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असीमानंद बरी, जानिए कांग्रेस ने कैसे रची ‘हिंदू आतंक’ की साजिश

2007 में हुए समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट केस में आखिरकार इंसाफ हो गया है। पंचकूला की स्पेशल कोर्ट ने इस मामले में आरोपी बनाए गए हिंदू धर्मगुरु स्वामी असीमानंद समेत सभी 4 आरोपियों को बरी कर दिया है। 18 फरवरी 2007 को हरियाणा के पानीपत के पास ट्रेन में हुए धमाके में 68 लोग मारे गए थे, इनमें 43 पाकिस्तानी और 10 भारतीय थे। जबकि 15 की पहचान नहीं हो सकी थी। इस हमले में कई लोग घायल भी हुए थे। तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और उसने समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट के बहाने हिंदू आतंकवाद की थ्योरी गढ़ दी। ये सब तब किया गया जबकि उस वक्त पुलिस ने ब्लास्ट के फौरन बाद दो पाकिस्तानी आतंकवादियों को रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। इनमें से एक का नाम अजमत अली था और उसने अपना गुनाह कबूल भी किया। दूसरे आतंकी का नाम मोहम्मद उस्मान था। लेकिन सिर्फ 14 दिन के अंदर कांग्रेस सरकार ने उन्हें चुपचाप पाकिस्तान भिजवा दिया। इसके बाद कांग्रेस सरकार ने केंद्रीय एजेंसियों की मदद से हिंदू आतंकवाद की कहानी गढ़ी और इस मामले में स्वामी असीमानंद को मुख्य साजिशकर्ता बताकर गिरफ्तार कर लिया गया। यह भी पढ़ें: फिर से हिंदुओं को आतंकी साबित करने में जुटी कांग्रेस

केस के जांच अधिकारी ने खोली पोल

2017 में इस केस के जांच अधिकारी इंस्पेक्टर गुरदीप सिंह ने अदालत में बयान दर्ज करवाकर पूरी कहानी बयान की और बताया कि उसने अब तक दबाव में मुंह बंद रखा था। अब रिटायर हो चुके जांच अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि पुलिस पर दबाव था कि 14 दिन में जांच पूरी करके आरोपियों को बेगुनाह करार दिया जाए। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में तब के सबूत भी पेश किए। बयान में गुरदीप सिंह ने कहा है ‘समझौता ब्लास्ट में पाकिस्तानी नागरिक अजमत अली को गिरफ्तार किया गया था। वो बिना पासपोर्ट के और बिना लीगल ट्रैवेल डाक्यूमेंटस के भारत आया था। वो दिल्ली, मुंबई समेत देश के कई शहरों में घूमा था। मैं अजमत अली के साथ उन शहरों में गया जहां-जहां वो गया था। उसने इलाहाबाद में जहां जाने की बात कही वो सही निकली लेकिन अपने सीनियर अधिकारियों, तत्कालीन एसपी भारती अरोड़ा और डीआईजी के ऑर्डर पर मैंने अजमत अली के खिलाफ कोई सबूत पेश नहीं किए। जिससे वो बरी हो गया।’ जाहिर है यह आदेश सिर्फ पुलिस अधिकारियों के बूते की बात नहीं रहा होगा, उन्हें भी ऊपर से आदेश आया होगा। वरना ये आतंकवादी हमले का पहला केस था जिसमें 2 गिरफ्तार पाकिस्तानी आतंकवादियों को 14 दिन की जांच में ही बेगुनाह घोषित करके वापस पाकिस्तान पहुंचा दिया गया। यह भी पढें: हमेशा से हिंदू विरोधी रही है कांग्रेस, पढ़िए 10 सबूत

कैसे गिरफ्तार हुआ था अजमत अली?

पाकिस्तानी नागरिक अजमत अली को अटारी बॉर्डर के पास से जीआरपी ने अरेस्ट किया था। उसके पास न तो पासपोर्ट था, न वीजा या कोई लीगल डॉक्यूमेंट। पूछताछ में उसने कबूल किया कि वो पाकिस्तानी है और उसके पिता का नाम मोहम्मद शरीफ है। उसने अपने घर का पता बताय़ा था- हाउस नंबर 24, गली नंबर 51, हमाम स्ट्रीट, जिला लाहौर, पाकिस्तान। उसने अपना अपराध भी कबूला। सबसे बड़ी बात ये कि ब्लास्ट के बाद दो चश्मदीदों ने बम रखने वाले का हुलिया बताया था वो अजमत अली और उस्मान से मिलते-जुलते थे। जिन दोनों गवाहों ने उन्हें देखा था उनके नाम शौकत अली और रुखसाना थे और ये दोनों भी पाकिस्तानी थे। ब्लास्ट के फौरन बाद खुफिया एजेंसियों के इनपुट्स के आधार पर मनमोहन सरकार ने इस हमले के पीछे लश्कर-ए-तैयबा का हाथ बताया था। लेकिन अचानक सरकार के सुर बदल गए। सबसे बड़ा सवाल था कि बिना वीज़ा-पासपोर्ट भारत में आए 2 पाकिस्तानी नागरिकों को इतनी आसानी से कैसे छोड़ दिया गया? जबकि अपराध के छोटे-मोटे मामले में पकड़े जाने पर भी जमानत होने में कई साल लग जाते हैं। यह भी पढ़ें: कर्नल पुरोहित के खिलाफ कांग्रेसी साजिश का पूरा सच

किसके इशारे पर असीमानंद को फंसाया?

