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जानिए चुनाव में कौन मीडिया समूह किस पार्टी के साथ खड़ा है

यूं तो मीडिया को निष्पक्ष और दलगत राजनीति से ऊपर होना चाहिए, लेकिन यह एक कोरी-कल्पना है जिसका सच से कोई लेना-देना नहीं है। वास्तविकता यह है कि सारे चैनलों और अखबारों के सियासी कनेक्शन हैं और वो कभी छिपे और कभी प्रकट रूप से राजनीतिक दलों के लिए काम करते हैं। अगर हम 2019 के लोकसभा चुनावों के नजरिए से बात करें तो मीडिया की भूमिका इसमें बेहद अहम है। लिहाजा यह जानना जरूरी है कि कौन सा मीडिया समूह इस लड़ाई में किस दल के साथ खड़ा है। मीडिया समूहों की राजनीतिक निष्ठा के बारे में हमने यह रिपोर्ट एक अग्रणी मीडिया संस्थान की तरफ से कराए गए सर्वे के आंकड़ों और कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत के आधार पर तैयार की है। इस सर्वे का मोटे तौर पर इशारा यही है कि यह पहला चुनाव होगा जब बीजेपी इस मैदान में कांग्रेस को बराबरी की चुनौती पेश कर रही है। मेनस्ट्रीम मीडिया में अब तक कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था। साथ ही यह भी कि मीडिया के लिहाज से नरेंद्र मोदी सबसे लोकप्रिय नेता हैं। यही कारण है कि मोदी के लिए नफरत के बावजूद चैनल और अखबार उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पाते। यह भी पढ़ें: कांग्रेस के दाग धोने में जुटा है मीडिया का फर्जी फैक्ट चेक गिरोह

इंडिया टुडे, आजतक

इस समूह के चैनलों पर कांग्रेस और बीजेपी दोनों के समर्थन और विरोध में ऐसे कार्यक्रम दिखाए जाते हैं कि लोग समझ न पाएं। लेकिन यहां बहुत बारीकी के साथ कांग्रेस को फायदा पहुंचाया जाता रहा है। मोदी विरोधी एजेंडे के बीच में कुछ सकारात्मक खबरें भी डाल दी जाती हैं ताकि भ्रम बना रहे। राजदीप सरदेसाई समेत कई मोदी विरोधी पत्रकारों को इस समूह ने मोटी सैलरी पर रखा हुआ है। इस समूह में ध्यान रखा जाता है कि फैसले लेने वाले बड़े संपादकीय पदों पर वही व्यक्ति बैठे जो कांग्रेस को पसंद हों। ये इकलौता संस्थान है जहां सिर्फ गांधी परिवार से जुड़ी खबरों को कवर करने के लिए करीब आधा दर्जन वरिष्ठ संवाददाताओं की अलग से टीम है। ये लोग बाकायदा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की तरह काम करते हैं। मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं वो जहां कहीं भी जाते हैं उनकी रैलियां और कार्यक्रम न्यूज एजेंसी एएनआई या लोकल रिपोर्टर के भरोसे कवर होती है, लेकिन सोनिया, राहुल और प्रियंका के साथ आजतक और इंडिया टुडे चैनल के संवाददाताओं की पूरी टीम पहुंचती है। ऐसा इसलिए ताकि किसी तरह की नकारात्मक रिपोर्टिंग न होने पाए। राफेल मामले पर कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने कुछ आरोप लगाया, फिर कांग्रेस की शह पर ही चैनल की एक महिला रिपोर्टर को अमित शाह की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भेजकर सवाल पूछवाए गए। जबकि वो रिपोर्टर कांग्रेस बीट कवर करती है। कांग्रेस के लिए इस समूह की निष्ठा हमेशा से रही है। ये वो चैनल है जो तलहलका और कोबरापोस्ट जैसे फर्जी स्टिंग ऑपरेशनों को ठीक चुनाव से पहले दिखाता था ताकि कांग्रेस को फायदा पहुंचाया जा सके। आजतक चैनल की टीआरपी बहुत अधिक है, यहां चलने वाली फर्जी खबरों का असर दूसरे चैनलों और अखबारों पर भी होता है। दरअसल 1976 में इमर्जेंसी के समय जब पूरे देश में प्रेस की आजादी पर पहरा लगा दिया गया था उस दौर में इंडिया टुडे का जन्म हुआ था। बताते हैं कि तब इंदिरा सरकार ने कंपनी को दिल्ली के कनॉट प्लेस में प्राइम लोकेशन पर दफ्तर दिलाया था। यह चैनल आज भी इसका एहसान मानता है और कांग्रेस के लिए अपनी निष्ठा को बरकरार रखे हुए है। हालांकि आजतक समूह ने बीजेपी के नेताओं के साथ भी बैलेंस बनाए रखा है। गुजरात दंगों के बाद मोदी सरकार के खिलाफ ज़हर उगलने के बावजूद इंडिया टुडे पत्रिका ने पीएम मोदी को देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री का दर्जा दिया था, जिसके कारण वो आज भी इस समूह के लिए सॉफ्ट कॉर्नर रखते हैं। हालांकि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह खुलकर कहते हैं कि आजतक चैनल ने बीजेपी के खिलाफ सुपारी ले रखी है। हमें बताया गया कि इस चैनल ने अपने पत्रकारों पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के खिलाफ सोशल मीडिया पर लिखने पर पाबंदी लगा रखी है, जबकि बीजेपी के खिलाफ लिखने वालों को खुली छूट मिली हुई है।

