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जानिए क्या है शारदा घोटाला, ममता ने कैसे बंगाल को लूटा

बायीं तस्वीर कोलकाता में धरने पर बैठीं ममता बनर्जी की है, दायीं तरफ ममता की बनाई वो पेंटिंग है जिसे शारदा चिटफंड कंपनी ने 9 करोड़ रुपये में खरीदा था।

शारदा चिट फंड आम लोगों को ख्वाब बेचकर उन्हें बेवकूफ बनाने की ऐसी कहानी है, जो 2006 से शुरू होती है। ये वो समय था जब दिल्ली में मनमोहन सिंह और कोलकाता में लेफ्ट की सरकार थी। मनमोहन सरकार भी तब लेफ्ट की ही बैसाखी पर थी। उसी दौर में बंगाल में शारदा चिटफंड कंपनी ने अपना कारोबार शुरू किया। कंपनी ने पूरे बंगाल में रातोंरात अमीर बनने का लोगों को सपना दिखाया। खास तौर पर मिडिल क्लास और गरीब तबके के लोग उसके झांसे में आ गए और लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई इसमें लगानी शुरू कर दी। जैसा कि ऐसी हर जालसाज कंपनी के साथ होता है शारदा चिटफंड ने भी शुरू में लोगों को दोगुना-तीनगुना पैसा दिया। लालच बढ़ता गया और लोगों ने अपनी सारी जमापूंजी इस ठग कंपनी में लगानी शुरू कर दी। लेकिन 2013 में ये कंपनी अचानक गायब हो गई।

शारदा चिटफंड का ‘चीटिंग’ फॉर्मूला

पहला फॉर्मूला: शारदा चिटफंड कंपनी की सबसे लोकप्रिय स्कीम थी सागौन की खेती के बॉन्ड्स की। वादा था कि अगर कोई इसमें 1 लाख रुपये लगाए तो 25 साल बाद उसे 34 लाख रुपये मिलेंगे। लाखों मिडिल क्लास परिवारों ने बच्चों के पैदा होते ही उनके नाम पर 1 लाख रुपये वाली स्कीम खरीद ली। इस उम्मीद में कि जब वो 25 साल के होंगे तो 34 लाख रुपये मिल जाएंगे। सबसे ज्यादा लोगों ने इसमें पैसा लगाया। दूसरा फॉर्मूला: कंपनी की एक स्कीम थी कि आप उनसे आलू की खेती का कॉन्ट्रैक्ट कीजिए। कंपनी का कहना था कि वो आलू बोएंगे और निवेश की गई रकम को 15 महीने में दोगुना करके लौटा देंगे। किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि आलू बोने के लिए जमीन उनके पास कहां पर है? सबसे बड़ी बात यह कि आलू की खेती में दोगुना रिटर्न पाने का आखिर तरीका क्या है? तीसरा फॉर्मूला: शारदा चिटफंड सागौन की खेती के बॉन्ड्स भी बेचती थी। शारदा चिटफंड की ऐसी ही लुभावनी स्कीमों के झांसे में करीब 10 लाख लोग फंस गए और अपनी पूरी जिंदगी की कमाई लुटा बैठे। ढेरों लोग ऐसे थे जिन्होंने रिटायरमेंट के बाद मिली पूरी जमापूंजी शारदा चिटफंड में लगा दी। कंपनी का मालिक सुदीप्तो सेन इन पैसों पर ऐश करता रहा। उसने एक न्यूज चैनल भी खोल दिया और नेताओं के साथ करीबी रिश्ते बना लिए।

कैसे खुली इस जालसाजी की पोल

झूठे सपने और फरेबी स्कीम बेचने का आलम ये था कि शारदा ग्रुप ने सिर्फ 5 साल में बंगाल समेत झारखंड, ओडिशा और नॉर्थ ईस्ट राज्यों में करीब 300 दफ्तर खोल लिए थे। उसके हजारों कमीशन एजेंट्स थे जो लोगों को स्कीमों के बारे समझाकर उनसे पैसा लगवाया करते थे। लेकिन धोखे की पोल खुलते ही शारदा ग्रुप के एजेंट दफ्तरों पर ताले लगाकार गायब होने लगे। 2013 की शुरुआत में शारदा चिटफंड की मुसीबत सही मायने में बढ़ने लगी। कंपनी के कुछ दफ्तर बंद हो गए और देखते ही देखते निवेशकों में हड़कंप मच गई। लोगों ने अपने पैसे वापस मांगने शुरू किए। कंपनी के कई एजेंटों ने तो डर के मारे खुदकुशी भी कर ली। शारदा कंपनी के करीब 600 एजेंटों ने अपनी कंपनी के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। हिसाब लगाया गया तो पता चला कि कंपनी ने करीब 40 हजार करोड़ रुपये जुटाए थे। कंपनी की ठगी का अंदाजा ऐसे लगाइए कि 2013 से पहले बंगाल में शारदा कंपनी का ऐसा जलवा था कि दुर्गा पूजा से लेकर फुटबॉल मैचों तक में कंपनी प्रायोजक के तौर पर पैसा लगाती थी। 2013 से पहले कंपनी ने शारदा रियल्टी से लेकर शारदा होटल्स जैसी तमाम कंपनियां बनाकर लोगों का जमकर ठगा। निवेशकों से पैसा तो ऐंठा लेकिन रकम कभी बैंक में जमा ही नहीं हुई।