समझौता ब्लास्ट के बाद सरकारी एजेंसियों की पहली प्राथमिकता पाकिस्तानी आतंकी को बचाने की थी। लेकिन इसके बाद हिंदू आतंकवाद को कैसे डाला गया। इस बारे में पहला सुराग जुलाई 2010 में हरियाणा के पुलिस अधिकारियों की एक हाईलेवल मीटिंग में मिलता है। इस मीटिंग में यह हुआ था कि मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी NIA को सौंप देनी चाहिए और इस बात की एक नोटिंग शामिल की गई कि मामले में हिंदू संगठनों के शामिल होने के कोण से भी जांच होनी चाहिए। पुलिस की इस नोटिंग से सवाल ये उठता है कि किसके कहने पर ‘हिंदू टेरर’ का नाम इस धमाके से जोड़ने का आइडिया आया? बंद कमरे में कौन-कौन अफसर थे? उस दौर में सुशील कुमार शिंदे केंद्रीय गृह मंत्री थे और उन्होंने ही ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की बैठक में भगवा आतंकवाद की बात करके सबको चौंका दिया था। बाद में पी चिदंबरम ने और दिग्विजय सिंह ने बार-बार इस बात को दोहराना शुरू कर दिया कि समझौता ब्लास्ट हिंदू संगठनों ने कराया है। चैनलों और अखबारों पर बाकायदा ऐसी खबरें करवाई गईं ताकि लगे कि यह सारे आरोप सही हैं। लेकिन यह सवाल भी उठता है कि अकेले शिंदे, चिदंबरम या दिग्विजय इतनी बड़ी साजिश नहीं रच सकते थे। उनके सिर पर एक बड़ी नेता का हाथ रहा होगा। समझना मुश्किल नहीं है कि वो बड़ी नेता कौन है।

स्वामी असीमानंद को ही क्यों फंसाया गया?

इस बात को समझने के लिए आपको यह जानना होगा कि स्वामी असीमानंद कौन हैं। उनका असली नाम जतिन चटर्जी उर्फ नबाकुमार सरकार है। बॉटनी की पढ़ाई करने वाले असीमानंद पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के रहने वाले हैं। 1990 से वो आरएसएस की संस्था वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े थे। वो इसके प्रांत प्रचारक प्रमुख भी थे। वो देशभर में आदिवासियों को धर्मांतरण को रोकने के लिए काम कर रहे थे। 1995 में उन्होंने गुजरात के आदिवासी जिले डांग में हिंदू धर्म जागरण और शुद्धीकरण अभियान चलाया था। इसमें उन्होंने ईसाई बना दिए गए 40 हजार लोगों को दोबारा हिंदू धर्म की दीक्षा दी थी। उन्होंने देशभर में कई जगह शबरीधाम मंदिरों की स्थापना की और उनसे बड़ी संख्या में आदिवासियों को जोड़ा। बंगाल, बिहार, एमपी, गुजरात और महाराष्ट्र में उनकी अच्छी खासी पहचान बन गई थी। यही बात ईसाई मिशनरियों और मुस्लिम धर्मांतरण करने वालों को खटक गई। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भारत में ईसाई धर्मांतरण की सरगना कोई और नहीं, बल्कि खुद सोनिया गांधी हैं। जिस तरह से स्वामी असीमानंद को फर्जी केस में फंसाया गया, समझा जा सकता है कि किसने ये पूरी साजिश रची थी।

फर्जी सबूतों के आधार पर बनाया आतंकी

तब कांग्रेस सरकार की जांच एजेंसियों ने दावा किया था कि स्वामी असीमानंद पहचान बदलकर हरिद्वार में छिपे थे। उन्होंने कई फर्जी पहचान पत्र बनवा रखे थे। इनमें कोलकाता से जारी किया गया पासपोर्ट, कई फर्जी राशन कार्ड और हरिद्वार प्रशासन की ओर से जारी वोटर आईडी कार्ड भी थे। ये सारे सबूत गलत पाए गए हैं। समझआ जा सकता है कि कांग्रेस सरकार के इशारे पर जांच एजेंसियों ने ही इन्हें बनवाया था ताकि वो केस को मजबूत कर सकें। समझौता ब्लास्ट के साथ-साथ उनका नाम मालेगांव ब्लास्ट में भी फंसाया गया। इसी केस में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को भी आरोपी बनाया गया था।

कांग्रेसी टॉर्चर के आगे टूट गए थे असीमानंद

कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के उलट स्वामी असीमानंद कांग्रेसी जांच एजेंसियों की प्रताड़ना सह नहीं सके थे। अधिक उम्र के कारण वो टॉर्चर नहीं सह पाए और वो सब कुछ बोलने को तैयार हो गए जो उनसे कबूलने को कहा गया। इसी के बाद 2011 में स्वामी असीमानंद ने मजिस्ट्रेट के आगे दिए इकबालिया बयान में स्वीकार किया कि अजमेर दरगाह, हैदराबाद की मक्का मस्जिद और दूसरे कई आतंकी हमलों में हिंदू संगठनों का हाथ है। यह जानकारी भी सामने आ चुकी है कि कांग्रेस सरकार इस मामले में सीधे संघ प्रमुख मोहन भागवत को आरोपी बनाने की कोशिश में थी। हालांकि कानूनी कार्रवाई जब आगे बढ़ी तो असीमानंद ने कोर्ट के आगे यह बता दिया कि पिछला बयान उन्होंने NIA के दबाव में दिया था। हालांकि भारत में जड़ें जमाए बैठे पाकिस्तान परस्त पत्रकार और कांग्रेसी नेता आज भी उसी पुराने बयान को आधार बनाकर स्वामी असीमानंद को दोषी ठहराने की कोशिश करते हैं। फिलहाल पंचकूला कोर्ट के फैसले ने कांग्रेस और गांधी परिवार के असली चेहरे को एक बार फिर से उजागर कर दिया है।

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