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पत्थरबाजों को गोली क्यों नहीं मारती फौज, जानिए कारण

अक्सर आप सुनते होंगे कि सरकार ने कश्मीर में सुरक्षाबलों को पूरी छूट दे रखी है इसके बावजूद अक्सर तस्वीरें आती रहती हैं जिनमें पत्थरबाजों के झुंड सुरक्षाबलों को ललकारते और भारत विरोधी नारे लगाते दिखाई देते हैं। ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठता है कि ये कैसी छूट है कि सेना अब भी पत्थरबाजों पर पूरी सख्ती नहीं दिखा रही है। हमने इस बारे में जम्मू कश्मीर पुलिस के एक जिम्मेदार अधिकारी से बात की। उन्होंने जो कारण बताए वो हैरान करने वाले हैं। कश्मीर में सुरक्षाबलों ने जो नई नीति बनाई है उसके तहत पत्थरबाजों पर जब तक जरूरी हो तब तक कोई बहुत सख्त कार्रवाई नहीं की जाती है। कम से कम यह ध्यान रखा जाता है कि उनकी जान न जाए। इसका कारण जानने के लिए आपको कश्मीर के पूरे हालात पर नज़र डालनी होगी। सबसे पहले हम आपको याद दिलाते हैं पिछले दिनों हुई कुछ ऐसी घटनाएं जिनसे आप सुरक्षाबलों की इस रणनीति के पीछे का कारण समझ जाएंगे। यह भी पढ़ें: कश्मीर पर जनरल वीके सिंह की ये चिट्ठी जरूर पढ़ें

लड़की को गोली मारने का वीडियो याद है?

आपको याद होगा इसी महीने की एक तारीख को कश्मीर के शोपियां में एक लड़की को आतंकवादियों ने गोली मार दी थी। आतंकियों ने उसका वीडियो बनाया और उसे वायरल कर दिया। ये वीडियो आप इसी पेज पर नीचे देख सकते हैं। 25 साल की इस लड़की पर आतंकवादियों को शक था कि वो सुरक्षाबलों के लिए मुखबीरी करती है। इशरत मुनीर नाम की ये लड़की पुलवामा की रहने वाली थी। बताते हैं कि वो कुख्यात आतंकवादी जीनत उल इस्लाम की रिश्तेदार थी। इस लड़की के गांव में जब भी कोई आतंकवादी शरण लेने आता तो वो पुलिस और सेना को खबर कर देती। बाकी का काम सुरक्षाबल पूरा कर देते थे। जब गांव में कई आतंकी मारे गए तो उन्हें शक हो गया। लड़की के पास पुलिस का दिया एक सिमकार्ड था। जिसे लगाकर वो एक दिए हुए कोड में जानकारी भेजा करती थी। मुठभेड़ के दौरान वो सुरक्षाबलों पर पथराव करने के लिए भी जाती थी ताकि किसी को उस पर शक न हो। यह बात सुरक्षाबलों को भी पता थी यही कारण है कि पत्थरबाजों के लाख उकसावे के बावजूद वहां कभी गोली नहीं चलाई गई, क्योंकि इसमें उस लड़की की जान भी जा सकती थी। ये बदकिस्मती थी कि वो ज्यादा दिन खुद को नहीं छिपा सकी और आतंकियों के हत्थे चढ़ गई। नवंबर 2018 में शोपियां जिले के निकलोरा गाँव में 17 साल के लड़के नदीम मंज़ूर की गोलियों से छलनी लाश मिली थी। वो भी ऐसा ही मामला था। आतंकियों को शक न हो इसके लिए पत्थरबाजी करने में भी ये मुखबीर हमेशा आगे रहते हैं। कई बार इनमें से किसी पर अगर आतंकियों को शक हो जाता है तो सुरक्षाबलों की ही जिम्मेदारी होती है कि वो उन्हें सुरक्षित वहां से निकालें। पिछले एक साल में ऐसे कई मामले हुए हैं जब सुरक्षाबलों ने किसी ऐसे खबरी की जान बचाई है। यह भी पढ़ें: पाकिस्तान के लिए काम कर रहे हैं कई पत्रकार, पहली बार सामने आए सबूत

