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क्या फिर से पाकिस्तान को बचाने की कोशिश में है ‘कांग्रेस’?

आपको यह हेडलाइन पढ़कर थोड़ा अजीब लग रहा होगा कि आखिर कांग्रेस पार्टी पाकिस्तान को क्यों बचाएगी? कांग्रेस को पाकिस्तान से क्या लेना-देना? लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें हमें ऐतिहासिक तथ्यों से समझना पड़ता है। सबसे पहले हम आपको बता दें कि 2002 में हुए गोधरा कांड और फिर गुजरात दंगों का पाकिस्तान के साथ सीधा कनेक्शन रहा था। यह वो ओपन सीक्रेट है जिसे जानते तो सब हैं लेकिन औपचारिक तौर पर कोई इसे बोलता नहीं है। दरअसल गुजरात दंगा बॉर्डर पर बुरी तरह से फंस चुके पाकिस्तान को बचाने के लिए करवाया गया था। इस पूरे खेल में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI और एक राजनीतिक पार्टी का हाथ माना जाता रहा है। पुलवामा हमले के बाद भारत ने सीमा पर एक बार फिर से पाकिस्तान पर जबर्दस्त दबाव बना रखा है। नौसेना को युद्ध की स्थिति के लिए तैयार रखा गया है, जबकि बॉर्डर पर भी दबाव कई गुना बढ़ा दिया गया है। ऐसे में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमराने की कगार पर है। वहां पर महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है। जाहिर है इस स्थिति के कारण भारत में पाकिस्तानपरस्त ताकतें बेचैन हैं। कांग्रेस से जुड़े कुछ तत्वों की बेचैनी को इसी से जोड़कर देखा जा सकता है। राहुल गांधी के करीबी सैम पित्रोदा का बयान भी इसी तरफ इशारा कर रहा है?

पाकिस्तान पर है भारी आर्थिक दबाव

पुलवामा हमले के बाद से भारत लगातार पाकिस्तान पर दबाव बनाए हुए है। यह स्थिति बिल्कुल वैसी है जैसी युद्ध के समय होती है। इसका सेना के बजट पर भारी दबाव पड़ता है। पाकिस्तान के पास इस समय सिर्फ 6 अरब डॉलर हैं। जिससे उसे अपने देश का पूरा कारोबार चलाना है। अगर सीमा पर यही स्थिति बनी रही तो 4 से 6 महीने में पाकिस्तान दिवालिया हो जाएगा। बीते एक महीने में पाकिस्तान में महंगाई की दर 2 फीसदी के औसत से बढ़कर 10 फीसदी के करीब पहुंचने को है। सऊदी अरब ने हाल ही में पाकिस्तान में 20 अरब डॉलर के निवेश का एलान किया था। अगर सीमा पर जंग के हालात रहे तो स्वाभाविक रूप से यह निवेश खुद ही अटक जाएगा। चीन चुप्पी साधे हुए है क्योंकि पाकिस्तान से ज्यादा उसके आर्थिक हित भारत से जुड़े हुए हैं। दूसरी तरफ बलोचिस्तान में पाकिस्तानी सेना पर बागियों के हमले तेज़ हो गए हैं। कुल मिलाकर पाकिस्तान एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा हुआ है, जहां से निकलने की उसे कोई राह नहीं दिख रही। पाकिस्तान को पता है कि चुनाव के बाद अगर मोदी सरकार वापस आई तो उसके लिए स्थितियां भयावह हो जाएंगी। तो सवाल यह है कि पाकिस्तान को मुसीबत से बचाने में कांग्रेस की क्या भूमिका है?

पाकिस्तान को पहले कैसे बचाया था?

