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प्रियंका वाड्रा के बोलने से डर क्यों रही है कांग्रेस?

2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी प्रियंका वाड्रा को ट्रंप कार्ड की तरह लेकर आई थी, लेकिन अब खबर है कि प्रियंका न तो चुनाव लड़ेंगी और न ही कहीं पर कोई भाषण देंगी। इस खबर से यह सवाल उठ रहा है कि आखिर कांग्रेस पार्टी प्रियंका के बोलने से क्यों डर रही है? चुनाव न लड़ने की बात तो समझ में आती है, लेकिन रैलियों और सभाओं में भाषण न देना कई सवाल खड़े कर रहा है। इससे पहले लखनऊ में कांग्रेस पार्टी के रोड शो में भी प्रियंका ने एक बार भी मुंह तक नहीं खोला था। क्या यह कोई रणनीति है या इसके पीछे किसी तरह का डर है? इस बारे में हमने कांग्रेस पार्टी कवर करने वाले कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से बात की। ज्यादातर का मानना है कि पार्टी को डर लग रहा है कि प्रियंका के बोलने से नए विवाद पैदा हो सकते हैं। उनके मुताबिक पहले अमेठी और रायबरेली में छोटी-छोटी समाओं में प्रियंका बोलती रहती थीं, लेकिन अब पार्टी महासचिव होने के नाते उनकी बातों को ज्यादा गंभीरता से लिया जाएगा। ऐसे में बयानबाजियों में उनसे कोई भी चूक हुई तो पार्टी को महंगा पड़ सकता है। कुछ महीने पहले इंडिया गेट पर एक कैंडल मार्च के दौरान प्रियंका जिस तरह से आपा खो बैठी थीं, उसे देखते हुए कांग्रेस के रणनीतिकार पहले ही डरे हुए हैं। यह भी पढ़ें: क्या अमेठी में राहुल गांधी को हरा पाएंगी स्मृति ईरानी

लगातार चुप्पी साधे हुए हैं प्रियंका

पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान मिलने के बाद प्रियंका ने लखनऊ में पार्टी के दफ्तर में बैठना शुरू किया था। जहां पर वो हर जिले के कांग्रेस कार्यकर्ताओं से मिल रही थीं। लेकिन पुलवामा हमले के बाद जैसे ही मीडिया के कैमरों का ध्यान उन पर से हटा उन्होंने अपनी बैठकें बंद कर दीं और वापस दिल्ली चली गईं। जिन पार्टी कार्यकर्ताओं से वो मिलीं वो सभी इसे लेकर बहुत उत्साहित हैं, लेकिन ज्यादातर का यही कहना है कि मुलाकात में जब वो अपनी बातें प्रियंका से बताते तो वो ज्यादातर समय चुप ही रहतीं। यहां तक कि संगठन में गुटबाजी और भितरघात की शिकायतों पर भी प्रियंका का चेहरा ऐसा बना रहता मानो उन्हें कुछ सुनाई ही नहीं दिया। ज्यादातर बातों पर उनका जवाब ‘अच्छा-अच्छा’ और ‘चलिए बढ़िया है आप लोग मेहनत कीजिए और इस बार राहुल जी को प्रधानमंत्री बनाइए’ होता था। सबको हैरानी है कि अगर प्रियंका इसी तरह से चुप रहेंगी तो वो उनकी बातों को कैसे समझेंगे और रणनीति पर कैसे बातचीत होगी। फूलपुर जिले के एक कांग्रेस पदाधिकारी ने अपना नाम न छापने की शर्त पर न्यूज़लूज़ को बताया कि ‘प्रियंका जी से मुलाकात में हमने अपने यहां से चुनाव लड़ने को कहा तो उन्होंने ऐसा मुंह बनाया जैसे हमने कोई अनुचित मांग रख दी हो।’ यह भी पढ़ें: एक बंगले में एक साथ क्यों नहीं रहता गांधी परिवार

टिकट बंटवारे पर भी प्रियंका चुप

कई जिलों के पदाधिकारियों ने प्रियंका से मुलाकात में टिकटों के बंटवारे पर सुझाव दिए तो उन्होंने बस सुन लिया। कहीं पर भी नामों का कोई नोट नहीं लिया। एक जिलाध्यक्ष ने हमें बताया कि अब समय है कि मजबूत उम्मीदवारों के नाम तय कर लिए जाएं, लेकिन प्रियंका इस बारे में भी कोई बात नहीं कर रहीं। उनके मुताबिक टिकटों की जिम्मेदारी कुछ मैनेजरों को सौंपी गई है जो पहले ही मन बनाकर बैठे हैं कि किन्हें उम्मीदवार बनाना है और किन्हें नहीं। उनके चयन में जीतने की संभावना से ज्यादा गुटबाजी और भाई-भतीजावाद का ध्यान रखे जाने की पूरी आशंका है। उन्हें लग रहा है कि इस बार भी ज्यादातर जगहों पर पहले से जमे-जमाए नेताओं के बेटे-बेटियों को ही टिकट मिलेगा और उनकी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा। इसके अलावा दूसरी पार्टियों से आने वाले नेताओं को भी टिकट में वरीयता मिलने की अटकलें जोरशोर से चल रही हैं। यह भी पढ़ें: केंद्रीय विद्यालयों की प्रार्थना के खिलाफ अर्जी के पीछे सोनिया गांधी

प्रियंका के रुख से कार्यकर्ता निराश

प्रियंका की चुप्पी और उनके चुनाव न लड़ने से कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं में भारी निराशा है। उन्हें लग रहा है कि आधे-अधूरे मन से जिम्मेदारी संभालने से कोई फायदा नहीं होगा। पहले ही लगभग पूरे उत्तर प्रदेश से कांग्रेस पार्टी का सफाया हो चुका है और यही रवैया रहा तो इस बार अमेठी और रायबरेली बचाना भी मुश्किल हो जाएगा। उनकी राय में लोग प्रियंका को सुनना चाहते हैं न कि उन्हें गूंगी गुड़िया बनकर हाथ हिलाते देखना चाहते हैं। कांग्रेस ने कुछ दिन पहले ही लोकसभा चुनाव के लिए 15 उम्मीदवारों के नाम के साथ अपनी पहली लिस्ट जारी की है। इस लिस्ट में सोनिया और राहुल गांधी समेत यूपी के 11 और गुजरात के 4 नेताओं का कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ाने का फैसला लिया गया है।

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