केंद्रीय विद्यालय की प्रार्थना के खिलाफ अर्जी के पीछे कांग्रेस!

देशभर के केंद्रीय विद्यालयों में होने वाली प्रार्थना ‘असतो मा सदगमय’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका की सच्चाई सामने आ रही है। न्यूज़लूज़ को कांग्रेस पार्टी के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इसके पीछे कांग्रेस हाईकमान का दिमाग है। उनके इशारे पर ही ये याचिका ठीक लोकसभा चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट में दायर करवाई गई ताकि इसका लोकसभा चुनाव में फायदा उठाया जा सके। मुस्लिम और ईसाई कट्टरपंथी संगठनों को इस बारे में पूरी जानकारी दे दी गई है कि कांग्रेस उनकी तरफ से ये लड़ाई लड़ रही है। दरअसल केंद्रीय विद्यालयों की प्रार्थना का मसला बहुत पुराना है। पिछली यूपीए सरकार के समय भी यह बात उठी थी कि ‘असतो मा सदगमय’ हिंदू धर्मग्रंथों से लिया गया है और ये भारतीय संविधान की सेकुलर छवि से मेल नहीं खाता। लेकिन तब कांग्रेस इससे पीछे हट गई थी क्योंकि वो पहले से ही कई घोटालों और विवादों में फंस चुकी थी। ऐसे में कांग्रेस ने चुनाव से ठीक पहले मुस्लिम और ईसाई वोटों को अपने पक्ष में एकजुट करने की नीयत से ये दांव कोर्ट के जरिए चला है। इस याचिका के साथ पार्टी के नेताओं को यह ध्यान रखने को भी कहा गया है कि वो इस बारे में कोई सार्वजनिक बयान न दें, जिससे पार्टी के ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ वाले अभियान पर कोई बुरा असर पड़ता हो। यह भी पढ़ें: हिंदू धर्म के खात्मे के लिए सोनिया गांधी का गेमप्लान

कांग्रेस के करीबी वकील के जरिए याचिका

सुप्रीम कोर्ट में जबलपुर के एक वकील विनायक शाह ने ये याचिका दायर की है। इस वकील की दलील है कि केंद्रीय विद्यालयों में सुबह की प्रार्थना से हिंदू धर्म का प्रचार हो रहा है और अल्पसंख्यकों की भावनाओं को ठेस पहुंच रही है। यहां गौर करने वाली बात है कि वकील विनायक शाह सीधे तौर पर कांग्रेस से नहीं जुड़े हुए हैं, लेकिन वो कांग्रेसी वकील कपिल सिब्बल और विवेक तन्खा के बेहद करीबी हैं। याचिका के लिए विनायक शाह का चुनाव बहुत सोच-समझकर किया गया है क्योंकि वो जैन हैं। जैन होने के नाते उन पर कोई शक नहीं करेगा। यह भी रिपोर्ट्स हैं कि विनायक शाह के पीछे सारी फंडिंग और सपोर्ट कांग्रेस का है। हालांकि सारी रणनीति इस तरह से की गई है कि याचिकाकर्ता वकील के किसी भी तरह से कांग्रेस से जुड़े होने के साक्ष्य न मिल सकें। इस याचिका को लेकर फिक्सिंग किस लेवल की थी यह इसी बात से समझा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए फौरन पांच जजों की संविधान पीठ बना दी। जबकि तमाम महत्वपूर्ण मामलों में सुप्रीम कोर्ट समय न होने की बहानेबाजी करता रहता है। यह भी पढ़ें: हमेशा से हिंदू विरोधी रही है कांग्रेस, 10 सबसे बड़े सबूत

केंद्रीय विद्यालय की प्रार्थना पर नजर क्यों?

कांग्रेसी वकील विनायक शाह ने याचिका में लिखा है कि देशभर के केंद्रीय विद्यालयों में 1964 से ‘असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय’ नाम की जो प्रार्थना कराई जाती है वो पूरी तरह असंवैधानिक है। याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 के खिलाफ बताते हुए कहा है कि इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। इससे हिंदू धर्म का प्रचार हो रहा है। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि क्या इससे किसी धार्मिक मान्यता को बढ़ावा मिल रहा है। जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस नवीन सिन्हा की बेंच ने तो इसे गंभीर संवैधानिक मुद्दा भी बता दिया। हालांकि केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल करके कह दिया है कि इस प्रार्थना से किसी धर्म का प्रचार नहीं होता। यह सार्वभौमिक सत्य है। लेकिन जस्टिस नरीमन को समस्या यह थी कि श्लोक उपनिषद से लिया गया है, इसके जवाब में सरकारी वकील तुषार मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के लोगो पर भी संस्कृत में लिखा है- ‘यतो धर्मस्ततो जय:’। यह महाभारत से लिया गया है। इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि सुप्रीम कोर्ट धार्मिक है। संस्कृत को किसी धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। यह भी पढ़ें: हिंदू धर्म को तोड़कर नया धर्म बनाना चाहती हैं सोनिया

दरअसल पिछले कुछ साल से कांग्रेस पार्टी देश में हिंदू प्रतीकों को मिटाने के अभियान में जुटी है। इसी के तहत पहला हमला दक्षिण भारत के पर्व जल्लीकट्टू पर किया गया। इस पर पाबंदी लगवाने के बाद दिवाली जैसे हिंदू त्यौहारों को निशाना बनाना शुरू किया गया। इसी क्रम में पिछले दिनों सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट के जरिए आदेश पारित करवाया गया। अब केंद्रीय विद्यालयों की प्रार्थना कांग्रेस के निशाने पर है, जिसमें निश्चित रूप से उसे देश की न्यायपालिका की तरफ से भी भरपूर मदद मिल रही है।

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