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जब चाचा नेहरू ने सेना को इस्तेमाल करके जीता था चुनाव

नेहरू के साथ दिख रहे शख्स तब के रक्षामंत्री वी कृष्णामेनन हैं। इन्हें 1962 में चीन से हार का विलेन माना जाता है।

जब भी देश के इतिहास में हुई किसी घटना या गलती का हवाला दो तो बुद्धिजीवियों को बुरा लग जाता है। इतिहास का हवाला देना जरूरी है, क्योंकि लोगों को पता चलना चाहिए कि आज जिस बात पर उंगली उठाई जा रही है, उस गलत प्रथा और रिवाज़ की शुरुआत आखिर किसने की थी। दरअसल इन चुनावों में एक खास पक्ष के लोगों को ये बुरा लग रहा है कि बीजेपी चुनावी प्रचार में देश की रक्षा से जुड़े मुद्दे (ASAT और एयरस्ट्राइक) क्यों उठा रही है? ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये पहली बार हो रहा है? नहीं, बिल्कुल नहीं। देश की सेना को चुनावी मुद्दा बनाने की शुरुआत तो आदर्श पुरूष और ‘लोकतंत्र के रक्षक’ चाचा नेहरू 60 के दशक में ही कर चुके थे। 1961 के आखिर में चाचा नेहरू के परमप्रिय मित्र और देश के तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्णा मेनन जो कि चीन से लगातार हो रही घुसपैठ, अपने भ्रष्टाचार, लचीले चरित्र, नशाखोरी और निकम्मेपन की वजह से सारे देश के निशाने पर आ चुके थे। उस समय पूरा देश रक्षामंत्री कृष्णा मेनन का इस्तीफा मांग रहा था लेकिन नेहरू अपने वामपंथी दोस्त को बचाने के लिए हर हद पार कर रहे थे। यहाँ तक कि उन्होंने आज़ादी की लड़ाई के अपने करीबी सहयोगी आचार्य कृपलानी की भी एक नहीं सुनी। देश जब आज़ाद हुआ था तब कृपलानी ही कांग्रेस के अध्यक्ष थे।

खैर 1961 में संसद में आचार्य कृपलानी (जो उस वक़्त तक अपनी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बना चुके थे) ने कृष्णा मेनन पर ऐसा हमला बोला कि उसे आज भी एक ऐतिहासिक भाषण माना जाता है। ये वो समय था जब गांधीवादी कृपलानी ने ऐलान कर दिया कि अगले साल 1962 के आम चुनाव में वो अपनी सुरक्षित सीट सीतामढ़ी छोड़कर कृष्णा मेनन के सामने उत्तरी मुंबई (वही सीट जहां इस बार उर्मिला मातोंडकर मैदान में हैं) से लड़ेंगे। मेनन की हार तय दिख रही थी लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। 18 दिसंबर 1961 को भारत की सेना धड़धड़ाती हुई गोवा में घुस गईं और महज 48 घंटे में पुर्तगाल की गुलामी से गोवा को आजाद करवा दिया गया। लेकिन अचानक हुए इस फैसले से सब हैरत में पड़ गए क्योंकि 1947 के बाद से ही गोवा को आजाद करवाने की मांग उठती रही थी लेकिन नेहरू हमेशा इसकी अनदेखी करते रहे। यहां तक कि उन्होंने गोवा की आज़ादी की आवाज़ उठाने वाले राममनोहर लोहिया को कभी गोवा के मुद्दे पर समर्थन नहीं दिया। ऐसे में यह सवाल खड़ा हुआ कि देश की आजादी के करीब डेढ़ दशक बाद अचानक 18 दिसंबर 1961 को नेहरू को गोवा कि चिंता क्यों हुई?

दरअसल इसकी वजह थी उनके परमप्रिय वामपंथी मित्र और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन। आने वाले चुनावों में मेनन मुंबई उत्तरी सीट पर आचार्य कृपलानी के सामने घिरने वाले थे। उस सीट पर गोवा की गुलामी एक ज्वलंत मुद्दा थी। गोवा में रहने वाला मराठी समुदाय हमेशा पुर्तगाली शासन के खिलाफ बागी तेवर रखता था और इसी वजह से वो पुर्तगाली अत्याचार का शिकार भी सबसे ज्यादा बना। यही वजह थी कि पूरे महाराष्ट्र में गोवा की आजादी के समर्थन में आवाज़ उठती रहती थी। लेकिन नेहरूजी ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया। 1962 में जब उत्तरी मुंबई के चुनाव हुए तो मराठी वोटरों को लुभाने के लिए नेहरू ने अपने जोड़ीदार मेनन को गोवा की जीत का हीरो बताया। इन चुनावों में सच्चे गांधीवादी कृपलानी को हराने के लिए नेहरू और मेनन ने भारतीय सेना को शौर्य को जमकर भुनाया। नतीजा नेहरू की चालाकी जीत गई और कृपलानी की सच्चाई हार गई। उत्तरी मुंबई की जनता की इस भूल या यूं कहें कि नेहरू की चालाकी की कीमत 1962 में चीन के सामने देश को चुकानी पड़ी। न कृष्णा मेनन चुनाव जीतते, न वो फिर से रक्षामंत्री बनते और न ही भारत की ऐसी बुरी पराजय होती। नेहरू-मेनन की इस जोड़ी को मैं हमेशा ’62 का खलनायक’ मानता हूं। मुझे पता है कुछ लोग ये जरूर कहेंगे कि हर बात में नेहरू जी को क्यों घसीटा जाता है? बिल्कुल घसीटा जाएगा और घसीटना भी चाहिए। दुनिया को ये पता होना चाहिए की इस ‘लोकतंत्र के रक्षक’ नेहरू ने कैसे भारतीय चुनावों में गंदगी का घिनौना बीज बोया। देश को मालूम होना चाहिए कि 2014 के पहले भी बहुत कुछ हुआ है, जो हमेशा बुद्धिजीवियों ने सात तालों में छुपा कर रखा।

भारत तो 1947 में आजाद हो गया था, लेकिन गोवा के लोगों को डेढ़ दशक और संघर्ष करना पड़ा था। क्योंकि नेहरू नहीं चाहते थे कि गोवा कभी आजाद हो। ये तस्वीर गोवा के लोगों के संघर्ष की कहानी बयान करती है।

एक बात और, गोवा 1947 और 48 में ही आज़ाद हो सकता था, बिल्कुल वैसे जैसे हैदराबाद को आजाद कराया गया था। लेकिन तत्कालीन नेहरू सरकार ने तब इसकी जरूरत ही नहीं समझी। ये भी तब जब गोवा में सिर्फ 4500 पुर्तगाली सैनिक थे लेकिन हमारी तब की सरकार 14 साल तक इंतज़ार करती रही। शायद उसे किसी चुनाव का इंतजार था।

(वरिष्ठ पत्रकार प्रखर श्रीवास्तव के फेसबुक पेज से साभार)

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