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चुनाव में ‘जिहाद’ और ‘क्रूसेड’ के बीच हिंदू धर्मगुरु मौन क्यों हैं?

बायीं तस्वीर गोवर्धन मठ के शंकराचार्य निश्चलानंद की है, जबकि दायीं तरफ स्वरूपानंद सरस्वती हैं।

चुनाव के समय में मुसलमान और ईसाई धर्मगुरुओं के फतवे आम बात हैं। अक्सर देखा जाता है कि मस्जिदों के इमाम और चर्च के पादरी अपने धर्म के लोगों से अपील करते हैं कि फलां उम्मीदवार को वोट देकर जिताएं, या फलां पार्टी को हराएं। पंजाब, कर्नाटक, मेघालय, नगालैंड जैसे राज्यों में हुए चुनावों में तो खुलेआम ईसाई और मुस्लिम धर्मगुरुओं ने राजनीतिक फतवे जारी किए। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी यह ट्रेंड बना हुआ है। चर्च और मस्जिदों की तरफ से जारी राजनीतिक बयानों में अक्सर ‘जिहाद’ और ‘क्रूसेड’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। इन दोनों शब्दों का मतलब होता है ‘धर्म के अस्तित्व या उसके प्रसार के लिए युद्ध’। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर हिंदू और दूसरे सनातन धर्मों के गुरु क्या कर रहे हैं? आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हिंदुओं के कई बड़े धर्मगुरु उन्हीं पार्टियों को समर्थन दे रहे हैं जिनको जिताने के लिए चर्च और मस्जिदों से फतवे जारी होते हैं।

चर्च और मस्जिदों के चुनावी फतवे

अगर हम 2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो यूपी में जमाते-इस्लामी हिंद ने मुसलमानों से बाकायदा लिखित अपील जारी की है, जिसमें कहा गया है कि वो समाजवादी पार्टी और बीएसपी के महागठबंधन को जिताएं। दूसरी तरफ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से जुड़े एक फेसबुक पेज पर कांग्रेस के उम्मीदवारों को वोट देने की अपील की गई है। इस फेसबुक पेज पर लाखों की संख्या में एएमयू के छात्र जुड़े हुए हैं। तमिलनाडु की बिशप काउंसिल ने अपील जारी की है कि ईसाई AIADMK और बीजेपी को वोट न दें। जाहिर है उनका इशारा डीएमके-कांग्रेस गठबंधन को वोट देने के लिए है। उधर, गोवा के चर्च ने बयान जारी करके ईसाइयों से अपील की है कि वो ‘छद्म राष्ट्रवादियों’ को वोट न दें। चुनाव के दौरान ऐसी घटनाएं आम हैं। अक्सर मीडिया भी इन्हें ज्यादा तूल नहीं देता। चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं भी इस तरह के फतवों पर आंख और कान बंद कर लेती हैं। ऐसे में देखते हैं कि हमारे हिंदू धर्मगुरु क्या कर रहे हैं।

क्या कर रहे हैं शंकराचार्य स्वरूपानंद?

शंकराचार्य का हिंदू धर्म में वही स्थान है जो ईसाइयों में पोप का। उनको धरती पर शिव का प्रतिनिधि भी माना गया है। हिंदुओं को संगठित करने की भावना से आदिगुरु शंकराचार्य ने 1300 साल पहले देश की चारों दिशाओं में चार धार्मिक राजधानियां- गोवर्धन मठ, श्रृंगेरी मठ, द्वारका मठ और ज्योतिर्मठ की स्थापना की थी। शंकराचार्य का काम हिंदू समाज का मार्गदर्शन, सामाजिक बुराइयों को खत्म करना, धर्म की रक्षा, भगवान का सही रास्ता बताने की जिम्मेदारी होती है। शंकराचार्य पूरे हिंदू समाज को ‘धर्मादेश’ जारी कर सकते हैं, जिसे मानना हिंदू समाज का नैतिक कर्तव्य है। स्वरूपानंद सरस्वती एक साथ 2-2 पीठों- द्वारका और ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य हैं। लेकिन वो धर्म के कार्य से ज्यादा कांग्रेस की चाटुकारिता के लिए चर्चित रहते हैं। सोनिया गांधी, दिग्विजय सिंह जैसे हिंदू विरोधी नेताओं के साथ उनकी नजदीकी जगजाहिर है। बताते हैं कि एक साथ 2-2 मठों पर कब्जा भी कांग्रेस की मदद से ही उन्हें मिला है। शंकराचार्य के ऐसे कामों की लिस्ट लंबी है जिससे उनकी मंशा पर शक होता है।