13 दिसंबर 2001 को संसद भवन पर आतंकी हमला हुआ था। उसके बाद वाजपेयी सरकार ने पाकिस्तान से लगी पूरी सीमा पर सेना को तैनात कर दिया था। तब ऐसा लगा था कि अब दोनों देशों के बीच हर हाल में युद्ध होकर रहेगा। वाजपेयी जी भी मानते थे कि पाकिस्तान को एक बार अच्छी तरह से सबक सिखाया जाना जरूरी है ताकि वो आगे से भारत के खिलाफ कोई ऐसा दुस्साहस न कर सके। अभी ये सब चल ही रहा था कि 27 फरवरी 2002 को गोधरा में कारसेवकों से भरी ट्रेन को जला दिया गया। इस हमले में 59 कारसेवकों की जलकर मौत हो गई। इसके अगले दिन ही गुजरात में दंगे भड़क उठे। इस घटनाक्रम से केंद्र की वाजपेयी सरकार और सीमा पर तैनात सेना बुरी तरह से हिल गए। इससे पहले 1965 और 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध के समय देश के अंदर शांति रही थी और कहीं पर भी कोई दंगा-फसाद नहीं हुआ था। जाहिर है देश के अंदर ही आग लगी हो तो कोई सरकार या सेना सीमा पर युद्ध नहीं लड़ सकती। सेना पूरे 10 महीने तक बॉर्डर पर युद्ध की स्थिति के लिए तैयार रही इसे ऑपरेशन पराक्रम का नाम दिया गया था। इस दौरान पाकिस्तान को भी अपनी सेनाएं बैरकों से निकालकर बॉर्डर पर लगानी पड़ीं। पाकिस्तान की कंगाली का आलम यह था कि वो ये बोझ नहीं उठा पा रहा था। स्थिति उस मोड़ तक पहुंच चुकी थी जब भारत बिना लड़े ही पाकिस्तानी फौज से सरेंडर करवा सकती थी। लेकिन गोधरा कांड और उसके बाद भड़के दंगों से हालात पूरी तरह बदल गए।

गोधरा कांड के कारण हमला नहीं हुआ

कई जानकार यह मानते हैं कि तब पाकिस्तान पर हमला न होने के पीछे बड़ा कारण गोधरा कांड था। अहमदाबाद में सेना का बड़ा कैंटोनमेंट है। यहां पर हर समय हजारों की संख्या में जवान तैनात रहते हैं। लेकिन जब गुजरात में दंगा भड़का तो अहमदाबाद में सेना नहीं थी, ज्यादातर जवान बॉर्डर पर तैनात थे। कई जानकार यह मानते हैं कि गोधरा में कारसेवकों से भरी ट्रेन जलाने की साजिश रचने वालों को अच्छी तरह अंदाजा था कि इस घटना के बाद गुजरात और देश के दूसरे शहरों में दंगे भड़क जाएंगे। सेना के कई रणनीतिकार आज भी यह मानते हैं कि गोधरा कांड पाकिस्तान और आईएसआई की साजिश थी, ताकि वो बॉर्डर पर बने दबाव को हटा सकें। इसके लिए गुजरात को भी बहुत सोच-समझकर चुना गया था। इस साजिश को उन्होंने भारत में अपनी हितैषी राजनीतिक ताकतों की मदद से अंजाम दिया था। गोधरा कांड के आरोपियों के कांग्रेस के साथ संबंध जगजाहिर हैं।

फिलहाल पाकिस्तान के लिए सॉफ्ट कॉर्नर रखने वाली कांग्रेस और ऐसी तमाम दूसरी पार्टियों के नेता लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं जिससे पुलवामा हमले के लिए सेना और मोदी सरकार के लिए लोगों के दिलों में शक पैदा किया जा सके। सैम पित्रोदा हों या रामगोपाल यादव इन सभी के बयान इसी की सोची-समझी कोशिश हैं। हालांकि यह देखने वाली बात होगी कि पाकिस्तानपरस्त ताकतों को कहीं गोधरा कांड जैसी कोई घटना दोहराने का मौका न मिलने पाए।

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