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क्या अमेठी में राहुल गांधी को हरा पाएंगी स्मृति ईरानी?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के अमेठी से ही लोकसभा चुनाव लड़ने के एलान के बाद ये अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं कि क्या वाकई इस बार वो चमत्कार होने वाला है जिसकी पहले कभी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। क्या वाकई बीजेपी की स्मृति ईरानी अमेठी लोकसभा सीट से राहुल गांधी को हरा सकती हैं? न्यूज़लूज़ ने इस बारे में कई स्थानीय लोगों से बात की, साथ ही बीते साल के वोटिंग के आंकड़ों पर नज़र डालें तो समझ में आता है कि अमेठी की लड़ाई पहली बार गांधी परिवार के लिए बेहद मुश्किल साबित होने जा रही है। खास तौर पर तब जब राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश कर रही है अगर वो अमेठी से हार जाते हैं तो उनके पूरे सियासी करियर पर दाग लग जाएगा। राजनीतिक जानकार यह मानकर चल रहे हैं कि आखिरी पलों में कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी को दक्षिण भारत की किसी सुरक्षित सीट से भी उतारने का एलान कर सकती है। इसके लिए सीट सोची भी जा चुकी होगी।

अमेठी में क्यों है हार का खतरा?

बीजेपी और बाकी राजनीतिक दल अब तक अमेठी और रायबरेली में गांधी परिवार को वॉकओवर देते रहे हैं। यहां पर आम तौर पर बेहद कमजोर उम्मीदवार उतारे जाते थे जो अक्सर अपना ही चुनाव प्रचार नहीं करते थे। लेकिन 2014 में पहली बार बीजेपी ने इस सीट पर खुलकर सीधी टक्कर दी। यहां प्रचार के लिए खुद नरेंद्र मोदी भी पहुंचे। लेकिन 2014 में कोई यह बात मानने को तैयार ही नहीं होता था कि राहुल गांधी हार सकते हैं। इस मनोवैज्ञानिक बढ़त का फायदा राहुल को हुआ भी, क्योंकि बीजेपी के कई समर्थक वोट डालने नहीं निकले। कई लोगों ने इसलिए बीजेपी को वोट नहीं दिया क्योंकि उन्हें लगा कि उनका वोट बेकार चला जाएगा। 2014 लोकसभा चुनाव में अमेठी में सिर्फ 52 फीसदी लोगों ने वोट डाले थे। राहुल को स्मृति ईरानी से सिर्फ 1 लाख अधिक वोट मिले थे। राहुल के पक्ष में सिर्फ यही बात है कि इस बार बीएसपी अपना उम्मीदवार नहीं उतार रही। लेकिन यह भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि बीएसपी के सारे वोट कांग्रेस को ट्रांसफर हो जाएंगे। (नीचे आप उस चुनाव के वोटों का चार्ट देख सकेत हैं।) ऐसे में हर किसी का यही कहना है कि अगर अमेठी में वोटिंग 60 फीसदी से अधिक हो गई तो राहुल गांधी की हार तय है। यानी बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती है कि वो वोटरों को घर से निकलने के लिए राजी कर ले। वैसे भी 2014 और उसके बाद विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद यह सोच काफी हद तक बदल चुकी है। 2014 लोकसभा चुनाव के समय अमेठी संसदीय क्षेत्र में बीजेपी का एक भी विधायक नहीं था। लेकिन अब एक गायत्री प्रजापति को छोड़कर सारे बीजेपी के ही विधायक हैं।

राहुल गांधी में गंभीरता की कमी

अमेठी संसदीय क्षेत्र के ज्यादातर लोग यह बात मानते हैं कि राहुल गांधी में गंभीरता और परिपक्वता की कमी है। चुनाव जीतने के बाद राहुल गांधी जी ने अभी तक अपने संसदीय क्षेत्र के 4–5 दौरे ही किये है। जनसभाओं की तो बाद करना ही बेकार है। देश की राजनीति में कुछ ज्यादा सक्रिय होने के चक्कर में राहुल अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी में ही निष्क्रिय हो गए। वहीं स्मृति ईरानी की बात करें तो 2014 का लोकसभा का चुनाव हारने के बाद भी वो अमेठी लोकसभा सीट का 2 दर्जन से अधिक दौरा कर चुकी हैं। जब भी वो आती हैं तब जनसभाएं करती हैं जिनमें अच्छी-खासी भीड़ जुटती है। उन्होंने अमेठी में लोगों के साथ निजी जान-पहचान विकसित किया। जब ‘उरी’ फिल्म रिलीज हुई तो स्मृति ईरानी ने एक मोबाइल सिनेमाहॉल भिजवाकर लोगों को यह फिल्म दिखाई और इस दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से लोगों से बातचीत भी की। अमेठी से एक बीजेपी कार्यकर्ता बताते हैं कि 2014 से अब तक स्मृति ईरानी 100 से ज्यादा लोगों के घरों में शादी-ब्याह, बर्थडे या किसी मातम में जा चुकी हैं।

विकास के मुद्दे पर राहुल को घेरा

स्मृति ईरानी की एक सबसे बड़ी सफलता ये रही है कि उन्होंने पूरे देश और अमेठीवासियों के मन में यह बात बिठा दी है कि गांधी परिवार उनका विकास करने में नाकाम साबित हुआ है। वो चुनाव दर चुनाव गांधी परिवार के सदस्यों को वोट देकर जिताते रहे, लेकिन उनकी किस्मत जस की तस रही। विकास के पैमाने पर अमेठी पूर्वी उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों के मुकाबले पिछड़ा हुआ है। उद्योग-धंधों की बात तो दूर अमेठी जिले का कलेक्ट्रेट भी अभी तक अस्थायी तरीके से चल रहा था। नए भवन का उद्घाटन भी पीएम मोदी के हाथों कराया गया। राहुल गांधी 2004 से यहां के सांसद हैं। विकास के नाम पर उन्होंने जो इक्का-दुक्का एलान किए भी उन पर भी काम आगे नहीं बढ़ा। जबकि मोदी सरकार आने के बाद पहली बार अमेठी की सड़कों से लेकर उद्योग-धंधों पर गंभीरता के साथ काम शुरू हुआ। स्मृति के निशाने पर नौजवान वोटर हैं, जिन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि राहुल गांधी के पिता और दादी का नाम क्या है।

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