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छत्तीसगढ़ में चर्च के कहने पर बंद हुई आयुष्मान योजना!

छत्तीसगढ़ में आयुष्मान भारत योजना बंद किए जाने के पीछे बेहद चौंकाने वाली जानकारी सामने आ रही है। इसके मुताबिक ईसाई मिशनरियों के दबाव में छत्तीसगढ़ की नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार ने ये योजना बंद की है। राज्य कांग्रेस से जुड़े हमारे एक सूत्र ने बताया कि “विधानसभा चुनावों के समय से ही स्पष्ट था कि अगर पार्टी सत्ता में आएगी तो वो सबसे पहले आयुष्मान भारत योजना को बंद कराएगी। दरअसल चर्च ने इसी आधार पर कांग्रेस को समर्थन भी दिया था।” ताजा स्थिति यह है कि छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार केंद्र सरकार की इस स्कीम पर अमल बंद करवा चुके हैं और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री को इस बारे में स्पष्ट रूप से इशारा कर दिया गया है। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कांग्रेस सरकार के इस कदम का ये कहते हुए विरोध किया है कि इससे लाखों गरीबों को फायदा हो रहा है। यह भी पढ़ें: ईसाई धर्म अपना कर पछता रहे हैं लाखों दलित परिवार

ईसाई मिशनरीज़ को क्या है दिक्कत?

दरअसल नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल अपनी महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत छत्तीसगढ़ से ही की थी। तब कई लोगों ने इसके सांकेतिक मतलब की तरफ ध्यान दिलाया था। माना जाता है कि छत्तीसगढ़ और ओडिशा वो दो राज्य हैं जिनमें ईसाई धर्मांतरण सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। इसका सबसे बड़ा कारण माना जाता है खराब सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को। दूरदराज के इलाकों में सरकारी अस्पताल नहीं के बराबर हैं और वहां पर इलाज के लिए लोगों के पास ईसाई मिशनरियों के अस्पतालों के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। मिशनरी इसका फायदा धर्मांतरण के लिए उठाती हैं। पिछली बीजेपी सरकार ने मुफ्त चावल और दूसरी जनकल्याणकारी योजनाओं से आदिवासियों को काफी हद तक ईसाई मिशनरियों के चंगुल में जाने से रोक लिया था। लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र में वो भी कुछ खास काम नहीं कर पाई। लेकिन आयुष्मान भारत योजना ने उस कमी को भी पूरा कर दिया। इस योजना से गरीब आदिवासी रायपुर, अंबिकापुर जैसे बड़े शहरों में आकर प्राइवेट अस्पतालों में मुफ्त इलाज करवाने लगे थे। यही बात ईसाई मिशनरीज़ को खटकने लगी थी। यह भी पढ़ें: 10 बातें जिन्हें जानकर आप मदर टेरेसा से नफरत करने लगेंगे

चर्च के चंगुल में फंसा है छत्तीसगढ़

2011 की जनगणना के हिसाब से देखें तो राज्य में ईसाइयों की आबादी 2 फीसदी से भी कम है। लेकिन यह सच्चाई नहीं है। राज्य की आबादी में करीब 35 फीसदी हिस्सा आदिवासियों और 12 फीसदी अनुसूचित जातियों का है। इसके अलावा बड़ी संख्या में दूसरी पिछड़ी जातियों के गरीब लोग रहते हैं। ये सभी ईसाई मिशनरीज़ का शिकार माने जाते हैं। आरक्षण के कारण ये लोग सीधे धर्मांतरण नहीं करते, इसके लिए मिशनरियों ने एक उपाय दे रखा है कि उन्हें एक क्रॉस पहनना होगा, घर में ईसा मसीह की तस्वीर टांगनी होगी और हर रविवार को चर्च में होने वाले मास में आना होगा। लेकिन सरकारी दस्तावेजों में वो अपना धर्म हिंदू लिखवाते हैं ताकि आरक्षण मिलता रहे। रायगढ़, जसपुर और सरगुजा जिलों में ईसाइयों की वास्तविक आबादी 20 फीसदी से अधिक होने का अनुमान है। इसके अलावा नक्सली इलाकों में भी चर्च और नक्सलियों की साठगांठ है। माना जाता है कि नक्सलियों को चर्च से भरपूर पैसा मिलता है। यह भी पढ़ें: धर्मांतरण कराने वाली सबसे बड़ी एजेंसी देश छोड़कर भागी

क्यों जरूरी है आयुष्मान भारत स्कीम?

दरअसल आयुष्मान भारत योजना गरीबों को वो सुरक्षा देती है जिसकी अब तक कल्पना भी नहीं की जाती थी। जिस तरह से कॉरपोरेट सेक्टर में काम करने वालों को एक से दो लाख रुपये तक की कैशलेस मेडीक्लेम सुविधा मिलती है, ठीक उसी तर्ज पर मोदी सरकार ने गरीबों को साल में 5 लाख रुपये तक मुफ्त इलाज की ये स्कीम चालू की। इस योजना में छत्तीसगढ़ के 42 लाख परिवारों का 1100 रुपये प्रति परिवार के हिसाब से बीमा कराया गया है। इसमें 660 रुपये केंद्र और 440 रुपये राज्य सरकार देती है। राज्य सरकार को इस मद में सिर्फ करीब 180 करोड़ रुपये देने पड़ते हैं, जबकि बदले में बड़ी आबादी को फायदा होता है। लेकिन कांग्रेस सरकार आने के बाद से ही गरीबों के कल्याण की इस योजना पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। छत्तीसगढ़ सरकार के इस पैंतरे को आम लोग भी अच्छी तरह से समझ रहे हैं और कई लोगों ने सोशल मीडिया पर इस आशंका को खुलकर जताया है। यह भी पढ़ें: दिल्ली में ईसाई मिशनरियों को फैला रहे हैं अरविंद केजरीवाल

दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक बिल गेट्स ने भी आयुष्मान भारत योजना की तारीफ की है और इसकी सफलता पर पीएम नरेंद्र मोदी को बधाई दी है।

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