ममता की पार्टी को चिटफंड का पैसा

मई 2011 में ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं थी। शारदा चिटफंड का धंधा बंगाल में यूं तो पहले से चल रहा था लेकिन ममता के आते ही शारदा के धंधे को मानो पंख लग गए। इसके बाद ही कंपनी पूरे बंगाल में पैर पसारने में सफल हो पाई। माना जाता है कि विधानसभा चुनाव में ममता की तृणमूल कांग्रेस पार्टी को शारदा चिटफंड ने करोड़ों रुपये बतौर चंदा दिया था। इसी पैसे के दम पर 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता ने प्रचंड जीत हासिल की थी।  2013 में जब शारदा घोटाले का भंडाफोड़ हुआ तब ममता ने इसे छिपाने के लिए पूरी ताकत लगा दी। यहां तक कि सरकारी फंड से कुछ छोटे निवेशकों को उनके पैसे भी लौटाने की भी कोशिश की गई। लेकिन जैसे ही ममता की पार्टी के नेताओं के नाम घोटाले से जुड़ने शुरू हुए मामले ने सियासी रंग ले लिया। यह बात सामने आई कि ममता बनर्जी की बनाई घटिया किस्म की पेंटिंग्स को शारदा कंपनी ने करोड़ों रुपये कीमत देकर खरीदा था। यानी सीधे-सीधे ममता का भी घोटाले में नाम आ गया। जांच के लिए ममता ने एक राजीव कुमार की अगुवाई में SIT बनाई, लेकिन उनसे जांच के बजाय पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। 2014 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया, जिसमें सीबीआई से जांच कराने के आदेश दे दिए।

जांच के नाम पर ममता का घोटाला

ममता की SIT जांच के बाद शारदा कंपनी के मालिक सुदीप्तो सेन और देबजानी मुखर्जी को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन पूरा जोर इस बात पर था कि कैसे करीबियों को बचाया जाए और विरोधियों को फंसाया जाए। इस दौरान ममता ने SIT के जरिए अपनी ही पार्टी के नेता मुकुल रॉय को भी केस में लपेट दिया। मुकुल रॉय का ममता से टकराव चल रहा था और इस केस में उन्हें फंसाकर ममता ने उन्हें बलि का बकरा बना दिया। यानी ममता सरकार ने घोटाले की जांच करवाकर लोगों को उनका पैसा वापस दिलाने के बजाय इसका इस्तेमाल उन लोगों को ठिकाने लगाने में किया जो पार्टी के अंदर ही उनको चुनौती देते दिख रहे थे। कहा जा रहा है कि सीबीआई ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए सारी कार्रवाई की है, लेकिन ये भी पूरी तरह गलत है। 2014 में जांच मिलने के बाद से सीबीआई लगातार सक्रिय है। और वो इस केस में कई बड़ी गिरफ्तारियां और पूछताछ कर चुकी है। यहां तक कि मुकुल रॉय से भी पूछताछ हो चुकी है। ममता पहले कभी इतना नहीं बौखलाईं लेकिन जब पूरे घोटाले की असली कड़ी यानी राजीव कुमार तक सीबीआई पहुंच गई तो उनके लिए ढाल बनकर खड़ी हो गईं। नीचे आप देख सकते हैं सीबीआई ने इस केस में अब तक क्या-क्या कार्रवाई की:

सितंबर 2014 में टीएमसी नेता रजत मजूमदार गिरफ्तार हुए
नवंबर 2014 में टीएमसी सांसद श्रंजय बोस को पकड़ा गया
दिसंबर 2014 में ममता के मंत्री मदन मित्रा की गिरफ्तारी हुई
दिसंबर 2016 में टीएमसी सांसद तपस पाल गिरफ्तार हुए
जनवरी 2017 में टीएमसी सांसद सुदीप बंदोप्ध्याय गिरफ्तार हुए
जनवरी 2019 में ममता के खासमखास मानिक मजूमदार से पूछताछ हुई
जनवरी 2015 में टीएमसी नेता मकुल राय से भी पूछताछ हो चुकी है। लेकिन सीबीआई ने उनके जवाबों से संतुष्ट हो कर उन्हें गिरफ्तार नहीं किया था। बाद में वो खुद को बलि का बकरा बनाए जाने से नाराज होकर तृणमूल छोड़कर बीजेपी में चले गए।

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