1. राम मंदिर का विरोध: शंकराचार्य स्वरूपानंद राम मंदिर बनाने की बात तो करते हैं लेकिन उसके लिए आंदोलन कर रहे हिंदू संगठनों का विरोध करते हैं। पिछले दिनों कुंभ में उन्होंने जोरशोर से एलान कर दिया कि 21 फरवरी को वो अयोध्या में राम मंदिर के लिए भूमि पूजन करेंगे। उसके बाद चुप्पी मार गए और अयोध्या से दूर काशी में एक सांकेतिक शिलान्यास करके बैठ गए। खबर थी कि कांग्रेस उनके इस एलान से नाराज थी। शंकराचार्य ने राम मंदिर मुकदमे में कपिल सिब्बल जैसे कांग्रेसी वकीलों की भूमिका पर कभी एक शब्द नहीं कहा। इसके बजाय वो उन्हीं लोगों पर अंगुली उठाते हैं जो मंदिर के लिए हर मोर्चे पर संघर्ष कर रहे हैं।

2. शनिदेव पर भद्दा कमेंट: 2016 में स्वरूपानंद ने बयान दिया था कि शनि देवता की पूजा करने से बलात्कार बढ़ते हैं। उनकी ये टिप्पणी शनि शिंगनापुर मंदिर को लेकर उठे विवाद के बीच था। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार शनि एक देवता हैं उनके लिए शंकराचार्य की ऐसी टिप्पणी का क्या मतलब है? यह शक है कि ये बयान भी ईसाई मिशनरियों के इशारे पर था। क्योंकि शनि के आराधकों में बड़ी संख्य ऐसे लोगों की होती है जिनका धर्मांतरण करने की कोशिशें होती रही हैं।

3. हिंदू धर्म तोड़ने की कोशिश: शंकराचार्य का काम हिंदू धर्म को संगठित करने का है, लेकिन स्वरूपानंद सरस्वती कई ऐसे काम कर चुके हैं जिनसे हिंदुओं को खंडित करने में मदद मिले। इसी के तहत उन्होंने हिंदुओं से अपील की थी कि वो साईं की पूजा न करें। ये एक ऐसा बयान था, जिससे हिंदू समाज बुरी तरह हिल गया। शिरडी साईं के ज्यादातर भक्त हिंदू हैं। वो साईं को गुरु की तरह पूजते हैं और साथ ही शिव, विष्णु जैसे देवों में भी आस्था रखते हैं। शंकराचार्य के उस बयान का नतीजा यह हुआ कि साई उपासकों के एक तबके ने खुद को अलग धर्म की मान्यता देने की बात कहनी शुरू कर दी। विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस जैसे संगठनों ने शंकराचार्य की बात पर असहमति जताते हुए कहा कि भले ही साईं बाबा मुसलमान थे, लेकिन उन्हें पूजना वर्जित नहीं है। उन्होंने रसखान और कबीर जैसे कई मुसलमान भक्त कवियों का उदाहरण सामने रखा। जिसके बाद ये विवाद शांत हुआ।

4. इस्कॉन आंदोलन का विरोध: कृष्ण भक्तों की संस्था इस्कॉन का स्वरूपानंद ने ये कहते हुए विरोध शुरू कर दिया था कि वो कृष्ण भक्ति की आड़ में हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कर रहा है। उन्होंने इसे अंग्रेजों की साजिश तक बता डाली। जबकि सच यह है कि इस्कॉन दुनिया भर में लाखों ईसाइयों और मुसलमानों को सनातन धर्म की राह पर ला चुका है। उनका अपना थोड़ा अलग तरीका है, लेकिन ये सनातन हिंदू धर्म के विरुद्ध है ये बात कभी साबित नहीं हुई। स्वरूपानंद देशभर में फैली ईसाई मिशनरियों के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोलते, लेकिन इस्कॉन को लेकर उनके विरोध ने ये इशारा जरूर कर दिया कि दाल में कुछ काला जरूर है।

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद से ये बेहद उत्साहित हैं और आजकल ज्यादातर समय वहीं बिताते हैं। आए दिन अखबारों में कांग्रेस नेताओं के साथ उनकी तस्वीरें छपती रहती हैं। जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनते ही धर्मांतरण के सारे मुकदमे वापस लेने का एलान हुआ तो इन्होंने चुप्पी साध ली। मीडिया ने पूछा तब भी कोई जवाब नहीं दिया।

