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सबूत मांगकर ऐसे पाकिस्तान की मदद करती है कांग्रेस

पाकिस्तान के खिलाफ सेना की हर कार्रवाई के बाद कांग्रेस के नेताओं के सबूत मांगने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कई लोग यह शक जताने लगे हैं कि कहीं कांग्रेस और उसके साथी दल सबूत इसलिए तो नहीं मांग रहे ताकि भारतीय सुरक्षा तैयारियों की जानकारी पाकिस्तान तक पहुंचा सकें? यह संदेह कई लिहाज से मजबूत भी लगता है। दरअसल 2014 में सत्ता में आने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले उन एजेंसियों को मजबूत करना शुरू किया जो खुफिया तरीके से देश की सुरक्षा के काम में लगी हैं। सैटेलाइट और इंटरनेट डेटा एनालिसिस जैसे तरीके बीते कुछ साल में आतंकवादियों और देशविरोधी ताकतों पर नज़र रखने का सबसे प्रभावी तरीका बनकर उभरे हैं। सत्ता में आने के बाद ऐसी तमाम एजेंसियों को वो हाइटेक उपकरण मुहैया कराए गए जिनसे दुश्मन की गतिविधियों पर नज़र रखी जा सके। यानी ये सारा वो तंत्र है जो अभी कांग्रेस की जानकारी में नहीं है। यही कारण था कि 2016 में हुए एयरस्ट्राइक से लेकर बालाकोट एयरस्ट्राइक को लेकर कांग्रेस ने सबूत मांग कर सरकार पर दबाव बनाया। शक का सबसे बड़ा कारण है कि कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे दल सबूत मांगने का काम राजनीतिक रूप से नुकसानदेह होने के बावजूद करते हैं। उन्हें पता होता है कि ऐसा करने पर जनता में उनके लिए नाराजगी फैलेगी, इसके बावजूद अगर वो जोखिम मोल लेते हैं तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसा करने पर मिल रहा फायदा कितना बड़ा होगा। यह भी पढ़ें: जानिए भारत को कैसे पता चला कि 300 आतंकी मरे

तैयारियों की टोह लेने की कोशिश

एक जाने-माने डिफेंस एक्सपर्ट ने बताया कि 2016 में जब सर्जिकल स्ट्राइक हुआ था तो सेना इस बात को लेकर निश्चिंत थी कि आतंकी अड्डों को भारी नुकसान हुआ है। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व में पूरे विपक्ष ने इसे ‘फर्जिकल स्ट्राइक’ कहकर सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वो ऑपरेशन के सबूत दे। सरकार को इस स्थिति की उम्मीद नहीं थी। उसे लगा कि अगर इसी तरह विपक्ष दुष्प्रचार करता रहा तो लोगों के मन में यह बात बैठ जाएगी कि सर्जिकल ऑपरेशन के नाम पर उनसे झूठ बोला गया है। लिहाजा कुछ दिन बाद सरकार ने वो टेक्नोलॉजी बताई जिससे ऑपरेशन के लिए जरूरी तैयारी की गई। साथ ही कार्टोसेट नाम के उस सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें भी सार्वजनिक करनी पड़ीं, जिनमें हमले से जुड़े सबूत दर्ज थे। विपक्ष के दबाव में ही सरकार को वो वीडियो भी जारी करने पड़े जो दरअसल सैनिकों के सिर पर लगे कैमरों से लिए गए थे। आम तौर पर सेना इन सब दस्तावेजों को अपने पास रखती है ताकि आगे की तैयारियों में आसानी हो। सर्जिकल ऑपरेशन के समय कांग्रेस के साथ-साथ अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी सबूत मांगने वालों में सबसे आगे थी। केजरीवाल की देश को लेकर निष्ठा काफी समय से सवालों के दायरे में है। ऐसा भी देखा गया है कि उनकी पार्टी को पाकिस्तान और खाड़ी देशों से बड़े पैमाने पर चंदा मिला करता था। यह भी पढ़ें: मोदी के खिलाफ मसूद और कांग्रेस के बयानों में इतनी समानता क्यों है?

NTRO की टेक्नोलॉजी सार्वजनिक

26 फरवरी को बालाकोट एयरस्ट्राइक को 2 दिन के अंदर ही कांग्रेस ने बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से पूरे ऑपरेशन को संदिग्ध साबित करना शुरू कर दिया। सबसे पहले ममता बनर्जी ने सबूत मांगे। इसके बाद एक दिन ठहरकर पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, नवजोत सिद्धू, रणदीप सुरजेवाला, मनीष तिवारी और अजय सिंह जैसे बड़े कांग्रेसी नेताओं ने एक साथ सबूत-सबूत की रट लगानी शुरू कर दी। चुनावी साल होने के कारण नरेंद्र मोदी सरकार इस दबाव को ज्यादा देर तक नहीं झेल पाई और राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन यानी NTRO द्वारा बालाकोट कैंप में मोबाइल नेटवर्क की जासूसी से मरने वालों की संख्या पता करने की बात सार्वजनिक करनी पड़ी। सरकार को अंदाजा था कि एक दिन के बाद के अखबारों में चिदंबरम का वो बयान बहुत प्रमुखता से छपने वाला है जिसमें उन्होंने यह पूछा है कि आखिर सरकार को 300 आतंकी मारे जाने का पता कैसे चला। रक्षा के जानकारों के मुताबिक उम्मीद है कि सरकार ने यह बात जाहिर करते हुए भी कुछ तथ्य छिपा लिए होंगे ताकि पूरा तरीका पाकिस्तान को पता न चल सके। फिलहाल राष्ट्रीय सुरक्षा के इस संवेदनशील मामले में कांग्रेस का रवैया हर किसी को हैरान कर रहा है। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर इस बात का जिक्र भी किया है।

दरअसल कांग्रेस की गतिविधियां पिछले कुछ समय से संदिग्ध रही हैं। चीन के साथ डोकलाम विवाद के समय राहुल गांधी का चोरी-छिपे चीन के दूतावास में जाना और राफेल जैसे हथियार सौदों को रुकवाने की कोशिश करना इस शक को और मजबूत करता है।

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