न्यूज़ 18, सीएनबीसी

वैसे तो ये अंबानी का चैनल कहा जाता है, लेकिन यहां के भी संपादकीय पदों पर देखें तो पाएंगे कि पूरी तरह से कांग्रेसी और कम्युनिस्ट पत्रकारों का कब्जा है। अंग्रेजी चैनल सीएनएन न्यूज18 के संपादक भूपेंद्र चौबे हैं जिनका कांग्रेस प्रेम छिपा नहीं है। इसी तरह हिंदी चैनल की बागडोर किशोर अजवाणी जैसे व्यक्ति के हाथ में है, जो बहुत बारीकी के साथ अपना कांग्रेस समर्थक एजेंडा चलाते हैं। बीते कुछ समय में बीजेपी सरकार के खिलाफ सबसे बड़े प्रोपोगेंडा इसी चैनल पर चलाए गए। सीएनबीसी के बिजनेस चैनल भी इसी समूह के तहत हैं। इन सभी में एक बात समान है कि इनमें ऊंचे संपादकीय पदों पर घनघोर मोदी विरोधी वामपंथी या कांग्रेसी लोग बैठे हुए हैं। सर्वे के मुताबिक इस चैनल के न्यूजरूम में भी कांग्रेस और वामपंथ समर्थकों का दबदबा है। खबरों का चयन हो या नए पत्रकारों की भर्ती पूरी तरह से उनकी मर्जी चलती है और वो किसी भी ऐसे पत्रकार को अंदर नहीं घुसने देते जिस पर उन्हें राष्ट्रवादी या भाजपा समर्थक होने का शक हो।

इंडिया टीवी

कहने को ये रजत शर्मा का चैनल है जो बीजेपी के समर्थक समझे जाते हैं। लेकिन उनके चैनल का सच कुछ और ही है। इंडिया टीवी में संपादक के पद पर विनोद कापड़ी और अजीत अंजुम जैसे घनघोर वामपंथी पत्रकारों का कब्जा रहा है। 2014 से 2016 में नोटबंदी तक इंडिया टीवी का रवैया काफी हद तक संतुलित रहा। लेकिन नोटबंदी के बाद अचानक इंडिया टीवी कट्टर मोदी विरोधी बन गया। नोटबंदी के खिलाफ फैलाई गई ढेरों फर्जी खबरें इसी चैनल की उपज थीं। माना जाता है कि नोटबंदी में इंडिया टीवी के मालिकों के भी करोड़ों रुपये रद्दी हुए। वित्त मंत्री अरुण जेटली से करीबी के बावजूद रजत शर्मा अपने नोट सफेद नहीं करवा पाए जिसकी टीस लंबे समय तक चैनल की संपादकीय नीति में दिखती रही। हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इंडिया टीवी थोड़ा नरम हुआ है। माना जाता है कि रिपब्लिक भारत चैनल की लोकप्रियता को देखते हुए मजबूरी में इसे बीजेपी सपोर्टर होना पड़ा है। क्योंकि मोदी विरोधी संपादकीय नीति का नतीजा हुआ था कि कभी दूसरे तीसरे नंबर पर रहने वाला ये चैनल छठे सातवें नंबर पर चल रहा था।

