Loose Top

राम मंदिर केस में फैसले से क्यों भाग रहे हैं मुसलमान

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या के राम मंदिर के मुकदमे में लगातार यह बात उठ रही है कि इसे लटकाया जा रहा है। खास तौर पर मुस्लिम पक्ष लगातार ऐसी-ऐसी बातें कर रहा है ताकि किसी तरह से फैसले में देरी कराई जाए। अब उन्होंने इस मामले पर बनी संविधान पीठ के जज यूयू ललित की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाकर मामले को करीब तीन हफ्ते और लटका दिया। इससे पहले भी कभी इबादत के लिए मस्जिद जरूरी होने और कभी दस्तावेजों के अनुवाद जैसे तकनीकी पेच फंसाकर यह मामला लटकाया जाता रहा। यहां तक कि मुसलमानों की तरफ से पेश हो रहे कांग्रेसी वकीलों ने यह दलील भी दे डाली कि फैसला 2019 के बाद ही सुनाया जाए। पिछले चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने दोनों पक्षों को जब आपस में बैठकर मामला सुलझाने का वक्त दिया था तब भी सबसे पहले मुस्लिम संगठनों ने अपने पैर पीछे खींचे थे। मुस्लिम पक्ष के वकील जफरयाब जिलानी ने तो इस ऑफर को सीधे तौर पर ठुकरा दिया। सवाल उठ रहा है कि आखिर क्या कारण है कि मुस्लिम नेता और संगठन बरसों से लटके इस मामले को आपसी सुलह-समझौते से निपटाने से बच रहे हैं? जबकि हिंदू नेता इसके लिए भी राजी हैं। न्यूज़लूज़ ने इस बारे में कुछ जानकारों से बात की। मोटे तौर पर इसके 3 कारण हैं। यह भी पढ़ें: केके मुहम्मद, वो शख्स जिसने बाबरी ढांचे के नीचे दबे प्राचीन मंदिर को ढूंढा था

कारण नंबर-1, हिंदुओं के पक्ष में जाएगा फैसला!

2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तमाम साक्ष्यों, सबूतों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर माना था कि जिस गर्भगृह पर हिंदू संगठन दावा करते रहे हैं वहां पर पहले मंदिर था। वैसे भी तकनीकी स्थिति यही है कि बाबरी ढांचा गिरने से पहले भी वहां गर्भगृह में रामलला की पूजा हो रही थी। ये पूजा अब भी जारी है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस हिस्से पर मंदिर बनाने की मंजूरी दे दी थी। अब अगर इस मामले पर बीच-बचाव शुरू होगा तो हाई कोर्ट का फैसला ही आधार बनेगा। हाई कोर्ट के फैसले में मंदिर क्षेत्र की जमीन को 3 हिस्से में बांटने को कहा गया है। यह एक तरह का सर्वमान्य फैसला हो सकता था लेकिन मुस्लिम संगठनों ने इसे नहीं माना। उन्हें लग रहा है कि केस सुप्रीम कोर्ट में चलता रहा तो वो हाई कोर्ट के फैसले को बदलवाने में कामयाब हो जाएंगे। यह भी पढ़ें: राम मंदिर केस में इतिहासकारों ने हिंदुओं को ऐसे ठगा

कारण नंबर-2, बीजेपी को फायदे का डर

विपक्ष समेत तमाम मुस्लिम संगठनों को ये एहसास है कि अगर अयोध्या मंदिर का मामला सुलझ गया तो बीजेपी को इसका राजनीतिक फायदा हो सकता है। बीजेपी चुनावों में इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर गिनाएगी। अभी मंदिर न बनने की स्थिति में हर चुनाव में उसे शर्मिंदगी की स्थिति का सामना करना पड़ता है। हिंदू संगठन भव्य राम मंदिर को हिंदुओं की जीत के तौर पर प्रचारित करेंगे। ये राम मंदिर एक तरह से हिंदू एकता का प्रतीक बन सकता है। जिसका फायदा बीजेपी को ही होगा। यही कारण है कि मुस्लिम संगठनों की कोशिश है कि राम मंदिर विवाद को जितना लंबा खींचा जाए उतना ही अच्छा है। सुप्रीम कोर्ट ने जब सुलह का सुझाव दिया तो वकील जफरयाब जिलानी ने फौरन कहा कि सुलह का मतलब है सरेंडर कर देना। दरअसल यह बयान बताता है कि मुसलमानों को एहसास है कि वो न तो सुलह और न मुकदमे से राम मंदिर पर कब्जा पा सकेंगे, लिहाजा इस मामले को जितना लटकाए रखकर हिंदुओं को चिढ़ाया जा सके उतना ही अच्छा है।

कारण नंबर-3, मुसलमानों का नेता नहीं

जफरयाब जिलानी की बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी से लेकर ओवैसी की पार्टी तक इस मामले में मुसलमानों का नुमाइंदा होने का दावा करते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि मौजूदा दौर में मुसलमानों का कोई ऐसा सर्वमान्य नेता नहीं है, जिसकी बात सभी मानें। हर मुस्लिम संगठन और नेता दूसरे से नफरत करता है और एक-दूसरे को शक की नजर से देखता है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने आउट ऑफ कोर्ट सैटलमेंट के सुझाव का स्वागत कर दिया तो कुछ मुस्लिम नेताओं ने उन्हें बीजेपी का एजेंट करार दिया। जहां तक हिंदुओं की बात है वो मंदिर को लेकर आरएसएस और बीजेपी पर भरोसा कर लेंगे, लेकिन मुसलमानों के पास ऐसा कोई बड़ा नेता नहीं है, जिस पर वो ऐतबार कर सकें। आमतौर पर यह माना जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के कुछ जज इस मामले में फैसला देने से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि फैसला मुसलमानो के पक्ष में नहीं आया तो वो दंगा-फसाद पर उतारू हो सकते हैं। यही कारण है कि जज ऐसा कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं है जिससे उनकी विश्वसनीयता पर अंगुली उठाई जा सके। इसीलिए मुकदमे में अब तक मुस्लिम पक्ष की सारी ऊल-जलूल मांगें भी मानी गईं, जिनके कारण ये मामला हर तारीख पर लटकता रहा। बस इस चक्कर में 100 करोड़ हिंदुओं की आस्था का तमाशा बना हुआ है। क्योंकि वो मुसलमानों की तरह उग्र नहीं हैं और भारतीय संस्थाओं पर भरोसा करते हैं, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि वो पीड़ित बने रहें।

कृपया लेख कॉपी-पेस्ट न करें। कई लोग पोस्ट कॉपी करके फेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर देते हैं, जिससे वेबसाइट की आमदनी काफी कम हो गई है। राष्ट्रवाद की विचारधारा पर आधारित यह वेबसाइट बंद हो जाएगी तो क्या आपको खुशी होगी? कृपया खबरों का लिंक शेयर करें।
एक अपील: न्यूज़लूज़ के जरिए हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इस वेबसाइट पर होने वाला खर्च बहुत ज्यादा है और हमारी आमदनी काफी कम। हम अपने काम को जारी रख सकें इसके लिए हमें आर्थिक मदद की जरूरत है। ये हमारे लिए ऑक्सीजन का काम करेगी। डोनेट करने के लिए क्लिक करें:
Donate with

comments

Polls

क्या नरेंद्र मोदी सरकार इसी कार्यकाल में जनसंख्या कानून लाएगी?

View Results

Loading ... Loading ...

Popular This Week

Don`t copy text!