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती की ये तस्वीर कुछ समय पहले वायरल हुई थी। इसमें वो बदनाम ईसाई धर्म प्रचारक केए पॉल से आशीर्वाद लेते दिख रहे हैं। सवाल यह कि शंकराचार्य जैसे उच्चपदासीन धर्म गुरु का क्या ऐसे विधर्मी के साथ इस तरह दिखना शोभा देता है।

क्या कर रहे हैं गोवर्धन पीठ शंकराचार्य?

पुरी में गोवर्धन मठ के शंकराचार्य निश्चलानंद इकलौते शंकराचार्य हैं जिनके मठ के नाम से ट्विटर अकाउंट चलता है। इस पर वो लोगों से बातचीत भी करते हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने ट्वीट करके अपील की कि “हिन्दू अपने नेता को अनुशासित रखें, उनके चरण न चूमें”। समझने वाले समझ गए कि यह एक राजनीतिक अपील थी, जो कांग्रेस के समर्थन में की गई थी। शंकराचार्य निश्चलानंद धर्म के मामलों में स्वरूपानंद के मुकाबले बेहतर हैं। लेकिन राजसत्ता को लेकर उनकी चुप्पी लोगों के मन में कई संदेह पैदा करती है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद क्या कर रहे हैं?

अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य स्वरूपानंद का प्रतिनिधि माना जाता है। ये स्वरूपानंद से भी अधिक कट्टर कांग्रेसी माने जाते हैं। टीवी चैनलों पर ये राम मंदिर आंदोलन चला रही शक्तियों का खुलकर विरोध करते हैं। पीएम मोदी के खिलाफ ऐसी भड़काऊ बयानबाजी करते हैं कि कोई नेता भी शरमा जाए। पिछले दिनों काशी विश्वनाथ कॉरीडोर में जब आदि शंकराचार्य के बनाए प्राचीन मंदिरों के उद्धार का काम शुरू हुआ तो इन्होंने उसके खिलाफ आंदोलन चलाया। यह झूठ भी फैलाया कि कॉरीडोर के नाम पर मंदिर तोड़े जा रहे हैं।

क्या कर रहे हैं देवकीनंदन ठाकुर?

देवकीनंदन ठाकुर मशहूर कथावाचक हैं। लाखों लोग उनकी बातों को गंभीरता से सुनते हैं। वो राम मंदिर जैसे मुद्दों पर काफी मुखर हुआ करते थे। लेकिन पिछले साल मध्य प्रदेश चुनाव से ठीक पहले उन्होंने अचानक पलटी मार दी। एससी-एसटी एक्ट को लेकर मोदी सरकार के संविधान संशोधन को उन्होंने सवर्ण विरोधी बता दिया। और रातों-रात सवर्णों के नेता बन बैठे। कांग्रेस की शह पर उन्होंने एक राजनीतिक दल भी बना लिया। जिसने पूरे एमपी में उम्मीदवार उतारे ताकि बीजेपी के वोट काट सकें। खबरें हैं कि वो फिर से बीजेपी से नजदीकी बनाने की कोशिश में हैं, क्योंकि कांग्रेस ने सत्ता में आने के बाद उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका।

बाकी शंकराचार्य और मठाधीश भी चुनावों में चुप्पी साधे हुए हैं। सवाल यह है कि उनके मन में क्या डर है कि तमाम हिंदू विरोधी कार्यों के बावजूद वो कांग्रेस के खिलाफ खुलकर बोल नहीं पाते। यह स्थिति लोगों को परेशान कर रही है। सोशल मीडिया के जरिए लोग सवाल पूछने लगे हैं कि आखिर शंकराचार्य के स्थापित इन पीठों का काम क्या है? या फिर ये सभी कांग्रेस जैसी विधर्मी ताकत के आगे घुटने टेक चुके हैं? पढ़िए कुछ लोगों के विचार:

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कर्नाटक चुनाव के समय राहुल गांधी श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य के पास आशीर्वाद लेने गए थे। बताया जाता है कि तब शंकराचार्य ने राहुल गांधी के सामने इस बात पर नाराजगी जताई थी कि उनकी पार्टी लिंगायतों को हिंदू धर्म से तोड़ने की कोशिश कर रही है।
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