एनडीटीवी

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि एनडीटीवी हिंदू विरोधी है। इसी कारण ये चैनल कांग्रेस वामपंथी और नक्सली ताकतों को बढ़ावा देता है। अपने पक्षपाती रवैये के कारण ही लोग इसकी खबरों पर भरोसा नहीं करते और एनडीटीवी के अंग्रेजी और हिंदी दोनों चैनल लगातार डूबते गए। आज ये दोनों ही चैनल अपनी-अपनी कैटेगरी में आखिरी नंबर पर हैं। इस चैनल में रवीश कुमार जैसे दलाल हैं तो ऐसे लोग भी हैं जो संतुलन बनाकर चलना पसंद करते हैं। जब कांग्रेस सत्ता में होती है तो ये चैनल दूरदर्शन जैसा बन जाता है और जैसे ही बीजेपी सत्ता में आती है इसके पत्रकार खुद को व्यवस्था विरोधी और क्रांतिकारी साबित करने लगते हैं। हिंदू विरोधी और मोदी विरोधी होने का नतीजा है कि एनडीटीवी पर देसी-विदेशी पुरस्कारों की बारिश होती रहती है। चैनल की टीआरपी ज़ीरो के आसपास रहती है लेकिन इसके पत्रकारों को मोटी तनख्वाहें मिलती हैं। एनडीटीवी समूह किस हद तक गिरा हुआ है इसी से समझ सकते हैं कि इसने मनोहर पर्रीकर के निधन के फौरन बाद यह कहना शुरू कर दिया कि राफेल पर उनके पास अहम जानकारियां थीं। जाहिर बात है कि ऐसा कांग्रेस के एजेंडे के तहत किया गया। सर्वे में लगभग 80 फीसदी लोगों ने माना है कि ये चैनल कांग्रेस के लिए काम करता है और बीजेपी को लेकर इसके पत्रकार दुर्भावना से भरे हैं। शायद यही कारण है कि एनडीटीवी की कई महिला पत्रकारों ने कांग्रेस नेताओं के साथ शादी कर ली। यह भी पढ़ें: एनडीटीवी की अंदर की कहानी, एक पूर्व पत्रकार की जुबानी

ज़ी मीडिया समूह

सुभाष चंद्रा का ज़ी समूह को आम तौर पर राष्ट्रवादी समूह माना जाता है। मोदी सरकार आने के बाद बीते पांच साल में इस चैनल ने कई मुद्दों पर बहुत अच्छी रिपोर्टिंग की। जैसे कि कठुआ रेप केस में झूठ का इसी चैनल ने भंडाफोड़ किया था। पूर्वी यूपी में हिंदू नामों वाले पादरियों का गरीबों को बेवकूफ बनाकर ईसाई बनाने के रैकेट का खुलासा भी इसी चैनल पर हुआ। कुछ साल पहले सुभाष चंद्रा को सांसद बनने की इच्छा हुई। वो किसी भी पार्टी से सांसद बनने को तैयार थे। फिर जब मोदी सरकार सत्ता में आई तो उन्होंने सरकार का खुलकर समर्थन और कांग्रेस के विरोध में खबरें चलानी शुरू कीं। जिसका नतीजा उन्हें राज्यसभा की सीट के रूप में मिला। लेकिन मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार आने से इस ग्रुप को भारी झटका लगा। कमलनाथ ने राज्य में चल रहे ज़ी समूह के कई प्रोजेक्ट और ठेके बंद करा दिए। नतीजा यह हुआ कि सुभाष चंद्रा इन दिनों सोनिया गांधी से मिलने का वक्त मांग रहे हैं। कांग्रेस के साथ रिश्ते सुधारने की नीयत से बाकायदा राहुल गांधी को चिट्ठी भी लिखी गई कि आप हमारे बारे में गलत राय मत बनाइए। जब इससे भी काम नहीं चला तो सुभाष चंद्रा ने चैनल के संपादक सुधीर चौधरी के ऊपर अपने छोटे भाई जवाहर गोयल को बिठा दिया। यानी सुधीर चौधरी के पर कतर दिए गए। ताकि कांग्रेस में मैसेज जाए कि बीजेपी का सपोर्ट करने वाले संपादक को हमने हटा दिया है। लेकिन बीते कुछ समय से इस चैनल के सुर थोड़े बदले हुए हैं। दरअसल ये पूरी तरह से व्यापारिक संस्थान है जिसके कई और कारोबार भी फैले हुए हैं। न्यूज़ चैनल सरकार और अधिकारियों से करीबी बनाने का एक जरिया भर है। ज़ी अपने बांग्ला चैनल पर ममता सरकार के गुणगान करता है और बीजेपी विरोधी खबरें चलाता है। ये इसका पुराना रिकॉर्ड रहा है। 2007 में ज़ी न्यूज़ ही पहला चैनल था जिसने ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल शुरू किया था। इसके बाद 2014 तक चैनल का रुख मिला-जुला ही रहा। यह भी पढ़ें:इस्लाम का प्रचार कर रहा है ‘ज़ी न्यूज़ का अखबार’?

