मायावती के मन में क्या है? जानिए क्या सोचते हैं उनके करीबी

लोकसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठजोड़ की खबर राजनीति का कितना बड़ा अजूबा है, इस बात को वही लोग समझ सकते हैं जिन्हें 2 जून 1995 में हुआ गेस्टहाउस कांड के बारे में पता है। आज से कुछ साल पहले तक कोई यकीन नहीं कर सकता था कि बीएसपी सुप्रीमो मायावती कभी उस पार्टी से गठजोड़ कर लेंगी, जिसके गुंडों ने उनके साथ न सिर्फ मारपीट की थी, बल्कि कपड़े तक फाड़ डाले थे। वो दिन था जब मायावती की हत्या की कोशिश तक हुई थी। कई लोग इसे मायावती की राजनीतिक मजबूरी मान रहे हैं क्योंकि यूपी में उनकी पार्टी का लगभग सफाया हो गया है। जबकि बहुजन समाज पार्टी से ही जुड़े सूत्र मानते हैं कि ये बहनजी का ‘मास्टरस्ट्रोक’ है। उनका कहना है कि मायावती उस हमले के बाद से आज तक प्रतिशोध की आग में जलती रही हैं। यही कारण है कि उन्होंने कभी भी मुलायम सिंह यादव का नाम सम्मान के साथ नहीं लिया। लेकिन मायावती को अब वो मौका मिला है जब वो मुलायम के बेटे अखिलेश को वो जख्म दे सकती है कि 1995 में उन्हें मिले अपमान का हिसाब बराबर हो जाए। हमने इस बारे में मायावती के कई पुराने भरोसेमंद लोगों से बात की और ज्यादातर इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि बहनजी ने अपना अपमान भुलाया नहीं है। यह भी पढ़ें: मायावती को छोड़ मोदी के पास क्यों जा रहे हैं दलित

मुलायम की बेबसी का है अंदाजा

अभी तक किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की है कि मुलायम सिंह यादव की रजामंदी इस गठबंधन के लिए है भी या नहीं। वास्तव में मुलायम इस बात के लिए कभी सहमत नहीं हो सकते। 2014 के चुनाव से पहले लालू यादव ने उन्हें बीएसपी के साथ गठजोड़ करने के लिए मनाने की कोशिश की थी, तब भी मुलायम ने उन्हें साफ मना कर दिया था। उन्होंने कहा था कि चुनाव हार जाएंगे, लेकिन बीएसपी से गठजोड़ संभव ही नहीं है। तो अब ऐसा क्या हो गया कि उसी मुलायम के बेटे मायावती के बगल में जाकर बैठ गए। बीएसपी के सूत्रों के मुताबिक मायावती इसे अवसर के तौर पर देखती हैं, जब मुलायम एक बेबस बाप की तरह चुपचाप अपनी मर्जी के खिलाफ हो रहे इस गठजोड़ को देखने को मजबूर हैं। शायद मुलायम इस बात को समझ भी सकते हैं कि अपना राजनीतिक स्वार्थ्य पूरा होने के बाद मायावती उनके बेटे को धोखा जरूर देंगी। यह भी पढ़ें: देश की वो 5 बड़ी राजनीतिक पार्टियां जो जल्द ही लुप्त होने की कगार पर हैं

‘पता है यादव वोट ट्रांसफर नहीं होंगे’

बुलंदशहर में मायावती के पैतृक गांव बादलपुर में उनके लिए काम करने वाले एक बुजुर्ग पदाधिकारी ने कहा कि “मायावतीजी को भी पता है कि यादव वोटर कभी भी बीएसपी को नहीं जाएगा। जिन सीटों पर सपा का उम्मीदवार नहीं होगा वहां पर यादव वोटर बीजेपी या कांग्रेस को वोट दे देगा।” यह बात यूपी की एक राजनीतिक सच्चाई है। मायावती इसे अच्छी तरह जान रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अखिलेश से गठबंधन के पीछे मायावती का इकलौता फायदा यह है कि सपा कैंडिडेट खड़ा न होने पर मुस्लिम वोट हाथी को मिलेंगे। मायावती को मुस्लिम वोटों की सख्त जरूरत भी है क्योंकि उनके अपने वोट बेस में अगर मुस्लिम वोट भी जुड़ जाएं तो वो कई सीटों पर जीत हासिल कर सकती हैं। मायावती की कोशिश है कि लोकसभा चुनाव में यूपी से उनकी पार्टी कम से कम 15 से 20 सीट जीत ले, उसके बाद वो राजनीतिक हालात में मोलभाव करने के लिए मजबूत होंगी। अगर गैर-बीजेपी सरकार बनती है तो भी उनके पास इतनी सीटें होंगी कि मोलभाव कर सकें। मायावती की कोशिश होगी कि वो प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी करें, ऐसी स्थिति में अखिलेश यादव को अपने पिता के अरमानों के बजाय मायावती के दावों का सपोर्ट करना पड़ेगा। दरअसल यही वो बदला होगा जिसके लिए मायावती ने पूरी बिसात बिछाई है।

मायावती का प्लान बी भी तैयार है। अगर बीजेपी सरकार बनाने के करीब हो और उसकी सीटें कुछ कम पड़ें तो बीएसपी उसके साथ भी तालमेल की स्थिति में होगी। यह एक तरह से अखिलेश के लिए बड़ा झटका होगा, क्योंकि उनके खाते के वोटों पर जीते बीएसपी के सांसद बीजेपी की सरकार बनाने में मदद कर रहे होंगे। मायावती इसके बदले में बीजेपी से जो चाहे मोल-भाव कर सकेंगी और अपना राजनीतिक जीवन भी सुरक्षित कर लेंगी।

(नोएडा और बुलंदशहर के बादलपुर में मायावती के कुछ करीबी कार्यकर्ताओं से बातचीत पर आधारित)

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