कश्मीर के गांव-गांव में मुखबीरों का तंत्र

हमारे सूत्र ने बताया कि “पिछले 2-3 साल में दक्षिणी कश्मीर में सुरक्षाबलों ने लगभग सभी गांवों में अपने खबरियों का जाल बिछा लिया है। जमीनी सच्चाई यही है कि कश्मीरी युवाओं का एक बहुत बड़ा तबका आतंकवादियों से नाखुश है और बदला लेना चाहता है।” उनके मुताबिक लोगों की इसी नाराजगी का नतीजा है कि खुफिया एजेंसियों ने बड़ी संख्या में लोगों को अपना खबरी बनाया है। लेकिन ये वो लोग हैं जो लगातार आतंकी खतरे में रहते हैं। इसलिए वो सामने आकर कुछ नहीं बोल सकते। इन्हीं लोगों के दम पर सेना ने पिछले कुछ दिनों से ‘ऑपरेशन ऑलआउट’ चला रखा है। इस ऑपरेशन की दहशत ऐसी है कि आतंकी अब गांवों में लोगों के घरों में पनाह लेने के बजाय जंगलों या खाली पड़े मकानों में रहना पसंद करते हैं। सोमवार को पुलवामा में हुए एनकाउंटर में आतंकी कामरान और उसके साथी हिलाल को मार गिराया गया। वो दोनों भी यहां पिंगलेना गांव के बाहरी इलाके में बनी एक गोदामनुमा बिल्डिंग में छिपे थे। लेकिन गांव के खबरियों ने इसकी जानकारी सुरक्षाबलों तक पहुंचा दी थी। स्पेसिफिक इन्फॉर्मेशन के आधार पर ही सुरक्षाबलों ने सोमवार तड़के उस मकान पर घेरा डाला था। खबरियों के कारण ही अकेले इस गांव में अब तक 5 आतंकवादी मौत के घाट उतारे जा चुके हैं। पुलिस को पता था कि एनकाउंटर के दौरान जो पत्थरबाज रास्ता रोकककर खड़े हैं उनमें कुछ खबरी भी हैं, इसलिए ज्यादा बल प्रयोग नहीं किया जा सकता। यह भी पढ़ें: कश्मीर के बहाने क्या चाहती है मीडिया की ये जमात

लोकल लोगों का सपोर्ट खो देने का डर

कश्मीर में पिछले दिनों में सुरक्षाबलों की कामयाबी की सबसे बड़ी वजह लोकल लोगों का बढ़ता सपोर्ट रहा है। ये वो लोग हैं जो आतंकियों से तंग आ चुके हैं और सामान्य जिंदगी जीना चाहते हैं। कई बार आतंकी लोकल परिवारों के नौजवान लड़कों को अपने साथ उठा ले जाते हैं, बाद में वो मारे जाते हैं। कई बार तो खबर वालों को लाश का मुंह देखना भी नसीब नहीं होता। ये लोग आतंकवादियों की मनमानी से परेशान हैं। खुलकर सामने भी नहीं आ सकते, लिहाजा चोरी-छिपे सुरक्षाबलों की मदद कर रहे हैं। ऐसे में सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस को हमेशा ये अहसास रहता है कि अगर उनसे आम लोगों पर जरूरत से ज्यादा सख्ती हो गई तो ये बड़ा समर्थन हाथ से निकल जाएगा। हमारे सूत्र ने बताया कि “दो-ढाई साल पहले तक दक्षिण कश्मीर के जिलों में सुरक्षाबलों के लिए आतंकियों का पता लगाना लगभग नामुमकिन हुआ करता था। जब कोई अटैक होता था तभी पता चलता था कि आतंकी कहां पर है। लेकिन अब हालात थोड़े बेहतर हैं और सेना को बाकायदा पक्की खबरें मिलती हैं और आतंकियों को उनके ठिकानों पर ही मार गिराया जाता है।” ज्यादातर पत्थरबाज आतंकियों के समर्थक हैं, लेकिन उनमें जो इक्का-दुक्का सुरक्षाबलों की मदद कर रहे हैं उनकी सलामती के खातिर सेना और पुलिस फिलहाल धैर्य बरत रहे हैं।

नीचे आप वो वीडियो देख सकते हैं जिसमें सुरक्षाबलों तक खबर पहुंचाने वाली एक लड़की को आतंकवादियों ने बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया था:

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