रिपब्लिक टीवी

दरअसल फिलहाल यही एक चैनल है जिसे सही मायने में बीजेपी समर्थक माना जा सकता है। चैनल पर अभी काफी शोर-शराबा है और कई बार लगता है कि वो अपरिपक्व है। लेकिन सच्चाई यही है कि दर्शक इसे पसंद कर रहे हैं। रिपब्लिक का अंग्रेजी चैनल शुरू होने के दिन से लगातार नंबर वन है और हिंदी चैनल भी तेजी से तरक्की कर रहा है और अभी तीसरे-चौथे नंबर पर बना हुआ है। रिपब्लिक चैनल इस बात का सबूत है कि न्यूज़ मार्केट में लोग राष्ट्रवादी कंटेंट देखने के लिए तरस रहे थे। ज़ी न्यूज़ का प्रोग्राम डीएनए भी राष्ट्रवादी कंटेंट के कारण रात 9 बजे के स्लॉट में लगातार नंबर वन बना हुआ है। रिपब्लिक की सफलता को देखकर इंडिया टीवी को भी राष्ट्रवादी विचार की तरफ लौटना पड़ा है। हालांकि रिपब्लिक के साथ कुछ कमियां भी हैं। ये चैनल पूरी तरह से अर्णब गोस्वामी के करिश्मे पर आधारित है। वरना चैनल के ज्यादातर पत्रकार बहुत औसत किस्म के हैं। इसके हिंदी चैनल के हेड एक ऐसे व्यक्ति हैं जो मूलत: कांग्रेसी रुझान रखते हैं। उन्होंने हिंदी चैनल में ज्यादातर पत्रकारों की भर्तियां भी कांग्रेसी या वामपंथी विचारधारा के आधार पर की हैं। ऐसे लोग मन मारकर राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए काम कर रहे हैं, यही कारण है कि रिपब्लिक भारत को देखकर अक्सर लोग इसे अपरिपक्व किस्म का न्यूज चैनल कहते हैं। दूसरी गड़बड़ी यह है कि रिपब्लिक का मालिक केरल का एशियानेट मीडिया समूह है। जो कट्टर कांग्रेसी मीडिया समूह के तौर पर जाना जाता है। माना जाता है कि एशियानेट अपने दोनों रिपब्लिक चैनलों पर राष्ट्रवादी कंटेंट को एक रणनीति के तहत दिखा रहा है। अभी इसमें बहुत आर्थिक फायदा है, लेकिन अगर भविष्य में कभी एशियानेट समूह को इसमें फायदा दिखना बंद हुआ तो वो पलटी मार सकता है। फिलहाल जब तक अर्णब गोस्वामी इस समूह के साथ जुड़े हैं इस पर भरोसा कर सकते हैं। ये इकलौता चैनल है जिसने पहली बार सीधे सोनिया गांधी परिवार पर हमला बोला, वरना आमतौर पर बाकी चैनल सोनिया गांधी के बारे में कुछ भी बुरा बोलने से डरते हैं।

टाइम्स मीडिया समूह

टाइम्स नाऊ, मिरर नाऊ चैनल और नवभारत टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और इकोनॉमिक टाइम्स इस समूह का हिस्सा हैं। यह विशुद्ध व्यापारिक समूह है जिसका न तो देश से कोई वास्ता है न किसी विचारधारा से। विशुद्ध व्यापारिक अखबार होने के बावजूद इसमें बड़ी संख्या में कांग्रेसी और वामपंथी पत्रकार भरे पड़े हैं। जिसका असर इनके प्रकाशनों पर दिखता है। हालांकि टाइम्स नाऊ में आपको कुछ हिंदू समर्थक और राष्ट्रवादी खबरें मिल जाएंगी, लेकिन ऐसा भी एक मार्केटिंग रणनीति के तहत किया गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार हिंदुओं के खिलाफ अपनी दुर्भावना के लिए पहले से बदनाम रहा है। इस अखबार में छपी झूठी खबरों का असर बेहद घातक होता है। क्योंकि इसमें छपने वाली खबरों को सारे चैनल भी चलाते हैं। इसके कुछ हाल के उदाहरण आप यहां देख सकते हैं: होली पर हिंदूफोबिया के रंग से सराबोर हुआ टाइम्स ऑफ इंडिया

