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जानिए भारत को कैसे पता चला कि 300 आतंकी मारे गए

रिप्रेजेंटेशनल इमेज

पाकिस्तान के बालाकोट में जैश ए मोहम्मद के ठिकाने पर हवाई हमले को लेकर उठाए जा रहे सवालों के बीच कुछ अहम जानकारियां सामने आई हैं। एक सवाल पूछा जा रहा था कि आखिर कैसे पता चला कि हवाई हमले में 300 आतंकवादी मारे गए। सरकार ने इस बारे में कुछ तथ्य जारी किए हैं जिनसे आप समझ जाएंगे कि 300 आतंकी मारे जाने का दावा तो बहुत कम है। मारे गए आतंकियों की असल संख्या 500 के भी पार हो सकती है। साथ ही इस बात का जवाब भी मिल गया है कि कंधार में विमान का अपहरण करने वाले मौलाना मसूद के रिश्तेदार यूसुफ अज़हर की मौत की पुष्टि कैसे हुई। दरअसल ये सारी जानकारियां लोकल खुफिया तंत्र और साइंटिफिक डेटा पर आधारित है। यहां पर मौजूद लोगों की बड़ी संख्या का वैज्ञानिक तरीके से पता चलने के बाद ही 1000 किलो बम गिराकर पूरे इलाके को तबाह कर देने का फैसला लिया गया। यहां हमें याद रखना होगा कि बालाकोट कैंप में एक समय में 600 लोगों के ठहरने का इंतजाम था। यह भी पढ़ें: जिनेवा संधि नहीं, इस कारण अभिनंदन को छोड़ने को मजबूर हुआ पाकिस्तान

टेक्निकल सर्विलांस से पता चला

सरकारी सूत्रों के मुताबिक सुरक्षा एजेंसियों के टारगेट पर बालाकोट कैंप काफी समय से था। उन्हें पता था कि भारत पर होने वाले ज्यादातर आतंकी हमलों की साजिश यहीं पर तैयार की जाती है। साथ ही आतंकियों की भर्ती और ट्रेनिंग इसी जगह पर की जाती थी। लिहाजा यह कैंप काफी समय से जांच एजेंसियों के रेडार पर था। इसीलिए इसे टारगेट के तौर पर चुना गया। 26 फरवरी की पूरी रात इस जगह का टेक्निकल सर्विलांस पर रखा गया था। इसके लिए National Technical Research Organisation (NTRO) की मदद ली गई। उसने सैटेलाइट डेटा के आधार पर बताया कि उस रात 300 से कुछ ज्यादा मोबाइल फोन खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के उस कैंप में एक्टिव थे। इसके बाद ही हवाई हमलों को हरी झंडी दी गई। चूंकि ये पूरा ट्रेनिंग कैंप बड़े इलाके में फैला हुआ है, लिहाजा एक साथ 12 लड़ाकू विमानों को भेजा गया ताकि कम से कम समय में पूरा इलाका तबाह किया जा सके। इस पूरे कैंपस में अलग-अलग पहाड़ियों पर चार बड़ी इमारतें बनी हुई थीं, जबकि ढेरों छोटे कमरे यहां-वहां पर फैले हुए थे। इनमें स्टाफ क्वार्टर, हथियार और गोला-बारूद डिपो और कुछ सिक्योरिटी पोस्ट थे। रात करीब साढ़े 3 बजे जब भारतीय लड़ाकू विमानों ने इलाके पर बम बरसाने शुरू किए तो इन 300 में से ज्यादातर मोबाइल फोन अचानक बंद होने लगे। मतलब ये कि धमाकों में वो या तो टूट गए या जल गए। मात्र 10 मिनट बाद इस पूरे कैंपस में सिर्फ 5-7 मोबाइल फोन ही एक्टिव दिख रहे थे। इसी से समझा जा सकता है कि क्या हुआ होगा। जो मोबाइल नंबर हमले के दौरान बंद हुए, उनमें मौलाना मसूद के रिश्तेदार यूसुफ अज़हर का भी नंबर था। किसी इलाके में सक्रिय मोबाइल फोन की संख्या और उनकी डीटेल्स जानने की ये टेक्नोलॉजी भारत ने 2015 में हासिल की थी। यह भी पढ़ें: क्या इस शख्स को पुलवामा हमले के बारे में पहले से पता था

‘300 से कहीं ज्यादा मारे गए होंगे’

एक्सपर्ट्स के मुताबिक 300 एक्टिव मोबाइल फोन के हिसाब से माना जा सकता है कि 300 लोग मोबाइल फोन के साथ वहां पर थे। यह मदरसे के रूप में चलाया जा रहा टेरर कैंप था। जिसमें कई गरीब परिवारों के लड़के भी ट्रेनिंग लिया करते थे। आम तौर पर ऐसे लड़कों के पास मोबाइल फोन नहीं होते। इसके अलावा कैंप में ऐसे कई स्टाफ होते हैं जिन्हें मोबाइल फोन रखने की इजाज़त नहीं होती। इस आधार पर अनुमान जताया जा रहा है कि मरने वालों की सही संख्या दरअसल इससे बहुत अधिक होगी। हालांकि एजेंसियां अपनी तरफ से 300 ही बोल रही हैं क्योंकि इतनी मौतों को वैज्ञानिक तौर पर साबित किया जा सकता है। दरअसल 2016 में हुए सर्जिकल स्ट्राइक के समय भी NTRO की मदद ली गई थी। तब भी जिस कैंप पर हमला किया गया था वहां पर 50 एक्टिव मोबाइल फोनों के आधार पर ही दावा किया गया था कि 50 की मौत हुई है। लेकिन बाद में इसरो के सैटेलाइट कार्टोसेट की भेजी तस्वीरों को देखा गया था कि कई ट्रकों में भर-भरकर लाशें हटाई गई थीं। 26 फरवरी के ऑपरेशन में मौतों का सही-सही आंकड़ा अब भी बताया नहीं जा सकता, क्योंकि सैटेलाइट इमेज अभी तक नहीं मिल पाई है, क्योंकि जिस दिन हमला किया गया उस दिन आसमान में घने बादल थे। यह भी पढ़ें: हमारा अभिनंदन आ गया… पाकिस्तान तुम्हारा शहाजुद्दीन कहां है

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