनगर और जौनपुर में हो रही रैली को कवर करने पहुंचे थे। उन्होंने इसकी तस्वीरें भी शेयर की हैं। एक तस्वीर में वो अखिलेश यादव के साथ हेलीकॉप्टर में बैठे हुए हैं। इससे लगता है कि वो शायद अखिलेश यादव के हेलीकॉप्टर से ही वहां पर पहुंचे थे। चुनावी मुद्दों और समीकरणों के बजाय रवीश कुमार का इस रिपोर्टिंग में भी सारा जोर फर्जी खबर फैलाने पर था। रवीश कुमार ने फेसबुक पर लिखा है कि “मंच पर अलग अलग और साथ साथ बोलते सुना। दोनों के समर्थकों का जोश आसमान पर था। दिल्ली के अख़बारों की तुलना में महागठबंधन की रैली की कहानी अलग है।” लेकिन उन्होंने जौनपुर रैली के दौरान समाजवादी पार्टी और बीएसपी के कार्यकर्ताओं के बीच रैली के ही दौरान हुई छिटपुट झड़पों का जिक्र तक नहीं किया है। दरअसल रैली के दौरान कई बार दोनों पार्टियों के समर्थकों के बीच मारपीट तक की नौबत आ गई थी। कोई भी निष्पक्ष पत्रकार अगर रैली कवर करने गया होता तो वो इस बात को जरूर हाइलाइट करता। लेकिन रवीश कुमार का मकसद ही वहां जाकर महागठबंधन के लिए चुनाव प्रचार करने का था, लिहाजा उन्हें ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया।

मंच पर भी जूते उतारना जरूरी है

मनुवाद को गालियां देने वाली मायावती जब भी किसी से मिलती हैं तो सामने वाले को जूते उतारना जरूरी होता है। उनका यह नियम खास तौर पर उनके अपने घर, गेस्टहाउस या होटल के कमरों और चुनावी सभाओं पर लागू होता है। ऐसी खबरें आ चुकी हैं कि मायावती महागठबंधन की संयुक्त रैलियों में अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल के नेता अजित सिंह से भी जूते उतरवा चुकी हैं। इन रैलियों में मायावती के अलावा जितने भी लोग होते हैं उनके पैरों में सिर्फ मोजे होते हैं। फिलहाल कांग्रेस के बजाय महागठबंधन की रैली में रवीश कुमार का जाना बहुत कुछ कहता है। अब तक पूरी ताकत लगाकर कांग्रेस का प्रचार करने वाले रवीश कुमार की उम्मीदें लगता है टूट रही हैं। यही कारण है कि उन्होंने यूपी आकर महागठबंधन के समर्थन में एक तरह की चुनावी रिपोर्टिंग कर डाली। पत्रकारिता के नाम पर रवीश कुमार की पक्षकारिता किसी से छिपी नहीं है। पीएम नरेंद्र मोदी से घृणा के चलते रवीश कुमार अक्सर ऐसी बातें भी करने लगते हैं जिससे उनकी मानसिक स्थिति को लेकर चिंता पैदा होने लगती है।

(CS)

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