एबीपी न्यूज़

एबीपी न्यूज़ बंगाल के आनंद बाजार मीडिया समूह का चैनल है। इसके कई क्षेत्रीय चैनल भी हैं। आनंद बाजार पत्रिका समूह मोटे तौर पर उस पार्टी को समर्थन करता है जिसकी बंगाल में सरकार हो। जैसे कि अभी ये पूरी तरह से तृणमूल कांग्रेस को समर्पित चैनल है। मोटे तौर पर इस समूह की संपादकीय नीति भी हिंदू विरोधी है। यहां का न्यूजरूम भी वामपंथियों से भरा पड़ा है। कुछ दिन पहले न्यूजीलैंड में हुए हमले को सबसे पहले इसी चैनल ने इस्लामोफोबिया का नतीजा बताना शुरू किया था।

न्यूज24

ये चैनल कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला का है। रोजमर्रा का कामकाज उनकी पत्नी अनुराधा प्रसाद देखती हैं। अनुराधा प्रसाद बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद की बहन हैं। चैनल का मिजाज़ पूरी तरह से कांग्रेसी है। यहां काम करने वाले ज्यादातर पत्रकार कांग्रेसी और वामपंथी रुझान वाले हैं। जो नहीं हैं, उन्हें भी रोजी-रोटी की खातिर कांग्रेस के स्तुतिगान के लिए तैयार रहना होता है।

न्यूज़ नेशन

नोएडा से चलने वाले इस चैनल का मालिकाना काफी रहस्यमय है। दावा किया जाता है कि इस चैनल में मायावती का काला धन लगा है। यही कारण है कि इस चैनल पर कभी भी मायावती के लिए कोई भी नेगेटिव खबर नहीं चलती। इसके अलावा चैनल का कोई खास राजनीतिक एजेंडा नहीं है।

दैनिक भास्कर

यह अखबार लगभग पूरी तरह से कांग्रेस को समर्पित है। इसका कारण कोई वैचारिक नहीं है। दरअसल दैनिक भास्कर समूह का नाम कांग्रेस के समय हुए कुछ घोटालों में सामने आ चुका है। मीडिया में ऐसा माना जाता है कि दैनिक भास्कर अपने व्यापारिक हितों को प्रमुखता देता है। अगर ये कांग्रेस से पूरे होते हैं तो कांग्रेस, बीजेपी से पूरे होते हैं तो बीजेपी के पक्ष में खबरें छापता है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के सत्ता में आते ही दैनिक भास्कर पूरी तरह कांग्रेसी रंग में रंग चुका है।

दैनिक जागरण

ये हिंदी का सबसे बड़ा अखबार माना जाता है, जिसका खास तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार में अधिक प्रभाव है। दैनिक जागरण मोटे तौर पर हिंदुत्ववादी और राष्ट्रवादी विचारों की तरफ झुकाव रखता है। लेकिन अपने व्यापारिक हित रास्ते में आ जाएं तो ये हमेशा उन्हें ही प्राथमिकता देता है।

डिस्क्लेमर: मीडिया समूहों के राजनीतिक झुकाव पर किया गया ये सर्वे ऑनलाइन तरीके से किया गया है। इसमें मीडिया समूहों (अखबार, चैनल और ऑनलाइन) में काम करने वाले पत्रकारों को प्रश्नावली भेजी गई, जिस पर कुल 336 पत्रकारों की प्रतिक्रियाएं मिलीं। 17 जवाब गंभीरता से दिए हुए नहीं लग रहे थे, लिहाजा उन्हें हमने सैंपल से बाहर रखा। यानी कुल सैंपल साइज 319 का रहा। मीडिया इंडस्ट्री के कुल साइज को देखते हुए ये सैंपल काफी अच्छा माना जा सकता है।
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